
Organic Fodder बाजार में तेजी से ऑर्गेनिक एनिमल प्रोडक्ट की डिमांड बढ़ रही है. इसमे घी-मक्खन और दही सबसे आगे है. हालांकि ऑर्गेनिक मीट की डिमांड घरेलू संग एक्सपोर्ट मार्केट में भी है. डेयरी में सबसे ज्यादा ऑर्गेनिक घी की डिमांड आ रही है. लेकिन ऐसा नहीं है कि दूध, घी-मक्खन किसी दवाई का इस्तेमाल करने से ऑर्गेनिक हो जाएंगे. इसके लिए दो काम बहुत जरूरी है. पहला पशुओं की खुराक में शामिल चारा ऑर्गेनिक होना चाहिए, और बीमार होने पर पशुओं के इलाज में एंटीबायोटिक्स दवाईयों का इस्तेमाल नहीं किया जाए.
अगर चारे की बात करें तो चारा हरा हो या सूखा या फिर मिनरल मिक्चर, नियमों के मुताबिक सभी का ऑर्गनिक होना जरूरी है. यही वजह है कि ऑर्गनिक दूध-मीट का सर्टिफिकेट तभी मिलता है जब प्रोडक्ट जांच में खरे पाए जाते हैं. इसी के चलते ही भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी) गोबर और मूत्र से जीवामृत, बीजामृत और नीमास्त्र बनाने की ट्रेनिंग दे रहा है. पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर अभी ये केन्द्र आठ राज्यों में चल रहा है.
कृषि मंत्रालय से जुड़े कई संस्थानों में किसानों को ऑर्गेनिक चारा उगाने के बारे में बताया जा रहा है. इतना ही नहीं बकरी और गाय रिसर्च सेंटर में खुद संस्थान भी खेतों में ऑर्गेनिक चारा उगा रहे हैं. ऑर्गनिक और नेचुरल फार्मिंग के लिए जीवामृत, नीमास्त्र और बीजामृत बनाया जा रहा है. बीपीकेपी से जुड़े जानकारों की मानें तो केन्द्र पर जीवामृत गुड़, बेसन और देशी गाय के गोबर-मूत्र में मिट्टी मिलाकर बनाया जा रहा है. यह सभी चीज मिलकर मिट्टी में पहले से मौजूद फ्रेंडली बैक्टीरिया को और बढ़ा देते हैं. इसी का फायदा चारे को मिलता है.
चारा एक्सपर्ट का कहना है कि बकरे-बकरियों और भैंस को खासतौर पर ऑर्गेनिक चारा खिलाने का बड़ा फायदा है. जब मीट एक्सपोर्ट होता है तो उससे पहले हैदराबाद की एक लैब में मीट की जांच होती है. जांच में यह देखा जाता है कि मीट में किसी तरह के नुकसानदायक पेस्टीसाइट तो नहीं है. और यह सिर्फ बकरे के मीट ही नहीं बीफ के मामले में भी ऐसा ही होता है. रिर्पोट पॉजिटिव आने पर मीट के कंसाइनमेंट को रोक दिया जाता है. इससे कारोबारी को बड़ा नुकसान होता है.
केन्द्र सरकार ने भारतीय प्रकतिक कृषि पद्वति (बीपीकेपी) उपयोजना के तहत आठ राज्यों छत्तीसगढ़, करेल, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, आंध्रा प्रदेश, ओडिशा, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु में बीपीकेपी केन्द्र बनाए गए हैं. ये सभी केन्द्र करीब चार लाख हेक्टेयर जमीन पर होने वाली नेचुरल फार्मिंग को कवर कर रहे हैं.
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