Mustard Price: जंग और जमाखोरी ने बढ़ाई मुश्किल, सरसों तेल बना महंगाई का नया ‘हॉटस्पॉट’

Mustard Price: जंग और जमाखोरी ने बढ़ाई मुश्किल, सरसों तेल बना महंगाई का नया ‘हॉटस्पॉट’

पेट्रोल-डीजल के बाद अब खाने के तेल, खासकर सरसों, की कीमतों में तेज उछाल देखा जा रहा है. जमाखोरी और वैश्विक संकट के चलते यह आम लोगों के किचन पर बड़ा असर डाल सकता है.

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Mustard Price: जंग और जमाखोरी ने बढ़ाई मुश्किल, सरसों तेल बना महंगाई का नया ‘हॉटस्पॉट’सरसों तेल के दाम में लगी आग!

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से जूझ रहे आम लोगों के लिए अब खाने का तेल, खासकर सरसों का तेल, एक नई चिंता बनता जा रहा है. बाजार में सरसों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और इसके पीछे जमाखोरी से लेकर ईरान-अमेरिका तनाव तक कई वजहें जिम्मेदार बताई जा रही हैं. जानकारों का कहना है कि अगर समय रहते स्थिति को नहीं संभाला गया तो आने वाले दिनों में सरसों तेल भी रसोई का महंगा हिस्सा बन सकता है.

सरसों का नया रिकॉर्ड

सरसों की कीमतों ने इस बार नया रिकॉर्ड स्तर छू लिया है. देश के सबसे बड़े उत्पादक राज्य राजस्थान में इसका भाव करीब 8000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है, जबकि सरकार ने इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 6200 रुपये तय किया हुआ है. पहली नजर में यह किसानों के लिए फायदेमंद लग सकता है, लेकिन हकीकत इससे अलग बताई जा रही है.

किसानों को नहीं, फिर किसे फायदा?

विशेषज्ञों के अनुसार, इस बढ़ोतरी का मुख्य फायदा छोटे किसानों को नहीं बल्कि बड़े स्टॉकिस्ट और बड़े किसानों को मिल रहा है, जिन्होंने भारी मात्रा में सरसों का स्टॉक जमा कर रखा है. छोटे किसान आमतौर पर संसाधनों की कमी के कारण अपनी फसल जल्दी बेच देते हैं, जबकि बड़े व्यापारी और किसान बाजार में कमी का माहौल बनाकर अधिक कीमत वसूलते हैं.

राजस्थान में जमाखोरी का जंजाल

अखिल भारतीय खाद्य तेल व्यापारी संघ के अध्यक्ष शंकर ठक्कर के मुताबिक, देश में इस समय लगभग 60 प्रतिशत सरसों ही बाजार में आई है, जबकि बाकी 40 प्रतिशत स्टॉक कहीं न कहीं रोका गया है. उन्होंने आरोप लगाया कि खासकर राजस्थान में बड़े स्तर पर जमाखोरी हो रही है, जिससे कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ाया जा रहा है.

युद्ध ने आग में डाला घी

स्थिति को और जटिल बनाने में वैश्विक हालात ने भी अहम भूमिका निभाई है. ईरान-अमेरिका तनाव के कारण होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी जैसे आयातित तेलों की कीमतों में 20 से 40 प्रतिशत तक का उछाल देखा गया है. चूंकि खाद्य तेलों का बाजार एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है, इसलिए आयातित तेल महंगे होने का असर सरसों तेल पर भी पड़ा है.

हालांकि भारत सरसों उत्पादन में काफी हद तक आत्मनिर्भर है, लेकिन इसके बावजूद कीमतों में उछाल देखने को मिल रहा है. इसके पीछे एक और बड़ा कारण सरसों तेल में पाम ऑयल की ब्लेंडिंग है. जानकारों का कहना है कि राजस्थान में बड़े पैमाने पर सरसों तेल में पाम तेल मिलाया जाता है. ऐसे में जब पाम तेल महंगा होता है, तो सरसों तेल की लागत भी बढ़ जाती है.

ब्लेंडिंग की रणनीति से बढ़ी महंगाई

भविष्य की स्थिति को लेकर भी चिंता कम नहीं है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक तनाव लंबा चलता है तो कीमतों में और तेजी आ सकती है. इसका एक कारण यह भी है कि प्रमुख तेल उत्पादक देश अपनी रणनीति बदल रहे हैं. इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देश पाम ऑयल को बायोडीजल में ज्यादा इस्तेमाल करने की दिशा में बढ़ रहे हैं, जबकि अर्जेंटीना सोयाबीन तेल की ब्लेंडिंग बढ़ाने की तैयारी में है. इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेल की सप्लाई कम हो सकती है और भारत जैसे आयातक देशों पर दबाव बढ़ेगा.

समस्या बड़ी, समाधान क्या है?

इस पूरे हालात में सबसे बड़ा सवाल यह है कि समाधान क्या है. उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि सरकार को सबसे पहले जमाखोरी पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए. बाजार में रोके गए सरसों के स्टॉक को बाहर लाया जाए और आपूर्ति बढ़ाई जाए. ऐसा करने से एक तरफ किसानों को MSP से बेहतर कीमत मिलती रहेगी, वहीं दूसरी तरफ उपभोक्ताओं पर महंगाई का बोझ भी कम होगा.

फिलहाल, सरसों और उसके तेल की बढ़ती कीमतें इस ओर इशारा कर रही हैं कि महंगाई की मार अब केवल पेट्रोल-डीजल तक अटकी नहीं रही, बल्कि रसोई तक गहराई से पहुंचने लगी है. आने वाले महीनों में यह स्थिति और गंभीर हो सकती है, अगर समय रहते बाजार को स्थिर करने के उपाय नहीं किए गए.

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