Explainer: बिहार की खेती को चाहिए 'डबल इंजन सरकार' का टॉप गियर, फूड प्रोसेसिंग है असली चाबी

Explainer: बिहार की खेती को चाहिए 'डबल इंजन सरकार' का टॉप गियर, फूड प्रोसेसिंग है असली चाबी

बिहार की नई सरकार के पास राज्य को देश में अग्रणी बनाने का इससे बेहतर अवसर नहीं हो सकता.हमारे पास 13 करोड़ से अधिक आबादी का विशाल घरेलू बाजार है और मक्का, दूध, शहद व चावल का अथाह भंडार मौजूद है .अब प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर सबसे पहले बंद पड़े कोल्ड स्टोरेजों को चालू करें और उन जिलों में नए स्टोरेज बनाएं जो अब तक इनसे वंचित हैं . अगर 'डबल इंजन' सरकार फूड प्रोसेसिंग को 'मिशन मोड' में ले, तो बिहार का किसान केवल 'अन्नदाता' नहीं, बल्कि 'उद्यमी' बनकर उभरेगा और रोजगार के हजारों नए अवसर पैदा होंगे .

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Explainer: बिहार की खेती को चाहिए 'डबल इंजन सरकार' का टॉप गियर, फूड प्रोसेसिंग है असली चाबीबिहार में फूड प्रोसेस‍िंग इंडस्‍ट्री को बढ़ावा देने की जरूरत

बिहार की नई एनडीए सरकार के पास अब राज्य की तकदीर बदलने का ऐतिहासिक मौका है. यहां की माटी सोना उगलती है और किसान हाड़-तोड़ मेहनत करता है, लेकिन अफसोस कि उसे अपनी ही फसल का सही मोल नहीं मिल पाता. वजह बिल्कुल साफ है- हम सिर्फ फसल 'उगाने' में माहिर हैं, उसे 'संवारने' यानी प्रोसेसिंग में नहीं. अब चूंकि केंद्र और राज्य में एक सुर वाली 'डबल इंजन' सरकार है तो इस सुनहरे संयोग का फायदा उठाकर बिहार को फूड प्रोसेसिंग का हब बनाया जाना चाहिए, जो इस सेक्टर के लिए 'डबल इंजन' की ताकत बन सकती है.

कड़वा सच यह है कि लंबे समय तक "केंद्र में लंबे समय तक बिहार से खाद्य एवं उपभोक्ता और फूड प्रोसेसिंग विभाग के कद्दावर मंत्री रहने के बावजूद, राज्य में इस सेक्टर की हालत नहीं सुधरी. जमीन पर कोल्ड स्टोरेज और फैक्ट्रियां नदारद रहीं. कमी नीतियों में नहीं, बल्कि उन्हें लागू करने के तरीके और लचर बुनियादी ढांचे में थी. अब वक्त आ गया है कि बिहार 'सिर्फ उत्पादन' का टैग हटाकर देश का अगला 'फूड प्रोसेसिंग हब' बने. अगर खेत से सीधे मंडी जाने के बजाय अपनी सब्जी-फलों को प्रोसेस करके बेचें, तो न केवल किसानों की आमदनी दोगुनी होगी, बल्कि हमारे युवाओं को अपने ही घर में रोजगार की गारंटी भी मिलेगी.

सड़ता अनाज, लुटता किसान, हजारों करोड़ स्वाहा

बिहार एक कृषि प्रधान राज्य होने के बावजूद उचित देखरेख और स्टोरेज की कमी के कारण भारी नुकसान झेल रहा है. राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के मार्च 2025 के आंकड़े बताते हैं कि‍ राज्य में 15-25% केले, 30-50% पपीते और बड़ी मात्रा में गोभी जैसी सब्जियां उपभोक्ताओं तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाती हैं.

सबसे दुखद यह है कि केवल अनाज की बर्बादी से ही सालाना 4,500 करोड़ रुपये और फल-सब्जियों के खराब होने से 2,000 करोड़ रुपये का आर्थिक झटका लगता है. अगर फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स लगाकर इनका सही इस्तेमाल किया जाए तो बिस्किट और आटे जैसे उत्पादों के जरिए इस हजारों करोड़ के घाटे को मुनाफे में बदला जा सकता है .

मक्का और शहद, बिहार का अनछुआ खजाना

बिहार की कृषि में कुछ ऐसे सेक्टर उभर कर आए हैं, जो गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं. बिहार में मक्के की खेती ने क्रांति ला दी है. वर्ष 2020-21 से 2023-24 के बीच मक्का उत्पादन में 66.6% की भारी उछाल दर्ज की गई है. समस्तीपुर, सहरसा, खगड़िया और कटिहार जैसे जिले मक्का उत्पादन के पावरहाउस बन चुके हैं.

मक्के से स्टार्च, कॉर्नफ्लेक्स, इथेनॉल और पोल्ट्री फीड बनाने की असीम संभावनाएं हैं, जो अभी तक पूरी तरह भुनाई नहीं गई हैं. शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि बिहार देश के कुल शहद उत्पादन का लगभग 50 फीसदी करीब 84 मीट्रिक टन पैदा करता है. मुजफ्फरपुर और वैशाली की लीची हनी की मांग दुनिया भर में है. लेकिन, बड़ी प्रोसेसिंग यूनिट्स न होने के कारण इसका बड़ा मुनाफा बिचौलिए ले जाते हैं.

दूध और धान का उत्पादन बेमिसाल, बस इंडस्ट्री का इंतज़ार"

बिहार सालाना 65.17 लाख टन दूध का उत्पादन करता है, लेकिन इसमें से केवल 12-13% दूध ही प्रोसेस हो पाता है. बाकी दूध या तो खुला बिकता है या खराब हो जाता है. पनीर, घी, और पैकेटबंद दूध के बाजार में अभी बहुत बड़ा गैप है. वहीं, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद और भागलपुर को बिहार का धान का कटोरा कहा जाता है. यहां कतरनी और सोनाचूर जैसे  खास चावल हैं. अगर यहा राइस मिलों के साथ-साथ राइस ब्रान ऑयल की यूनिट्स लगें, तो किसानों की आय सीधे बढ़ सकती है.

इन्फ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियां, कहां अटकी है गाड़ी?

नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बुनियादी ढांचा है. फूड प्रोसेसिंग के लिए कोल्ड स्टोरेज रीढ़ की हड्डी होते हैं, लेकिन बिहार में इनकी स्थिति चिंताजनक है. राज्य में कुल 355 कोल्ड स्टोरेज हैं, जिनकी क्षमता 16 लाख मीट्रिक टन है. दुखद यह है कि इनमें से 120 कोल्ड स्टोरेज बंद पड़े हैं और 23 अभी भी बन ही रहे हैं.

बांका, मुंगेर, जमुई, शिवहर, शेखपुरा और अरवल एक भी कोल्ड स्टोरेज नही है. इन जिलों के किसानों के पास अपनी सब्जी-फल औने-पौने दाम में बेचने के अलावा कोई चारा नहीं है. उद्योगो के लिए बिजली की अनियमित आपूर्ति और वोल्टेज की समस्या के कारण उद्योगों को महंगे जेनरेटर पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ जाती है.

युवाओं के लिए रोजगार का नया रोडमैप

बिहार के युवा रोजगार के लिए पलायन करते हैं, जबकि कच्चा माल यहीं है. फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री ज्यादा मजदूरो की जरूरत होती है. यानी इसमें मशीनों के साथ-साथ लोगों की भी खूब जरूरत पड़ती है. पैकेजिंग, ट्रांसपोर्ट, मार्केटिंग और क्वालिटी कंट्रोल जैसे क्षेत्रों में हजारों नौकरियां पैदा हो सकती हैं. यह ग्रामीण विकास का आधार बन सकता है, जिससे गांवों से शहरों की ओर होने वाला पलायन रुकेगा.

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