चीनी के बढ़े दाम के बीच महाराष्ट्र में गन्ना आंदोलनमहाराष्ट्र में गन्ना पेराई सीजन की शुरुआत के साथ ही किसानों और चीनी मिलों के बीच टकराव की स्थिति बन गई है. स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के नेतृत्व में गन्ना किसानों का आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है. संगठन के प्रमुख राजू शेट्टी ने साफ कर दिया है कि जब तक किसानों की प्रमुख मांगें नहीं मानी जातीं, तब तक आंदोलन जारी रहेगा और कई क्षेत्रों में मिलों को पेराई शुरू नहीं करने दी जाएगी.
राज्य में 15 अक्टूबर से नए सीजन की गन्ना पेराई शुरू हुई है, लेकिन इसकी रफ्तार बेहद धीमी रही. पहले दिन केवल 40 चीनी मिलों में ही पेराई शुरू हो सकी. दूसरी ओर, सातारा, कोल्हापुर और सांगली जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक जिलों में किसानों ने चीनी मिलों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. कई स्थानों पर किसानों ने मिल परिसरों के बाहर प्रदर्शन किया और प्रबंधन को काम शुरू करने से रोका.
'किसान तक' से बातचीत में राजू शेट्टी ने कहा कि बाजार में चीनी की कीमतें पिछले वर्षों की तुलना में काफी बढ़ चुकी हैं. उनके मुताबिक खुदरा बाजार में चीनी 10 से 15 रुपये प्रति किलो अधिक कीमत पर बिक रही है, लेकिन इस बढ़ोतरी का लाभ किसानों तक नहीं पहुंच रहा है.
उन्होंने कहा कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है. डीजल, मजदूरी, खाद और सिंचाई जैसी लागतों में भारी इजाफा हुआ है, जबकि किसानों की आमदनी लगभग स्थिर बनी हुई है. ऐसे में चीनी उद्योग से होने वाले अतिरिक्त लाभ का हिस्सा किसानों को मिलना चाहिए.
राजू शेट्टी का कहना है कि इस साल जल्दबाजी में शुरू की जा रही पेराई का नुकसान केवल किसानों को ही नहीं बल्कि चीनी मिलों को भी उठाना पड़ेगा. उनका दावा है कि समय से पहले गन्ने की कटाई और पेराई शुरू करने से गन्ने में चीनी की मात्रा कम रहेगी, जिससे चीनी रिकवरी घट जाएगी.
उन्होंने कहा कि सामान्य परिस्थितियों की तुलना में प्रत्येक क्विंटल गन्ने से लगभग 8.5 किलोग्राम तक कम चीनी मिल सकती है. इसका सीधा असर उत्पादन लागत और किसानों के भुगतान पर पड़ेगा. कम रिकवरी की स्थिति में मिलों की आय घटेगी और किसानों को भी कम मूल्य मिलने की आशंका रहेगी.
स्वाभिमानी शेतकरी संगठन ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं. राजू शेट्टी का कहना है कि केंद्र सरकार के निर्देशों पर महाराष्ट्र सरकार चीनी मिलों पर जल्द पेराई शुरू करने का दबाव बना रही है. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी अधिकारी फोन के माध्यम से मिल प्रबंधन पर दबाव डाल रहे हैं और उन्हें जल्द संचालन शुरू करने के निर्देश दे रहे हैं.
हालांकि सरकार की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.
गन्ना किसानों का संगठन तीन प्रमुख मांगों को लेकर आंदोलन कर रहा है-
चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य (MSP) 31 रुपये प्रति किलो से बढ़ाकर 50 रुपये प्रति किलो किया जाए.
इथेनॉल की खरीद तेल कंपनियों द्वारा 70 रुपये प्रति लीटर की दर से की जाए.
गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) बढ़ाकर 550 रुपये प्रति क्विंटल किया जाए.
किसानों का कहना है कि जब तक इन मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं होता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा.
गुरुवार को राज्य के अलग-अलग हिस्सों में किसानों ने विरोध प्रदर्शन कर चीनी मिलों का कामकाज बाधित किया. सातारा, कोल्हापुर और सांगली में आंदोलन का असर सबसे अधिक देखने को मिला. किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार और मिल प्रबंधन ने उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं लिया तो वे आगे और बड़ा आंदोलन करेंगे.
किसान संगठनों ने यहां तक कहा है कि वे मिल परिसर में जाकर मशीनें नहीं चलने देंगे और पेराई का विरोध जारी रखेंगे.
इस बीच महाराष्ट्र के पूर्व चीनी आयुक्त और रिटायर्ड आईएएस अधिकारी शेखर गायकवाड ने भी किसानों की कई मांगों का समर्थन किया है. उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य में वृद्धि की जरूरत है.
गायकवाड के अनुसार, इस वर्ष महाराष्ट्र में गन्ने का उत्पादन गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है. कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति और मौसम संबंधी समस्याओं के कारण उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है. उन्होंने अनुमान जताया कि इस बार चीनी मिलों का पेराई सीजन मुश्किल से 100 दिन चल पाएगा, जबकि सामान्य वर्षों में यह अवधि 150 से 200 दिन तक रहती है.
उनका कहना है कि कम उत्पादन का असर अगले कुछ महीनों में चीनी बाजार पर दिखाई देगा. फिलहाल नई पेराई शुरू होने से कीमतों में थोड़ी नरमी आ सकती है, लेकिन नवंबर के बाद फिर तेजी लौटने की संभावना है.
शेखर गायकवाड का मानना है कि आने वाले समय में भारत को कच्ची चीनी का आयात करना पड़ सकता है. उनके अनुसार अगले वर्ष लगभग 15 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की संभावना है, जिसकी कीमत 6,000 रुपये प्रति क्विंटल से कम नहीं होगी.
इसके अलावा दुनिया के सबसे बड़े चीनी निर्यातक देशों में शामिल ब्राजील में इथेनॉल उत्पादन पर बढ़ते जोर का असर भी वैश्विक चीनी बाजार पर पड़ेगा. यदि ब्राजील चीनी निर्यात कम करता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ेगा, जिसका असर भारत सहित अन्य देशों पर भी दिखाई देगा.
गायकवाड ने बताया कि महाराष्ट्र की चीनी मिलों पर लागत का बोझ उत्तर प्रदेश की मिलों की तुलना में अधिक होता है. महाराष्ट्र में अधिकांश सहकारी चीनी मिलें किसानों के खेतों से गन्ने की कटाई और ढुलाई का काम भी करवाती हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में किसान खुद कटाई कर गन्ना मिल तक पहुंचाते हैं.
इस वजह से महाराष्ट्र की चीनी मिलों की लागत बढ़ जाती है और किसानों को ज्यादा भुगतान करने की उनकी क्षमता प्रभावित होती है. उन्होंने सुझाव दिया कि चीनी मिलों को सस्ता लोन उपलब्ध कराया जाए और ब्याज दरों में राहत दी जाए ताकि उद्योग और किसान दोनों को फायदा हो सके.
महाराष्ट्र में गन्ना पेराई सीजन शुरू होते ही किसानों और चीनी उद्योग के बीच टकराव बढ़ गया है. एक तरफ किसान बढ़ती लागत के बीच बेहतर मूल्य की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर उत्पादन में संभावित गिरावट और चीनी बाजार की चुनौतियां उद्योग पर दबाव बढ़ा रही हैं. ऐसे में सरकार, चीनी मिलों और किसान संगठनों के बीच जल्द समाधान न निकला तो इसका असर न केवल गन्ना किसानों बल्कि पूरे चीनी क्षेत्र और उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है.
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