
मत्स्य किसानों को नुकसान से बचाने के लिए जलीय कृषि बीमा की जानकारी देने को लेकर राजधानी में कार्यशाला हुई. पीएम-एमकेएसएसवाई के तहत बाढ़, सूखा, प्रदूषण और बीमारी जैसी आपदाओं पर बीमा कवर मिल सकता है. प्रीमियम पर 40 फीसदी तक एकमुश्त प्रोत्साहन का प्रावधान है. अनुसूचित जाति-जनजाति और महिला किसानों को अतिरिक्त राहत भी मिलेगी. डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग ने राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड के सहयोग से यह शिविर मीठापुर स्थित मत्स्य विकास भवन में रखा.
मत्स्य निदेशक तुषार सिंगला ने कहा कि बिहार में मछली उत्पादन बढ़ रहा है. वर्ष 2024-25 में उत्पादन 9.69 लाख मीट्रिक टन था, जो 2025-26 में 10.28 लाख मीट्रिक टन हो गया. उत्पादन बढ़ने के साथ जोखिम भी बढ़ता है. तालाब बह जाना, पानी खराब होना या मछली में रोग लगना किसानों की पूंजी डुबा सकता है. इसलिए केंद्र की इस योजना के तहत देश में एक लाख हेक्टेयर जल क्षेत्र को बीमा सुरक्षा देने का लक्ष्य रखा गया है. तालाब के अलावा आरएएस, केज, बायोफ्लॉक और रेसवे भी इसमें आते हैं. जिलों के प्रगतिशील मत्स्य पालक और प्रसार पदाधिकारी कार्यशाला में शामिल हुए. एनएफडीबी के अमर कुमार नायक और अन्य विशेषज्ञों ने पॉलिसी की शर्तें समझाईं.
योजना में मूलभूत और व्यापक दो तरह की पॉलिसी हैं. मूलभूत बीमा बाढ़, चक्रवात, प्रदूषण, सूखा और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं को कवर करता है. व्यापक बीमा में इनके साथ मछलियों की बीमारी जैसे अतिरिक्त जोखिम भी शामिल होते हैं. पॉलिसी लेने वाले किसान को प्रीमियम का 40 फीसदी एकमुश्त प्रोत्साहन केंद्र की ओर से मिल सकता है. इसकी अधिकतम सीमा एक लाख रुपये है. बीमा राशि 20 लाख रुपये तक हो सकती है, लेकिन ज्यादा कवर के लिए प्रीमियम भी ज्यादा देना होगा. एससी, एसटी और महिलाओं को 10 फीसदी अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे कुल लाभ 1.10 लाख रुपये तक पहुंच सकता है. जल क्षेत्र के हिसाब से प्रति हेक्टेयर 25 हजार रुपये और अधिकतम चार हेक्टेयर तक पात्रता है. गहन प्रणालियों के लिए सीमा 1800 घन मीटर बताई गई.
कार्यशाला में विभाग ने राज्य की तैयारियों का जिक्र किया. सरकारी प्रयासों से 7,990 हेक्टेयर नया जल क्षेत्र बना है. चौर भूमि पर 2,721 हेक्टेयर में आधुनिक तालाब बने हैं और 5,264 ट्यूबवेल लगाए गए हैं. राज्य में 233 मत्स्य बीज हैचरी हैं, जो करीब 70 फीसदी बीज की जरूरत पूरी करती हैं. वर्ष 2025-26 में इनसे 2,753.45 मिलियन मत्स्य बीज का उत्पादन हुआ. 89 फिश फीड मिलों से करीब 50 हजार टन मछली आहार राज्य में ही बन रहा है. ये आंकड़े बताते हैं कि उत्पादन का आधार बढ़ रहा है. बीमा उसी आधार को जोखिम से बचाने का औजार बन सकता है, बशर्ते किसान समय पर पॉलिसी लें और कागजात पूरे रखें.
बीमा तभी काम आएगा जब तालाब मालिक इसकी शर्तें समझें और नजदीकी केंद्र से जुड़ें. कार्यशाला का मकसद यही था कि जिले के अधिकारी गांव तक बात पहुंचाएं. बाढ़ वाले राज्य में तालाब का पानी अनियंत्रित होना आम है. ऐसे में थोड़ी सी प्रीमियम राहत नुकसान को संभाल सकती है. विभाग का जोर है कि योजना का लाभ कागजों में ना रह जाए. मत्स्य किसान अगर कवर लें, दावा सही समय पर करें और उत्पादन के साथ सुरक्षा भी जोड़ें, तो आय स्थिर रहने की संभावना बढ़ेगी. पटना की यह बैठक उसी दिशा में एक कदम मानी जा रही है.