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Success Story: तंगहाली से परेशान किसान बना करोड़पति और राष्ट्रपति का मेहमान, पढ़ें इस जुझारू किसान की कहानी

Success Story: तंगहाली से परेशान किसान बना करोड़पति और राष्ट्रपति का मेहमान, पढ़ें इस जुझारू किसान की कहानी

हरियाण के एक ऐसे किसान की कहानी है जिसका एक समय गुजारा चलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लग रहा था. लेकिन उसने अपने दम पर मुश्किलों का सामना करते हुए वो काम कर दिखाया जिसे आम लोग असंभव मानते थे. कभी बेरोजगारी और तंगहाली से परेशान किसान ना केवल आज करोड़ों की ऑर्गेनिक कंपनी का मालिक है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों के कारण वह दुनिया भर के किसानों के लिए एक मिसाल बन गया है.

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तंंगहाली से परेशान किसान बना करोड़पति और राष्ट्रपति का मंहमान तंंगहाली से परेशान किसान बना करोड़पति और राष्ट्रपति का मंहमान

ये एक ऐसे किसान की कहानी है, जिसके परिवार का एक समय गुजारा चलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लग रहा था. लेकिन उसने अपने दम पर मुश्किलों का सामना करते हुए वो काम कर दिखाया जिसे आम लोग असंभव मानते थे. कभी बेरोजगारी और तंगहाली से परेशान किसान ना केवल आज करोड़ों की ऑर्गेनिक कंपनी के मालिक हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों के कारण वे दुनिया भर के किसानों के लिए एक मिसाल बन गए हैं. इसके साथ कई लोगों को रोजगार भी मुहैया करवाया है. उनके द्वारा बनाई गई दवाएं राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन तक में इस्तेमाल की जाती हैं. इस किसान को पहचान दिलवाई पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने 2007 में, जिन्होंने ईश्वर सिंह को सम्मानित किया. कलाम साहब ने उनके शोध की सराहना की और उनसे इसके बारे में कई सवाल पूछे. हरसंभव मदद करने का निर्देश दिया गया और उन्होंने पूरी मदद की. इसी दिन से उनके उत्पादों का उपयोग राष्ट्रपति भवन के बगीचों में भी किया जाने लगा.

जूझारू किसान की संघर्ष की दास्तां

यह कहानी है दो एकड़ जमीन के मालिक ईश्वर कुंडू की जो हरियाणा के गांव कैलरम के रहने वाले हैं. इनकी सफलता के पीछे छीपी है संघर्ष की दास्तां. परिवार में बटवारे के बाद कम खेती की बदौलत गुजर-बसर करना मुश्किल था. इन हालातों में किसान ईश्वर ने दिल्ली में चाय की दुकान चलाने समेत कई तरह के काम किए, जिनमें कैथल में कीटनाशक की दुकान भी शामिल रही. लेकिन कीटनाशक दुकान पर बैठने से केमिकल के दुष्प्रभाव से वे बीमार पड़ गए, यह घटना उनको सबक सीखा गई कि केमिकल दवाएं मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं. यह केमिकल खेती भूमि ही नहीं, बल्कि पेयजल, हवा का भी विनाश करती है. इसके बाद उन्होंने अपनी कीटनाशक दुकान बंद कर दी और बीड़ा उठाया ऑर्गेनिक खेती का. वो भी तब जब ऑर्गेनिक खेती का कोई चलन ही नहीं था. बावजूद इसके उन्होंने देसी तौर-तरीकों से खेती करने के लिए अपने आसपास मौजूद नीम और आक-धतूरे का इस्तेमाल अपने खेतों में शुरू किया.

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लोगों ने कहा 'पागल', पर वे विचलित नहीं हुए

किसान ईश्वर को इसी बीच दिल्ली में पुरानी जड़ी-बूटियों पर एक किताब हाथ लगी. उसमें पढ़कर जुटाए गए ज्ञान को अपने दिमाग में लगाकर कड़वी-कसैलीऔर बहुत तेज गंध वाली वनस्पतियों को छांटकर शोध और प्रयोग शुरू किए. जब ईश्वर ने प्राकृतिक जड़ी-बूटियों पर शोध  शुरू किया तो खेती के जानकारों ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता. सिर्फ घास-फूस के सहारे खेती नहीं हो सकती और उन्हें लोग पागल तक कहने लगे. लेकिन ईश्वर ने साबित कर दिखाया कि जिसे लोग घास-फूस कहते हैं, ये खेती के लिए अचूक अस्त्र हैं. यह इंसानी जिंदगी के साथ-साथ वातावरण के लिए भी सही रहता है.

किसान ईश्वर अपने बनाए उत्पाद किसानों को इस्मेताल करने के लिए देने लगे. उनका यह मकसद था कि देश के किसानों को हानिकारक कीटनाशकों और खरपतवार नाशकों से बचाना है. लेकिन कुछ किसान मित्रों ने सुझाव दिया कि इस फार्मूले को बोतल में बंद करके कोई नाम रख दें क्योकि लोगों का मानना था कि मुफ्त की चीज काम नहीं करती. इसके बाद उन्होंने अपनी दवाओं को बोतल में कुछ पैसे लेकर देना शुरू कर दिया.

पुलिस केस पर झुके नहीं ईश्वर

किसान ईश्वर के बनाए गए जैविक फार्मूले और दवाओं का इस्तेमाल किसान करने लगे. लेकिन साल 2004 में कुछ कंपनियों और रसूखदार लोगों ने उन पर किसानों को गुमराह करने का पुलिस में केस दर्ज करा दिया. इस पर 06 साल तक मुकदमा चला. ईश्वर लड़े और बाइज्जत जीते भी. जीत के बाद लोगों का भरोसा बढ़ा और हजार किसान की संख्या बढ़कर लाखों में हो गई. किसानों के सहयोग से खड़ी इस कंपनी का नाम भी कृषिको रखा. पहला उत्पाद 'कमाल 505' भूमि और फसलों को कई दिक्कतों से बचाने के लिए बनाया.

यह जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के साथ ही ज़मीन में सूक्ष्मजीवों की वृद्धि में भी सहायक है. उनकी दूसरी खोज 'कमाल क्लैंप' है जो ऑर्गेनिक कार्बन का भी स्रोत है. ये फसलों में जड़गलन, फफूंदी जनित रोग, रूट रॉट आदि से बचाव में कारगर साबित हुई है. इसके इस्तेमाल से भूमि का पानी सोखने और जलधारण की क्षमता बढ़ती है. इसके उपयोग से यूरिया, डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों की खपत में भी 20 से 25% तक कमी आती है. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना ने इस खोज पर 03 साल तक परीक्षण किया और इसे बहुत कारगर पाया है.

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राष्ट्रपति के बने चहेते

कृषि में इस योगदान के लिए भारत सरकार के राष्ट्रीय नव प्रवर्तन प्रतिष्ठान की तरफ से 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें इनोवेटिव फार्मर के पुरस्कार सेे नावाजा और उनकी दवाओं का राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डेन में ट्रायल भी किया गया. इसके अलावा ईश्वर सिंह को लिम्का अवॉर्ड, महिंद्रा एंड महिंद्रा अवॉर्ड जैसे कई पुरस्कार मिल चुके हैं. भारत और आसियान देशों के बीच नव खोजों-शोध को बढ़ावा देने के लिए इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में हुए सम्मेलन में ईश्वर सिंह कुंडू को सम्मानित किया गया. साल 2019 में वे भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के एक कार्यक्रम में भी इनोवेशन स्कॉलर्स चुने गए. वे 10 स्कॉलर्स में शामिल किए गए. कई दिनों तक महामहिम राष्ट्रपति के मेहमान के तौर पर राष्ट्रपति भवन में निवास करने का अवसर मिला. कभी आम किसान रहे ईश्वर सिंह कुंडू आज हर सुख सुविधा के साथ अच्छी जिंदगी जी रहे हैं और लगातार किसान हित में काम भी कर रहे हैं.