मराठवाड़ा में सूखे से हाहाकार! 653 किसानों की मौत (सांकेतिक तस्वीर)महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में सूखे ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. बारिश की कमी के कारण खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद हो रही हैं. कई जगह खेतों में पानी नहीं है. पशुओं के लिए चारे की कमी हो रही है और लोगों को पीने के पानी के लिए भी परेशान होना पड़ रहा है. खेती से कमाई नहीं होने और कर्ज का बोझ बढ़ने से किसान गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं. इसी बीच, किसानों की आत्महत्या के मामले भी सामने आ रहे हैं. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 1 जनवरी से 31 अगस्त 2026 तक मराठवाड़ा के आठ जिलों में 653 किसानों ने आत्महत्या की है. इन घटनाओं ने किसानों की हालत और उन्हें मिलने वाली सरकारी मदद पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में बीड, परभणी, छत्रपति संभाजीनगर, नांदेड़, धाराशिव, जालना, लातूर और हिंगोली जिले आते हैं. इन सभी जिलों में किसानों की आत्महत्या के मामले सामने आए हैं. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, बीड में सबसे ज्यादा 149 किसानों ने आत्महत्या की. वहीं, छत्रपति संभाजीनगर में 138, धाराशिव में 88, नांदेड़ में 82 और जालना में 61 किसानों की मौत हुई. इसके अलावा लातूर में 46, परभणी में 45 और हिंगोली में 44 किसानों की आत्महत्या दर्ज की गई. ये आंकड़े बताते हैं कि मराठवाड़ा में किसानों के सामने आर्थिक और खेती से जुड़ी परेशानियां कितनी गंभीर हैं. हालांकि, हर मामले के पीछे की परिस्थितियों की अलग-अलग जांच जरूरी है.
मराठवाड़ा में इस साल पर्याप्त बारिश नहीं होने से किसानों की परेशानी बढ़ गई है. खेतों में पानी की कमी के कारण फसलों की बढ़वार प्रभावित हो रही है. कई किसानों को अपनी फसल बचाने के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है. इससे खेती पर होने वाला खर्च तो बढ़ रहा है, लेकिन आमदनी की उम्मीद कम होती जा रही है. सूखे का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है. गांवों में पीने के पानी की कमी और पशुओं के लिए चारे की समस्या भी सामने आ रही है. जिन परिवारों की रोजी-रोटी खेती पर निर्भर है, उनके लिए घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है. ऐसे में कर्ज चुकाने, बच्चों की पढ़ाई और परिवार की जरूरतें पूरी करने का दबाव भी बढ़ रहा है.
महाराष्ट्र सरकार के कैबिनेट मंत्री संजय शिरसाट ने माना कि सूखे के कारण किसान परेशान हैं. उन्होंने कहा कि सरकार किसानों की मदद करने के लिए तैयार है. आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को भी सरकारी नियमों के अनुसार सहायता देने की बात कही गई है. संजय शिरसाट ने कहा कि वर्ष 1972 के बाद महाराष्ट्र में इस तरह के गंभीर सूखे की स्थिति देखने को मिल रही है. सरकार सूखे से प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति का जायजा ले रही है और प्रभावित किसानों को राहत देने के लिए कदम उठाए जाएंगे. हालांकि, किसानों के लिए सबसे जरूरी यह है कि उन्हें समय पर मदद मिले, ताकि वे अपनी खेती और परिवार का खर्च संभाल सकें.
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के वरिष्ठ नेता अंबादास दानवे ने किसानों की स्थिति को लेकर राज्य सरकार पर निशाना साधा है. उन्होंने कहा कि पानी की कमी इतनी बढ़ गई है कि कई जगह टैंकरों से पानी पहुंचाना पड़ रहा है. दानवे ने चिंता जताते हुए कहा कि अगर अक्टूबर में ही पानी की इतनी कमी है, तो नवंबर से लेकर गर्मियों तक लोगों और किसानों की हालत कैसी होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. उन्होंने सरकार पर किसानों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेने का आरोप लगाया.
उनका कहना है कि सूखे की स्थिति को देखते हुए सरकार को पहले से तैयारी करनी चाहिए, ताकि आने वाले महीनों में ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को पानी और दूसरी जरूरी सुविधाओं की कमी का सामना न करना पड़े.
महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने भी किसानों की आत्महत्या के मुद्दे पर सरकार की आलोचना की है. उन्होंने सरकारी विभागों के लिए नई गाड़ियां खरीदने पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक ओर किसानों को राहत देने के लिए पर्याप्त मदद नहीं मिल रही है, वहीं दूसरी ओर सरकारी खर्च किए जा रहे हैं. सपकाल ने किसानों की आत्महत्या के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया और उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग की. उनके बयान से साफ है कि किसानों की स्थिति को लेकर राज्य में राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है. विपक्ष का कहना है कि सूखे और फसल बर्बाद होने से परेशान किसानों को तत्काल आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए. वहीं, किसानों और उनके परिवारों को यह उम्मीद है कि सरकार उनकी समस्याओं को समझते हुए जल्द राहत पहुंचाएगी.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और जालना से सांसद डॉ. कल्याण काले ने आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों के लिए आर्थिक सहायता बढ़ाने की मांग की है. उन्होंने कहा कि ऐसे परिवारों को 10 लाख रुपये की मदद दी जानी चाहिए. इसके साथ ही मृतक किसानों के बच्चों की स्कूल और कॉलेज की फीस माफ करने की मांग भी की. डॉ. काले ने कहा कि किसानों की समस्या केवल अनाज वाली फसलों तक सीमित नहीं है. सूखे के कारण बागवानी करने वाले किसानों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. खासकर मौसंबी और अनार की खेती करने वाले किसानों की परेशानी बढ़ गई है.
उन्होंने बागवानी फसलों को हुए नुकसान के लिए किसानों को प्रति हेक्टेयर दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की मांग की. उनका कहना है कि खेती में नुकसान होने के बाद किसानों के पास कमाई का दूसरा साधन नहीं बचता. ऐसे में आर्थिक मदद से उन्हें दोबारा खड़े होने में सहारा मिल सकता है.
सिल्लोड के कृषि अधिकारी ने किसानों से मुश्किल समय में धैर्य रखने की अपील की है. उन्होंने बताया कि किसानों की आत्महत्या के कुछ मामले सामने आए हैं और उनकी जांच की जा रही है. अधिकारी ने कहा कि सरकार किसानों की मदद के लिए तैयार है. उन्होंने किसानों से अपील की कि वे परेशानी में हताश होकर कोई गलत कदम न उठाएं और जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारियों से संपर्क करें. सूखे और फसल खराब होने के कारण किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ना चिंता का विषय है. ऐसे में जरूरी है कि प्रभावित परिवारों की पहचान कर उन्हें सरकारी योजनाओं और राहत का लाभ समय पर दिया जाए.
मराठवाड़ा के विभागीय आयुक्त जी. श्रीकांत ने बताया कि सूखे की स्थिति का आकलन करने के लिए एक तय प्रक्रिया अपनाई जाती है. इसके तहत ट्रिगर-1 और ट्रिगर-2 की प्रक्रिया पूरी की जाती है. इसके बाद केंद्र सरकार की टीम प्रभावित इलाकों का दौरा करती है और वहां की स्थिति का जायजा लेकर अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपती है. रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाती है. उन्होंने बताया कि सूखे का आकलन करते समय केवल फसलों को हुए नुकसान को ही नहीं देखा जाता. इसमें लोगों की जरूरतों, पशुओं के लिए चारे, पीने के पानी और खाद्यान्न की उपलब्धता जैसे जरूरी पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाता है.
इस प्रक्रिया के जरिए यह समझने की कोशिश की जाती है कि सूखे का असर कितना गंभीर है और प्रभावित इलाकों में किस तरह की मदद की जरूरत है. अब किसानों की नजर इस बात पर है कि राहत की प्रक्रिया कितनी जल्दी पूरी होती है और उन्हें सहायता कब मिलती है.
मराठवाड़ा में सूखे की गंभीर स्थिति के बीच छत्रपति संभाजीनगर जिले की सिल्लोड तहसील से किसान दीपक काकडे की आत्महत्या का मामला सामने आया है. दीपक की मौत के बाद उनका परिवार गहरे संकट में है. परिवार के मुताबिक, दीपक पर करीब एक लाख रुपये का कर्ज था. बारिश की कमी के कारण उनकी अदरक की फसल सड़ गई थी और कपास की फसल भी बुरी तरह प्रभावित हुई थी. खेती से आमदनी नहीं होने के कारण परिवार के सामने घर चलाने का संकट खड़ा हो गया था. एक ओर फसल बर्बाद हो गई, वहीं दूसरी ओर कर्ज चुकाने और परिवार की जरूरतें पूरी करने का दबाव बढ़ता गया.
दीपक के पिता बबन काकडे ने बताया कि उनके बेटे पर कर्ज था और खेत में पानी नहीं होने के कारण फसलें खराब हो रही थीं. खेती से कमाई नहीं होने के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ रही थी. बेटे की मौत के बाद परिवार के सामने अब भविष्य को लेकर भी बड़ी चिंता खड़ी हो गई है.
दीपक काकडे की पत्नी आशा ने बताया कि इस साल खेती से कोई आमदनी नहीं हुई. बारिश नहीं होने के कारण अदरक की फसल खराब हो गई और कपास भी सूख गई. खेती और घर का खर्च चलाने के लिए परिवार को कर्ज लेना पड़ा. आशा के मुताबिक, घटना वाली रात उन्होंने अपने पति के साथ खाना खाया था और दोनों सो गए थे. अगली सुबह जब वह अपने पति को देखने गईं, तो उन्होंने उन्हें फंदे से लटका हुआ पाया. दीपक की मौत ने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया है. खेती ही उनकी कमाई का मुख्य साधन थी. जब फसल से आमदनी नहीं हुई, तो परिवार की आर्थिक स्थिति संभालना मुश्किल हो गया.
दीपक काकडे अपने पीछे तीन छोटे बच्चों को छोड़ गए हैं. उनकी पत्नी आशा के मुताबिक, उनकी सात महीने की बेटी, पांच साल का बेटा और सात साल का एक और बेटा है. पति की मौत के बाद अब तीनों बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी आशा के कंधों पर आ गई है. एक तरफ पति को खोने का दुख है, तो दूसरी तरफ बच्चों की परवरिश, पढ़ाई और घर के खर्च की चिंता है. ऐसे समय में परिवार को आर्थिक सहारे की जरूरत है, ताकि बच्चों का भविष्य सुरक्षित रह सके. आशा काकडे ने सरकार से मदद की अपील की है. उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी आर्थिक सहायता दी जाए, जिससे वह अपने तीनों बच्चों का पालन-पोषण कर सकें और उन्हें अच्छी जिंदगी दे सकें.
दीपक का मामला यह भी दिखाता है कि जब फसल खराब होती है और खेती से कमाई बंद हो जाती है, तो उसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है. इसलिए सूखे से प्रभावित किसानों को राहत देने के साथ-साथ संकट में फंसे परिवारों को समय पर मदद और जरूरी सहायता उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है.
मराठवाड़ा में सूखे, पानी की कमी, फसल बर्बाद होने और कर्ज के कारण किसानों के सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है. एक तरफ किसान अपनी फसल बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ परिवार का खर्च चलाने और कर्ज चुकाने की चिंता उन्हें परेशान कर रही है. किसानों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों ने राज्य सरकार की राहत व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं. विपक्ष जहां सरकार से जवाब मांग रहा है, वहीं सरकार की ओर से प्रभावित किसानों और परिवारों की मदद का भरोसा दिया गया है. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सूखे से प्रभावित किसानों तक राहत कब पहुंचेगी और उन्हें कितनी आर्थिक सहायता मिलेगी. इसके साथ ही दीपक काकडे के परिवार जैसे संकट से गुजर रहे परिवारों को समय पर मदद मिलना जरूरी है, ताकि उनके बच्चों की पढ़ाई और भविष्य पर संकट न आए.
मराठवाड़ा के किसानों के लिए इस समय केवल आश्वासन काफी नहीं है. उन्हें पानी, पशुओं के लिए चारा, फसल के नुकसान की भरपाई और आर्थिक सहायता जैसी जरूरी मदद समय पर मिलनी चाहिए. साथ ही, मानसिक संकट से जूझ रहे किसानों और उनके परिवारों को भी सहारा देना जरूरी है. (इसरारुद्दीन चिश्ती का इनपुट)
ये भी पढ़ें:
CG Success Story: कभी गांव-गांव किराये पर देते थे कृषि उपकरण, आज खड़ा किया 7 करोड़ का कारोबार!
World Food Day 2026: थाली में पोषण, खेत में तकनीक; भुखमरी पर बड़ा वार
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today