
उत्तराखंड में ग्रामीणों को पशुपालन और स्वरोजगार से जोड़ने के प्रयासों के बीच टिहरी जिले के सीमांत भिलंगना क्षेत्र से चिंताजनक तस्वीर सामने आई है. यहां बड़ी संख्या में ग्रामीण भेड़-बकरी पालन कर अपने परिवार की आजीविका चलाते हैं, लेकिन भेड़ों से निकलने वाली ऊन का बाजार नहीं मिलने से उनकी परेशानी बढ़ती जा रही है. हालात ऐसे हैं कि मेहनत से तैयार कई टन ऊन को खरीदार नहीं मिलने के कारण जंगलों में छोड़ना पड़ रहा है.
भिलंगना क्षेत्र के मेड़, मारवाड़ी, निवालगांव, गंगी, गेंवाली, उरणी और पिनस्वाड़ समेत कई सीमांत गांवों में लंबे समय से भेड़-बकरी पालन किया जाता है. इन गांवों में पशुपालन केवल परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि कई परिवारों की आमदनी का प्रमुख जरिया भी है. लेकिन ऊन की कटाई के बाद उसकी खरीद, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग की स्थायी व्यवस्था नहीं होने से पशुपालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.
स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, समस्या पिछले कुछ वर्षों में ज्यादा गंभीर हुई है. ऊन तैयार होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर पर्याप्त खरीदार उपलब्ध नहीं हैं. इसके अलावा ऊन से धागा तैयार करने और उससे दूसरे उत्पाद बनाने की भी ठोस व्यवस्था क्षेत्र में नहीं है.
स्थानीय ग्रामीण विमला देवी का कहना है कि गांव में बड़े स्तर पर भेड़ पालन किया जाता है, लेकिन पिछले करीब तीन वर्षों से ऊन की बिक्री नहीं हो पा रही है. पशुपालक ऊन को काफी समय तक संभालकर रखते हैं, लेकिन खरीदार नहीं मिलने पर आखिरकार उसे जंगल में छोड़ना पड़ता है.
उनका कहना है कि यदि सरकार स्थानीय स्तर पर ऊन की खरीद और मार्केटिंग के लिए केंद्र स्थापित करे तो पशुपालकों को बड़ा फायदा मिल सकता है. ग्रामीणों को इस केंद्र के संचालन और ऊन से जुड़े दूसरे कामों में रोजगार भी दिया जा सकता है.
मारवाड़ी की ग्राम प्रधान संतोषी देवी ने भी भेड़ पालकों की परेशानी उठाई है. उनका कहना है कि क्षेत्र के ग्रामीण भेड़ पालन को स्वरोजगार के रूप में अपना रहे हैं, लेकिन ऊन खरीदने वाला कोई नहीं होने से उन्हें इसका आर्थिक लाभ नहीं मिल पा रहा है.
भेड़ पालकों के सामने समस्या यह है कि पशुओं की देखभाल में पूरे साल मेहनत और पैसा खर्च करने के बाद भी ऊन से अतिरिक्त कमाई नहीं हो रही है. ऐसे में स्वरोजगार का यह परंपरागत माध्यम धीरे-धीरे ग्रामीणों के लिए आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है.
निवालगांव के पूर्व प्रधान बावन सिंह बिष्ट का कहना है कि भिलंगना क्षेत्र में बड़े स्तर पर ऊन का उत्पादन होता है, लेकिन उसके मार्केटिंग की उचित व्यवस्था नहीं है. भेड़ पालकों के लिए सरकारी स्तर पर कई घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन ग्रामीणों को उम्मीद के मुताबिक लाभ नहीं मिल पा रहा है.
बिष्ट के अनुसार, क्षेत्र में वूल बैंक यानी ऊन बैंक स्थापित करने की मांग भी की जा चुकी है. इसके पीछे उद्देश्य यह है कि पशुपालकों से स्थानीय स्तर पर ऊन खरीदी जा सके और उसे बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था बने. इससे पशुपालकों को ऊन फेंकने के बजाय उसकी उचित कीमत मिलने की संभावना बढ़ेगी.
उनका कहना है कि एक क्षेत्र भ्रमण के दौरान कैबिनेट मंत्री भरत चौधरी के सामने भी यह समस्या रखी गई थी. उस दौरान वूल बैंक स्थापित करने के साथ ऊन के मार्केटिंग की व्यवस्था करने की मांग की गई थी.
भेड़ पालकों ने आसपास के क्षेत्रों से तुलना करते हुए भी अपनी समस्या उठाई है. बावन सिंह बिष्ट के मुताबिक, पड़ोसी उत्तरकाशी जिले में पैदा होने वाली ऊन को बाहरी बाजारों तक पहुंचाया जा रहा है. इसके उलट भिलंगना क्षेत्र में पशुपालकों को अपनी ऊन बेचने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.
ग्रामीणों का कहना है कि केवल भेड़ पालन को बढ़ावा देने से उनकी समस्या का समाधान नहीं होगा. इसके लिए ऊन की खरीद से लेकर उसकी प्रोसेसिंग और बाजार तक पहुंचाने की पूरी व्यवस्था विकसित करनी होगी.
भिलंगना क्षेत्र के भेड़ पालकों ने टिहरी की सीडीओ वरुणा अग्रवाल के सामने भी अपनी समस्या रखी है. सीडीओ के मुताबिक, इलाके में बड़ी संख्या में लोग भेड़ पालन करते हैं, लेकिन ऊन का उचित दाम नहीं मिलने की समस्या सामने आई है. कई पशुपालकों की ओर से भेड़ों से ऊन निकालने के बाद उसे जंगलों में छोड़ने की बात भी सामने आई है.
प्रशासन ने अब इस समस्या का संज्ञान लिया है. स्थानीय स्तर पर ऊन से धागा तैयार करने के लिए आवश्यक मशीनें लगाने की दिशा में काम किए जाने की बात कही गई है. यदि स्थानीय स्तर पर ऊन की प्रोसेसिंग शुरू होती है तो कच्ची ऊन को सीधे फेंकने के बजाय उससे धागा और दूसरे उत्पाद तैयार करने की संभावना बढ़ेगी.
भिलंगना के पशुपालकों की समस्या का स्थायी समाधान ऊन की खरीद, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग की मजबूत व्यवस्था से जुड़ा है. ग्रामीणों की मांग है कि क्षेत्र में ऐसा सिस्टम तैयार किया जाए, जिसमें पशुपालकों से ऊन खरीदने से लेकर उसे प्रोसेस करने और तैयार उत्पाद बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो.
यदि प्रशासन की ओर से ऊन से धागा तैयार करने वाली मशीनें लगाई जाती हैं और इसके साथ बाजार की व्यवस्था भी विकसित होती है, तो इसका दोहरा फायदा हो सकता है. एक तरफ भेड़ पालकों को उनकी ऊन की कीमत मिल सकेगी, वहीं दूसरी तरफ ऊन की छंटाई, प्रोसेसिंग, कताई और इससे जुड़े दूसरे कामों के जरिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर तैयार हो सकते हैं.
फिलहाल भिलंगना के इन सीमांत गांवों के भेड़ पालकों की नजर प्रशासन की पहल पर टिकी है. वर्षों से बाजार के अभाव में बेकार जा रही ऊन को अगर स्थायी खरीदार और प्रोसेसिंग की सुविधा मिलती है, तो परंपरागत भेड़ पालन एक बार फिर इन गांवों में मजबूत स्वरोजगार का माध्यम बन सकता है.(पंकज भट्ट का इनपुट)