
आलू में पछेती झुलसा यानी लेट ब्लाइट सबसे विनाशकारी बीमारी है, जो 'फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टंस' नामक फफूंद से फैलती है. भारत में, विशेषकर पहाड़ी इलाकों और बारिश वाले क्षेत्रों में यह बहुत तेजी से फैलती है. यह बीमारी आलू की पैदावार को 15 फीसदी से भी ज्यादा कम कर सकती है. कभी कभी तो पूरी फसल को बरबाद कर देती है. इसकी खास बात यह है कि इसके नए-नए रूप सामने आ रहे हैं, जो पहले से ज्यादा ताकतवर हैं और कुछ ही दिनों में पूरी फसल को जलाकर राख कर सकते हैं. आलू के पौध सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, आलू की इस बीमारी के फैलने में खास तरह का मौसम जिम्मेदार होता है. पछेती झुलसा का कवक 16-20°C तापमान पर सबसे तेजी से बढ़ता है. सीधे शब्दों में कहें, तो हल्की ठंड, अधिक नमी और आसमान में बादलों का होना इस बीमारी के फैलने का सबसे अनुकूल समय रहता है.
विशेषज्ञों के अनुसार, शुरुआत में, आलू की निचली पत्तियों पर हल्के हरे, पानी सोखे हुए धब्बे दिखाई देते हैं. नमी वाले मौसम में ये धब्बे तेजी से बढ़कर काले और बैंगनी रंग के हो जाते हैं. अगर आप पत्ती को पलटकर देखेंगे, तो धब्बों के चारों ओर सफेद रंग की रुई जैसी फफूंद दिखाई देगी. सूखे मौसम में ये धब्बे भूरे होकर सूख जाते हैं. यह बीमारी केवल पत्तों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि तने और आलू कंद तक पहुंच जाती है.
संक्रमित आलू अंदर से लाल-भूरे रंग के हो जाते हैं और सड़ने लगते हैं, जिससे पूरी फसल "जली हुई" दिखाई देने लगती है. अक्सर धूप या कम नमी के कारण सफेद फफूंद साफ नहीं दिखती. ऐसे में किसान एक छोटा सा टेस्ट कर सकते हैं. सुबह के समय खेत से संदिग्ध पत्तियां तोड़ें और उन्हें एक बर्तन में गीली रुई के साथ रखकर ढक दें. इसे रात भर के लिए छोड़ दें. अगर अगली सुबह पत्तियों पर सफेद रुई जैसा पाउडर दिखाई दे, तो समझ लें कि यह पछेती झुलसा ही है क्योकि जब यह बीमारी ऊपर की पत्तियों तक पहुंचती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, इसलिए रोज खेत का निरीक्षण करना जरूरी है.
आलू की फसल को पछेती झुलसा से बचाने के लिए समय पर दवाओं का छिड़काव बहुत जरूरी है. बीमारी आने से पहले ही सावधानी के तौर पर मैंकोजेब या प्रोपीनेब का पहला स्प्रे करें. जैसे ही खेत में बीमारी के लक्षण काले धब्बे दिखाई दें, तुरंत असरदार दवाइयां जैसे साइकिलॉक्सानिल + मैंकोजेब का इस्तेमाल करें. छिड़काव करते समय दवा में स्टिकर जरूर मिलाएं ताकि बारिश होने पर भी दवा पत्तों से न धुले.
ध्यान रहे कि पौधे के निचले हिस्से की पत्तियों को अच्छी तरह गीला किया जाए, क्योंकि बीमारी वहीं से शुरू होती है. कटाई के समय लाल-भूरे दाग वाले संक्रमित आलू को अलग कर दें ताकि अगले साल संक्रमण न हो.आलू खोदने से दो हफ्ते पहले पौधों की टहनियां काटने से आलू सड़ने से बच जाते हैं.
इस घातक बीमारी के लिए केवल दवाएं ही काफी नहीं हैं, बल्कि कुछ खास बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है. रोज सुबह अपने खेत का निरीक्षण करें और निचली पत्तियों की जांच करें. हमेशा स्वस्थ और बीमारी रहित बीजों का ही चुनाव करें और खुदाई से करीब 12-15 दिन पहले पौधों की ऊपरी टहनियों को काट दें. इससे आलू के कंदों तक संक्रमण नहीं पहुचता और वे भंडारण के दौरान सुरक्षित रहते हैं. मौसम पर नजर रखें, क्योंकि अधिक नमी और हल्की ठंड में यह बीमारी "आग" की तरह फैलती है.
पछेती झुलसा रोग को रोकने के लिए सबसे पहले स्वस्थ और प्रमाणित बीजों का ही चुनाव करें. मिट्टी ऐसी हो जहां पानी न रुकता हो. आलू की बुवाई के समय मिट्टी की ऊंची मेड़ बनाएं, ताकि कंद ढके रहें और संक्रमण सीधे आलू तक न पहुंच पाए. अगर खेत में कहीं बीमारी की शुरुआत दिखे, तो उन पौधों को उखाड़कर गड्ढे में दबा दें. इसके अलावा, कुफरी ख्याति, कुफरी बादशाह और कुफरी नीलकंठ जैसी रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव करें जो आपके क्षेत्र के लिए उपयुक्त हों.