
आम की बागवानी के लिए अभी सबसे नाजुक समय चल रहा है. आम के पेड़ मंजर से लदे हुए हैं जिससे बंपर पैदावार की उम्मीद जग रही है. इसी के साथ बागवानों की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है कि वे पौधों को ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित रखें ताकि फलों को कोई हानि न हो. इस नाजुक समय में आम के पेड़ पर कीटों और रोगों का हमला हो सकता है. यहां तक कि चींटियां भी पूरे बाग को बर्बाद कर सकती हैं. आम पर मंजर पर चींटियों के अलावा कीटों का भी हमला होता है. फंगस का अटैक भी होता है. इस सभी खतरों से किसानों को सावधान रहना चाहिए.
आम के फूल और फलन के समय चींटियों का खतरा अधिक होता है. इससे बचाने के लिए किसानों को हमेशा तैयार रहना चाहिए. इसका बचाव बहुत आसान है और कुछ रुपये में काम हो सकता है. इसका सबसे आसान उपाय है कपूर का प्रयोग. कपूर की टिकिया बहुत प्रभावी होती है जिसकी गंध से चींटियों के साथ-साथ कीट भी दूर भागते हैं. इससे आम के मंजर हेल्दी रहते हैं और पैदावार अच्छी मिलती है.
कपूर की टिकिया का बुरादा बना लें और 1-2 लीटर पानी में मिला दें. इसमें कुछ बूंदे नीम के तेल के भी डालें. अब इस पूरे घोल का स्प्रे आम के निचले हिस्से पर करें ताकि चींटियां या कीट ऊपर न चढ़ें. फूलों पर स्प्रे नहीं करना है, वरना नुकसान हो सकता है.
कपूर के कुछ टुकड़ों को आम की जड़ों के पास मिट्टी में दबाने से भी फायदा होता है. इससे चींटियों, कीटों और फंगस से भी छुटकारा मिलता है. इस तरह के घोल या टुकड़ों का इस्तेमाल 10-15 दिनों के अंतराल पर करें. ध्यान रहे कि तेज धूप में स्प्रे नहीं करना है, वरना असर कम होगा.
आम के मंजरों को नुकसान पहुंचाने वाला 'मिज कीट' एक बेहद खतनाक कीट है. हालांकि इसका प्रकोप जनवरी से जुलाई तक बना रहता है, लेकिन सबसे अधिक क्षति यह बौर और नन्हे फलों को पहुंचाता है. इस कीट के आक्रमण की पहचान बौर के डंठल, पत्तियों की नसों या कोमल तनों पर काले या कत्थई धब्बों से की जा सकती है. इन धब्बों के बीच में एक सूक्ष्म छेद होता है, जिससे प्रभावित हिस्सा टेढ़ा-मेढ़ा होकर सूखने लगता है. इस कीट की रोकथाम के लिए किसानों को चाहिए कि वे लक्षणों के दिखते ही डायमेथोएट 30% 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.
जनवरी का पहला सप्ताह आते ही आम के बागों में गुजिया कीट की सक्रियता बढ़ने लगती है. यह कीट मिट्टी से निकलकर पेड़ के तनों पर चढ़ता है और सीधे बौर तक पहुंचकर रस चूस लेता है, जिससे बौर सूखने लगते हैं. इसकी रोकथाम के लिए संशोधित ट्री-बैंडिंग तकनीक सबसे असरदार मानी जाती है.
इसके लिए 1 किलो चिकनी मिट्टी में 250 ग्राम पी.ओ.पी. और 50 मिलीलीटर जला हुआ मोबिल तेल मिलाकर एक गाढ़ा पेस्ट तैयार करें. इस पेस्ट की 2–3 इंच चौड़ी पट्टी पेड़ के तने के चारों ओर लगाएं. इसके ऊपर पॉलीथीन शीट या सेलो टेप इस तरह लपेटें कि मिट्टी की पट्टी बीच में सुरक्षित रहे. फिर इसे सुतली से बांधकर अच्छी तरह कस दें, जिससे कीट तने पर ऊपर न चढ़ सकें. अगर गुजिया कीट पहले ही बौर तक पहुंच चुके हों, तो नियंत्रण के लिए डायमेथोएट (1.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करना चाहिए.