
छोटे किसानों के लिए अगेती खेती वरदान है. हमारे देश में 80 फीसदी से ज्यादा किसान छोटे और सीमांत वर्ग के हैं, जिनके पास एक से पांच एकड़ तक ही जमीन है. ऐसे किसानों के लिए कम जमीन से ज्यादा कमाई करने का सबसे अच्छा तरीका 'अगेती खेती' यानी समय से पहले फसल उगाना है. उत्तर भारत में जनवरी से 15 फरवरी तक कड़ाके की ठंड पड़ती है. इस दौरान रात का तापमान 8 डिग्री सेल्सियस से नीचे गिर जाता है, जिससे खुले खेत में सब्जी के बीज अंकुरित नहीं हो पाते. ज्यादातर किसान ठंड खत्म होने का इंतजार करते हैं और फरवरी के अंत में बुवाई करते हैं.
नतीजा यह होता है कि सबकी फसल अप्रैल-मई में एक साथ बाजार में आती है और दाम गिर जाते हैं. लेकिन जो किसान 'लो-टनल' तकनीक से जनवरी में ही टमाटर, मिर्च, बैंगन, खीरा, लौकी, करेला, तरबूज , खरबूज, चिरचिरा, और ककड़ी नर्सरी तैयार कर लेते हैं, उनकी फसल समय से पहले बाजार में आ जाती है. मार्च-अप्रैल में जब सब्जियों के दाम ऊंचे होते हैं, तब अगेती फसल बेचकर किसान सामान्य से कहीं ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं.
लो-टनल तकनीक एक छोटी पारदर्शी सुरंग की तरह होती है. भारतीय सब्जी अनुसंधान परिषद वाराणसी के पूर्व प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. सूर्य नाथ चौरसिया के अनुसार, इसे बनाने के लिए लोहे की पतली छड़ों या बांस की खपचियों का इस्तेमाल किया जाता है. इन्हें खेत में बेड के ऊपर 2-3 फीट ऊंची अर्धचंद्राकार आकृति में लगाया जाता है और फिर ऊपर से 20-30 माइक्रोन की पारदर्शी पॉलीथीन से ढंक दिया जाता है.
यह पॉलीथीन बाजार में आसानी से मिल जाती है. 10 हेक्टेयर खेत की रोपाई के लिए 1 मीटर चौड़ी और 10 मीटर लंबी सिर्फ एक लो-टनल काफी होती है.
सबसे पहले खेत में 1 मीटर चौड़ी बेड बनाएं और बीजों को आधा से एक सेंटीमीटर की गहराई पर बोएं. किसान चाहें तो पॉली बैग या प्रो-ट्रे (जो बाजार में 35-40 रुपये में मिलती है) का इस्तेमाल भी कर सकते हैं. प्रो-ट्रे में मिट्टी और गोबर खाद का मिश्रण भरकर उसे लो-टनल के अंदर रख दें. इस सुरक्षित माहौल में टमाटर, मिर्च, खीरा, लौकी, करेला, तरबूज और खरबूज जैसे पौधों की नर्सरी मात्र 30 से 40 दिनों में तैयार हो जाती है.
यह तकनीक छोटे किसानों के लिए बहुत सस्ती है क्योंकि इसमें इस्तेमाल होने वाला सामान कई सालों तक काम आता है. जब पौधा शुरुआत से ही स्वस्थ और मजबूत होगा, तो फसल की पैदावार भी क्वालिटी वाली और उपज भी अधिक होगी.
लो-टनल के अंदर पौधों को सही पोषण देना जरूरी है. डॉ. चौरसिया सलाह देते हैं कि बीज जमने के बाद 'फर्टीगेशन' करें, यानी एनपीके खाद का हल्का घोल बनाकर एक दिन छोड़कर पौधों को दें. सिंचाई के लिए 'हजारा' का इस्तेमाल करें. एक जरूरी बात यह है कि अगर पॉलीथीन पर धूल जम जाए, तो उसे साफ करते रहें ताकि पौधों को पर्याप्त रोशनी मिले. दिन में जब धूप तेज हो, तो थोड़ी देर के लिए टनल के पर्दे खोल दें. इससे पौधों का 'कठोरीकरण' होता है, जिससे खेत में रोपाई के बाद पौधे मरते नहीं हैं और उनका विकास तेजी से होता है.
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें बीजों का जमाव लगभग 100 प्रतिशत होता है. टनल के अंदर का गर्म तापमान पौधों की बढ़वार के लिए आदर्श होता है. पारंपरिक खेती के मुकाबले इसमें कीटों और बीमारियों का हमला भी बहुत कम होता है.
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि पौधे जल्दी तैयार होते हैं और उनमें कीट या बीमारियों का डर भी कम रहता है. जब आम किसान फरवरी-मार्च में बीज बोना शुरू करते हैं, तब लो-टनल अपनाने वाले किसान अपनी अगेती फसल बाजार में बेचने के लिए तैयार होते हैं. मार्च और अप्रैल के महीने में जब सब्जियों के दाम ऊंचे होते हैं, तब ये किसान मोटा मुनाफा कमाते हैं. अच्छी बात यह है कि बागवानी विभाग भी इस तकनीक को अपनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर रहा है और लो-पॉली टनल बनाने पर अच्छी सब्सिडी भी दे रहा है.
किसान इस स्मार्ट तकनीक को अपनाकर अपनी आय को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकते हैं. अतः जो किसान स्मार्ट तरीके से खेती करना चाहते हैं या पौध बेचने का व्यापार शुरू करना चाहते हैं, उनके लिए लो-टनल तकनीक आज के समय की सबसे बेहतरीन और मुनाफे वाली तकनीक है.