दुनिया के टॉप 2% वैज्ञानिकों में फिर चमके डॉ. मनोज त्रिपाठी, लगातार छठी बार हासिल की उपलब्धि

दुनिया के टॉप 2% वैज्ञानिकों में फिर चमके डॉ. मनोज त्रिपाठी, लगातार छठी बार हासिल की उपलब्धि

भोपाल स्थित केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. मनोज त्रिपाठी को लगातार छठी बार दुनिया के शीर्ष 2% वैज्ञानिकों की सूची में जगह मिली है. सोयाबीन आधारित पौष्टिक खाद्य पदार्थों, प्रोबायोटिक सोया चीज स्प्रेड और खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में उनके शोध को वैश्विक पहचान मिली है.

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दुनिया के टॉप 2% वैज्ञानिकों में फिर चमके डॉ. मनोज त्रिपाठी, लगातार छठी बार हासिल की उपलब्धि

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान (CIAE) के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. मनोज त्रिपाठी ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है. उन्हें वर्ष 2026 में लगातार छठी बार दुनिया के शीर्ष 2 प्रतिशत वैज्ञानिकों की प्रतिष्ठित सूची में जगह मिली है. खाद्य प्रसंस्करण और खाद्य अनुसंधान के क्षेत्र में उनके काम को इस उपलब्धि के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है.

डॉ. मनोज त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के फाजिलनगर ब्लॉक के महासोंन गांव के निवासी हैं उनकी इस सफलता से उनके गृह क्षेत्र के साथ-साथ मध्य प्रदेश और देश का भी नाम रोशन हुआ है.

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के मानकों पर हुआ चयन

दुनिया के शीर्ष 2 प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची वैज्ञानिकों के शोध और उनके काम के प्रभाव को ध्यान में रखकर तैयार की जाती है.इसे स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित मानकों के आधार पर तैयार किया जाता है. इस सूची को वैज्ञानिक प्रकाशक एल्सेवियर के सहयोग से प्रकाशित किया जाता है.

इसमें वैज्ञानिकों के शोध पत्रों, उनके शोध को दूसरे वैज्ञानिकों द्वारा दिए गए संदर्भों (साइटेशन) और विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान जैसे कई पहलुओं को देखा जाता है.इस सूची में लगातार छह साल तक जगह बनाना डॉ. त्रिपाठी के शोध कार्यों की निरंतरता और उनके प्रभाव को दर्शाता है.

पौष्टिक खाद्य पदार्थों पर काम कर रहे हैं डॉ. त्रिपाठी

डॉ. मनोज त्रिपाठी का शोध मुख्य रूप से सोयाबीन, मोटे अनाज यानी श्रीअन्न, फलों और खाद्य प्रसंस्करण से निकलने वाले उप-उत्पादों के बेहतर इस्तेमाल पर केंद्रित है. वह ऐसे खाद्य पदार्थ और तकनीक विकसित करने पर काम कर रहे हैं, जिनसे लोगों को पौष्टिक भोजन मिल सके और कृषि उपज का अधिक से अधिक उपयोग किया जा सके.उनके शोध में सोयाबीन से पौष्टिक और प्रोबायोटिक खाद्य पदार्थ तैयार करना भी शामिल है. प्रोबायोटिक खाद्य पदार्थों में ऐसे जीवित सूक्ष्मजीव होते हैं, जो पर्याप्त मात्रा में मौजूद होने पर स्वास्थ्य को लाभ पहुंचा सकते हैं.

इसके अलावा वह मोटे अनाज और फलों से नए खाद्य उत्पाद तैयार करने तथा खाद्य प्रसंस्करण के दौरान निकलने वाले अवशेषों का उपयोगी उत्पादों में बदलने पर भी काम कर रहे हैं.इससे खाद्य अपशिष्ट कम करने और कृषि उत्पादों का मूल्य बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

प्रोबायोटिक सोया चीज स्प्रेड तकनीक को मिला पेटेंट

डॉ. त्रिपाठी की प्रमुख उपलब्धियों में प्रोबायोटिक सोया चीज स्प्रेड तकनीक का विकास शामिल है. इस तकनीक को भारत सरकार से पेटेंट भी मिल चुका है.यह तकनीक सोयाबीन से एक खास तरह का खाद्य उत्पाद तैयार करने से जुड़ी है. सोयाबीन प्रोटीन का अच्छा स्रोत है और इससे नए पौष्टिक खाद्य पदार्थ विकसित करने की संभावनाएं बढ़ती हैं.इस तरह के शोध से खाद्य उत्पादों में विविधता लाने और कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है.

डॉ. त्रिपाठी ने खाद्य गुणवत्ता, सुरक्षित खाद्य उत्पादों के विकास और कृषि संसाधनों के बेहतर उपयोग से जुड़े कई अन्य शोध भी किए हैं.उनके नाम अनेक शोध पत्र और पुस्तकें प्रकाशित हैं. वैज्ञानिक अनुसंधान और नई तकनीकों के विकास के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान भी मिल चुके हैं. वह खाद्य अनुसंधान के क्षेत्र में राष्ट्रीय वैज्ञानिक अकादमी के सदस्य भी हैं.

गृह क्षेत्र में खुशी, उपलब्धि को बताया गर्व की बात

डॉ. मनोज त्रिपाठी को लगातार छठी बार दुनिया के शीर्ष 2 प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची में जगह मिलने पर उनके गृह क्षेत्र में भी खुशी जताई गई है.

फाजिलनगर के विधायक सुरेंद्र कुशवाहा और भाजपा गोरखपुर के क्षेत्रीय उपाध्यक्ष राधेश्याम पांडेय ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त की.उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, मध्य प्रदेश, देश और डॉ. त्रिपाठी के गृह क्षेत्र के लिए गर्व की बात है.

डॉ. त्रिपाठी की यह सफलता बताती है कि भारतीय वैज्ञानिक खाद्य प्रसंस्करण और कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं.उनका शोध कृषि उपज से बेहतर और पौष्टिक खाद्य उत्पाद तैयार करने, खाद्य अपशिष्ट का उपयोग करने और नई प्रसंस्करण तकनीकों को विकसित करने की दिशा में उपयोगी साबित हो सकता है.

 

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