
बिहार के करीब 32 से 36 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में लीची की खेती होती है. अपनी मिठास और खुशबू के दम पर बिहार की लीची ने देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी खास पहचान बनाई है. हालांकि, इस बार लीची सीजन में किसान और कारोबारी दोनों चिंता में हैं. किसानों की चिंता इसलिए बढ़ गई है क्योंकि इस वर्ष उत्पादन पिछले कुछ वर्षों की तुलना में करीब 15 फीसदी के आसपास कम हुई है. वहीं, लीची व्यापार से जुड़े लोगों का कहना है कि निर्यात को बढ़ावा देने वाली बुनियादी सुविधाओं का अभाव लंबे समय से बना हुआ है. हालत यह है कि दूसरे राज्यों और विदेशों तक लीची पहुंचाने के लिए पर्याप्त और आधुनिक परिवहन व्यवस्था उपलब्ध नहीं है.
बिहार लीची ग्रोवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बच्चा सिंह का कहना है कि लीची निर्यात को लेकर सरकार की ओर से न तो कोई ठोस पहल की गई है और न ही आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं. उनका कहना है कि अधिकांश किसानों को ये तक जानकारी नहीं है कि विदेशों में भेजी जाने वाली लीची के गुणवत्ता मानक क्या हैं और निर्यात की प्रक्रिया किस प्रकार पूरी की जाती है. उन्होंने बताया कि राज्य में अभी तक ऐसा आधुनिक पैक हाउस विकसित नहीं हो सका है, जो अंतरराष्ट्रीय निर्यात मानकों के अनुरूप हो.
पटना के बिहटा में एक पैक हाउस बनाया गया है, लेकिन वह भी पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाया है. उनका आरोप है कि सरकार और लीची से जुड़ी संस्थाएं दूसरे राज्यों में लीची भेजने को ही निर्यात मानकर चल रही हैं, जबकि वास्तविक अंतरराष्ट्रीय निर्यात के लिए अलग व्यवस्था और रणनीति की आवश्यकता है.
पिछले सात वर्षों से बिहार के बागानों से लीची खरीदकर देश के अलग-अलग राज्यों में भेजने वाली कंपनी सुपर प्लम के टेक्निकल हेड बसंत झा का कहना है कि उद्यान निदेशालय और लीची से जुड़े संस्थानों की ओर से ऐसी कोई विशेष सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जाती, जिससे लीची को आसानी से विदेशों तक पहुंचाया जा सके.
उन्होंने बताया कि बिहार से किसी भी फल का निर्यात करने के लिए पहले उसे दूसरे राज्यों तक ले जाना पड़ता है. उनकी कंपनी बिहार के बागानों से लीची तोड़कर रेफ्रिजरेटर वाहनों (रीफर वैन) के जरिए दिल्ली पहुंचाती है और वहां से यूरोपीय देशों को निर्यात करती है. उनका कहना है कि बिहार के एयरपोर्ट से कोई नियमित अंतरराष्ट्रीय कार्गो सुविधा या सीधी अंतरराष्ट्रीय उड़ान उपलब्ध नहीं है, जिससे निर्यातकों को काफी परेशानी होती है.
बसंत झा के अनुसार, उनकी कंपनी दिल्ली एयरपोर्ट से प्रतिदिन करीब 1.5 से 2 टन लीची यूरोपीय देशों में भेज रही है. यदि बिहार के एयरपोर्ट पर अंतरराष्ट्रीय स्तर की उड़ान और कार्गो सुविधाएं उपलब्ध होतीं, तो दिल्ली के माध्यम से निर्यात करने की जरूरत नहीं पड़ती. इससे परिवहन लागत में कमी आती और बेहतर क्वालिटी वाली ताजी लीची कम समय में विदेशी बाजारों तक पहुंचाई जा सकती थी. उन्होंने यह भी कहा कि न तो बिहार में पर्याप्त हवाई निर्यात सुविधाएं हैं और न ही रेलवे ने ऐसी विशेष बोगियों का विकास किया है, जिनमें लीची जैसे नाजुक फलों को सुरक्षित ढंग से लंबी दूरी तक भेजा जा सके.
राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. विकास दास ने बताया कि इस वर्ष उनका केंद्र भी लीची को दुबई भेजने की तैयारी कर रहा है. फिलहाल लीची का निर्यात वाराणसी एयरपोर्ट के माध्यम से किया जा रहा है. उन्होंने स्वीकार किया कि यदि बिहार में अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की सुविधा उपलब्ध होती, तो अन्य राज्यों के एयरपोर्ट पर निर्भरता काफी हद तक कम हो जाती. उन्होंने बताया कि केंद्र ने विशेष प्रकार की पॉलीथिन पैकेजिंग तकनीक विकसित की है, जिससे लीची की शेल्फ लाइफ 4 से 5 दिन तक बढ़ जाती है और फल की क्वालिटी बनी रहती है.
बिहार की प्रसिद्ध शाही लीची को जीआई (GI) टैग मिल चुका है, लेकिन इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक इसकी पहुंच अपेक्षित स्तर तक नहीं बन पाई है. इसका सीधा असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि जो राजस्व और व्यावसायिक लाभ बिहार को मिलना चाहिए, उसका एक बड़ा हिस्सा अन्य राज्यों को प्राप्त हो रहा है. कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में लीची निर्यात में गिरावट दर्ज की गई है.
37 मीट्रिक टन लीची का निर्यात हुआ, जिससे करीब 1.90 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ.
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि पिछले तीन वर्षों में लीची निर्यात और उससे होने वाले कारोबार दोनों में लगातार गिरावट आई है. ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बिहार में आधुनिक पैक हाउस, कोल्ड चेन नेटवर्क, अंतरराष्ट्रीय कार्गो सुविधाएं और निर्यात संबंधी प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए, तो राज्य की शाही लीची वैश्विक बाजार में और मजबूत पहचान बना सकती है.