
बिहार की लीची' का कोई मुकाबला नहीं है. पूरे भारत में लगभग 92 हजार हेक्टेयर में लीची उगाई जाती है, लेकिन बिहार अकेला ही देश की 80 प्रतिशत लीची पैदा करता है. मुजफ्फरपुर और इसके आसपास के इलाकों में लीची की खेती किसी उत्सव से कम नहीं है. बिहार की उत्पादकता 8 टन प्रति हेक्टेयर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है. यह फल न केवल अपने स्वाद के लिए, बल्कि किसानों की आर्थिक मजबूती के लिए भी जाना जाता है.
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर बिहार के पादप रोग विज्ञान विभाग के हेड डॉ. एस. के. सिंह के अनुसार, जनवरी के अंत से फरवरी का महीना लीची के लिए सबसे 'संवेदनशील' होता है, क्योंकि इसी समय पेड़ों में मंजर यानी फूलों की कलियां निकलने की शुरुआत होती है. इस समय की गई एक छोटी सी गलती पूरे साल की मेहनत पर पानी फेर सकती है. इसलिए सही तकनीक और सावधानी बरतना बहुत जरूरी है.
डॉ सिंह के अनुसार, मंजर आने से पहले बाग की सही देखभाल करना बहुत जरूरी है. सबसे पहले बाग की हल्की गुड़ाई और साफ-सफाई करें ताकि खरपतवार खत्म हो जाएं. लेकिन ध्यान रहे कि गुड़ाई गहरी न हो वरना जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है. अगर बाग में एरिनोज माइट से प्रभावित टहनियां दिखें, तो उन्हें काटकर जला दें ताकि बीमारी फैले नहीं. सबसे अहम बात यह है कि मंजर आने से पहले सिंचाई बिल्कुल बंद कर देनी चाहिए. अगर आप इस समय पानी देते हैं, तो पेड़ में फूल की जगह सिर्फ नई पत्तियां निकल आएंगी. इसके अलावा, मंजर आने से 30 दिन पहले 'जिंक सल्फेट' का छिड़काव करें ताकि मंजर मजबूत और स्वस्थ बनें. इस दौरान बाग में कोई दूसरी फसल न लगाएं, क्योंकि इससे नमी बढ़ जाती है जो फूलों के लिए नुकसानदेह है.
जब लीची के पेड़ों पर फूल आ जाएं, तो समझ लें कि अब सबसे नाजुक समय शुरू हो गया है. इस दौरान बाग में किसी भी तरह के कीटनाशक का छिड़काव 'मौत की घंटी' की तरह है, क्योंकि इससे परागण करने वाली मधुमक्खियां मर जाती हैं. याद रखें, बिना मधुमक्खियों के लीची में फल नहीं लगेंगे. प्रति हेक्टेयर कम से कम 15-20 मधुमक्खी के बक्से जरूर रखें.
इससे न केवल परागण बेहतर होगा और फल का आकार बढ़ेगा, बल्कि किसान शहद बेचकर अलग से कमाई भी कर सकते हैं. मधुमक्खियां फूलों से रस लेती हैं और बदले में आपकी फसल की गुणवत्ता और पैदावार दोनों को बढ़ा देती हैं. इसलिए इस समय किसी भी रसायनिक स्प्रे से बचें.
जब लीची का फल 'लौंग' के आकार का हो जाए,असली चुनौती उसे झड़ने से बचाने की होती है. फल लगने के एक हफ्ते बाद 'प्लानोफिक्स' का हल्का छिड़काव करें, यह हार्मोनल संतुलन बनाए रखता है और फलों को गिरने से रोकता है. लीची में अक्सर फल फटने की समस्या देखी जाती है, जिससे किसानों को भारी नुकसान होता है. इससे बचने के लिए 'बोरेक्स' 4 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें. इसे 15-15 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार दोहराएं.
बोरेक्स के इस्तेमाल से न केवल फल फटना बंद होंगे, बल्कि लीची का रंग चटख लाल होगा और उसकी मिठास में भी जबरदस्त बढ़ोतरी होगी. सही समय पर पोषक तत्वों का यह छिड़काव आपकी लीची को बाजार में अधिक दाम दिला सकता है.
लीची पर मंजर आने से लेकर फल के पकने तक की अवधि में बागवानों को बेहद सतर्क रहने की जरूरत होती है. अगर आप सिंचाई पर नियंत्रण रखते हैं, मधुमक्खियों का संरक्षण करते हैं और रसायनों का इस्तेमाल विवेकपूर्ण तरीके से करते हैं, तो लीची के बाग से क्वालिटी वाले अधिक फल की पैदावार ले सकते हैं. अगर इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखा जाए, तो लीची न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी अपना अधिक दाम दिलाएगी.