
कर्नाटक में धारवाड़ पेड़ा मिलता है जोकि न सिर्फ कर्नाटक, बल्कि देश और दुनिया भर में अपने स्वाद के लिए मशहूर है. हालांकि, बहुत कम लोग जानते होंगे कि धारवाड़ पेड़ा, कर्नाटक में पाई जाने वाली धरवाड़ी भैंस के दूध से बनाया जाता है. इस मिठाई को जीआई टैग भी मिल चुका है. वहीं धारवाड़ी भैंस कर्नाटक के बगलकोट, बेलगाम, धारवाड़, गडग, बेल्लारी, बीदर, बीजापुर, चित्रदुर्ग, कलबुर्गी, हावेरी, कोपल, रायचूर और यादगिद आदि जिलों में पाई जाती है. एक तरह से देखा जाए तो ये छोटे किसानों के लिए काफी बेहतर है. क्योंकि यह भैंस एक ब्यान्त में औसतन 972 लीटर तक दूध देती है. वहीं एक दिन में 3.24 लीटर दूध देती है. ऐसे में आइए धरवाड़ी भैंस के बारे में विस्तार से जानते हैं-
भारत में देसी पशुओं पर शोध करने वाली संस्था राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो की ओर से धारवाड़ी भैंस को रजिस्टर किया गया है. इसे INDIA_BUFFALO_0800_DHARWADI_01018 एक्सेशन नंबर भी मिला है. इस भैंस का इतिहास मुर्रा, भिंड या फिर नीली रावी ती तरह ही सैंकड़ों साल पुराना है.
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धारवाड़ी नस्ल की भैंसों की खास बात यह है कि दिन भर खुले में चरने के बाद भी ये अच्छा दूध देती हैं. वहीं बच्चे 17-20 महीने मे तैयार हो जाते हैं. इसके अलावा, इस भैंस का पालन भैंस की अन्य नस्लों की तरह ही देश के कई अन्य राज्यों में भी किया जा सकता है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिस तरह से हरियाणा, पंजाब या फिर उत्तर प्रदेश में भैंसों को बांध कर बढ़िया दाना और चारा दिया जाता है. अगर धारवाड़ी नस्ल को उस तरह से खिलाया जाए तो धारवाड़ भैंस एक ब्यान्त में 1000 लीटर से अधिक दूध दे सकती है.
• धारवाड़ी नस्ल की भैंस मध्यम आकार की होती है.
• रंग गहरा काला होता है.
• सिर सीधा होता है.
• सींग अर्धवृत्ताकार होते हैं.
• कान खड़े होते हैं.
• थन का आकार मध्यम और बेलनाकार होता है.
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कर्नाटक का धारवाड़ पेड़ा देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में प्रसिद्ध है. इसका इतिहास 100 साल से भी ज्यादा पुराना है. वहीं धारवाड़ी भैंस के दूध से बना पेड़ा 15-20 दिनों तक खराब नहीं होता है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऐसा कहा जाता है कि इंग्लैंड की महारानी को यहां से पेड़ा भेजा जाता था. इसे वहां पहुंचने में कई दिन लग जाते थे, लेकिन वहां तक पहुंचते-पहुंचते भी यह खराब नहीं होता था.