
अनार की खेती किसानों और बागवानों के लिए मुनाफे का सौदा मानी जाती है लेकिन एक छोटी-सी गलती पूरी फसल को नुकसान पहुंचा सकती है. खासतौर पर अनार में लगने वाला फल छेदक कीड़ा और बाकी कीट फल की क्वालिटी और पैदावार दोनों पर सीधा असर डालते हैं. कई बार तो कीड़ों के कारण फल अंदर से सड़ जाते हैं और बाजार में बेचने लायक भी नहीं बचते. ऐसे में अगर समय रहते सही उपाय कर लिए जाएं तो अनार के बागों को कीटों से बचाया जा सकता है और एक भी फल बेकार होने से रोका जा सकता है. अनार के बाग में कीड़ों और बीमारियों के मैनेजमेंट के लिए एक इंटीग्रेटेड अप्रोच का इस्तेमाल करना जरूरी है जिसमें जरूरत के हिसाब से सफाई, बायोलॉजिकल उपाय और केमिकल उपाय शामिल हैं.
अनार के बगीचे में एक ऐसा समय होता है जो उसके आराम करने का माना जाता है. इस दौरान बगीचे का रेगुलर इंस्पेक्शन किया जाना चाहिए.अगर बगीचे में स्टेम बोरर, पिन होल बोरर, वीविल और पत्ती खाने वाले कीड़े का इंफेक्शन दिखे तो जरूरत के हिसाब से 15 से 20 दिन के गैप पर सही स्प्रे करना चाहिए.लेकिन से उपाय तभी करने चाहिए जब कीड़ों का इंफेक्शन नजर आए.
आप 4 किलो लाल मिट्टी + 20 एमएल क्लोरपाइरीफॉस (20 EC) + 25 g कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (50 WP) प्रति 10 लीटर पानी या 10 फीसदी बोर्डो पेस्ट + 20 ml क्लोरपाइरीफॉस (20 EC) प्रति 10 लीटर पानी मिलाकर तैयार पेस्ट को पेड़ के तने पर जमीन से 2-2.5 फीट की दूरी पर लगाएं.
रेस्ट पीरियड के दौरान, मौसम और फसल की दिक्कतों के हिसाब से 10 से 15 दिनों के गैप पर ये स्प्रे करने चाहिए. 1 फीसदी बोर्डो मिक्सचर या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (50 WP) 2-2.5 ग्राम या कॉपर हाइड्रॉक्साइड (53.8 WP) 2 ग्राम या ब्रोनोपोल (95%) 0.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में बारी-बारी से इस्तेमाल करें.अगर फंगल बीमारी का पता चले तो मैंकोजेब (75 WP) 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का एक स्प्रे या एग्रोकेमिकल्स का प्रयोग किया जा सकता है.बोर्डो मिक्सचर को छोड़कर, सभी पेस्टीसाइड्स को अच्छी क्वालिटी वाले स्टिकर स्प्रेडर से 0.25 ml प्रति लीटर पानी की दर से स्प्रे करना चाहिए.
कीड़ों को खत्म करने के लिए रासायनिक दवाओं पर पूरी तरह निर्भर रहना सही नहीं है. इसकी जगह किसान नीम तेल या नीम खली से बने जैविक घोल का छिड़काव कर सकते हैं. 3 से 5 मिली नीम तेल को एक लीटर पानी में मिलाकर 10 से 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करने से कीटों की संख्या काफी कम हो जाती है.यह तरीका पर्यावरण के लिए सुरक्षित है और फल भी केमिकल-फ्री रहते हैं.
यह भी पढ़ें-
Copyright©2025 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today