10 साल से CRPF में है ये बकरा, नाम और काम सुनकर रह जाएंगे दंग

10 साल से CRPF में है ये बकरा, नाम और काम सुनकर रह जाएंगे दंग

गुरुवार को नक्सलियों से मुठभेड़ के बाद चामुंडा कैंप में आराम से बैठकर पेड़ के पत्ते खाते और घूमते नजर आया. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक चामुंडा बकरे के सीआरपीएफ बटालियन में शामिल होने की कहानी भी बेहद खास है. साल 2014 में बटालियन को सुकमा जिले के कांकेरलंका गांव में तैनात किया गया था. इसी दौरान एक सिपाही को यह बकरा मिला था. तब वह केवल 45 दिन का था और बीमार था.

ये है सीआरपीएफ़ का बकराये है सीआरपीएफ़ का बकरा
क‍िसान तक
  • Noida,
  • Feb 05, 2024,
  • Updated Feb 05, 2024, 4:06 PM IST

यह जरूरी नहीं कि आदमी का दोस्त सिर्फ आदमी ही हो. और यह भी जरूरी नहीं है कि अगर एक व्यक्ति मुसीबत में है तो दूसरा व्यक्ति ही उसे बाहर निकाल सकता है. यह कार्य कई बार पशु भी करते हैं. जिसे देखकर हम सभी हैरान रह जाते हैं. एक बार फिर कुछ ऐसा ही हुआ जिससे हर कोई हैरान और खुश दोनों नजर आ रहा है. दरअसल ये कहानी सीआरपीएफ की है. छत्तीसगढ़ में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की एक बटालियन 150 माओवादियों से जूझ रही है. सुकमा जिले में चल रही इस लड़ाई का तनाव दूर कर रहा है सीआरपीएफ का एक खास दोस्त.

इस खास दोस्त के बारे में जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे. यह दोस्त कोई और नहीं बल्कि एक बकरा है, जिसका नाम चामुंडा है. वह लगभग 10 वर्षों से बटालियन के साथ है. बटालियन जहां भी जाती है इसे अपने साथ ले जाती है. इस तरह वह सीआरपीएफ जवानों के साथ एक पोस्ट से दूसरे पोस्ट तक घूमता रहता है.

सीआरपीएफ के साथ रहता है ये बकरा

गुरुवार को नक्सलियों से मुठभेड़ के बाद चामुंडा कैंप में आराम से बैठकर पेड़ के पत्ते खाते और घूमते नजर आया. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक चामुंडा बकरे के सीआरपीएफ बटालियन में शामिल होने की कहानी भी बेहद खास है. साल 2014 में बटालियन को सुकमा जिले के कांकेरलंका गांव में तैनात किया गया था. इसी दौरान एक सिपाही को यह बकरा मिला था. तब वह केवल 45 दिन का था और बीमार था. इसके मालिक ने इसे कैंप के पास छोड़ दिया था. वह चलने में भी सक्षम नहीं था. इसके बाद बटालियन के लोगों ने उसकी देखभाल की और वह फिर से स्वस्थ हो गया.

ये भी पढ़ें: अपने पशुओं को खिलाएं यूरिया वाला भूसा, कम ही दिनों में बढ़ जाएगा दूध

रायपुर से आती है बकरे की दवा

अब यह कैंप के परिवार का एक सदस्य जैसा बन गया है. अगर वह बीमार पड़ जाते हैं तो जवान उनके लिए दवा लेने रायपुर जाते हैं. इतना ही नहीं यह बकरा जवानों के खराब मूड को ठीक करने का काम करता है. साथ ही जंग के तनाव को भी कम करता है. यही कारण है कि जवानों और इस बकरे के बीच कि दोस्ती काफी गहरी हो गई है. 

कैसे पड़ा इसका नाम चामुंडा

बटालियन के एक जवान ने कहा, ''जब भी हम किसी काम से जाते हैं या किसी काम से लौटते हैं तो चामुंडा माता की जय बोलते हैं. इसलिए उस दिन भी हमने चामुंडा देवी का नाम लिया और बकरी को मलेरिया की गोली खिला दी. गोली लेने के बाद, बकरा ठीक हो गया और शिविर में रहने लगा.” बटालियन का राजस्थान के अजमेर से गहरा संबंध है. वहां चामुंडा देवी का मंदिर स्थित है. उन्हीं के नाम पर इस बकरे का नाम चामुंडा रखा गया.

बकरे के लिए किया जाता है विशेष वाहन का उपयोग

तब से पिछले एक दशक में यह बकरा सीआरपीएफ बटालियन के साथ यात्रा कर चुका है. इसे एक शिविर से दूसरे शिविर तक ले जाने के लिए एक विशेष वाहन का भी उपयोग किया जाता है. एक दशक के दौरान, चामुंडा ने बटालियन के साथ नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र में सात पुलिस शिविरों की यात्रा की है. यदि चामुंडा बीमार पड़ जाए तो सैनिक उसके लिए दवा लाने भी रायपुर जाते हैं. 

परिवार के सदस्य की तरह है चामुंडा

बटालियन के एक जवान ने कहा, ''वह अब हम सभी के लिए परिवार के सदस्य की तरह है. चामुंडा बहुत अनुशासित, मिलनसार और चंचल है. अन्य बकरों के विपरीत, जब आप उसे धक्का देते हैं, तो वह आपको अपने सींगों से नहीं मारता, बल्कि आपको पीछे धकेल देता है. जब हम उसे दुलारते हैं तो उसे अच्छा लगता है और जब तक हम उसे पानी नहीं देते तब तक वह खाता या पानी नहीं पीता. वह कैंप में खुलेआम घूमता है. 

MORE NEWS

Read more!