पेस्टिसाइड मैनेजमेंट बिल 2025केंद्र सरकार ने नए पेस्टिसाइड बिल का मसौदा जारी किया है. इसे ड्राफ्ट पेस्टिसाइड मैनेजमेंट बिल, 2025 नाम दिया गया है. यह प्रस्तावित बिल देश में पहले से चले आ रहे 'इनसेक्टिसाइड्स एक्ट 1968' और 'इनसेक्टिसाइड्स रूल्स, 1971' को रिप्लेस करेगा. कई साल की देरी के बाद देश में इस तरह का कोई नया और कड़ा विधेयक लाने की तैयारी है जिससे कीटनाशकों की दुनिया में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है. खेती-बाड़ी में नकली कीटनाशकों ने जिस तरह से पैर पसारा है, जिस तरह से नक्कालों का धंधा फल-फूल रहा है, उसे देखते हुए लंबे समय से इस बिल की मांग की जा रही थी. अब सरकार ने इस पर देर ही सही, लेकिन अहम कदम बढ़ा दिए हैं.
इस बिल का मसौदा पढ़ें तो सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आती है कि अब किसानों को सुरक्षित, असरदार और क्वालिटी पेस्टिसाइड मिलने का रास्ता साफ होगा. इसके साथ ही कीटनाशकों से किसानों और पर्यावरण को होने वाले नुकसान से भी सुरक्षा मिलेगी. यही नहीं, कीटनाशकों से जानवरों और मधुमक्खियों जैसे छोटे जीवों को होने वाले नुकसान से भी राहत मिल सकेगी.
तो, आइए जान लेते हैं कि पहले के कानून और नए प्रस्तावित कानून से किस तरह के बदलाव की उम्मीद है.
कीटनाशकों के मामले में देश में अभी तक ऐसा कानून चल रहा है जिसे 1968 के समय की जरूरतों को देखते हुए बनाया गया. तब का समय कुछ और था और मौजूदा समय कुछ और है. तब से लेकर अब तक बहुत बदलाव हुए हैं. तब फसलों पर हमला करने वाले कीटों का खतरा कम था और कीटनाशक भी कम थे. अब समय पूरी तरह से बदल गया है.
यह कहना गलत नहीं होगा कि कीटनाशकों का सही और सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल न किया जाए तो वे हत्या का औजार बन सकते हैं. हमारे किसान इन दवाओं के प्रयोग में बहुत सावधानी नहीं बरतते जिससे जान का जोखिम बन आता है. एक आंकड़े के मुताबिक, देश में हर साल लगभग 7700 से अधिक मौतें कीटनाशकों से पैदा खतरों और दुर्घटनाओं से हो जाती हैं.
पुराने कानून की मदद से कीटनाशकों का ऐसा नियम तैयार हुआ जो पूरी तरह से कागजी है. कीटनाशकों का पूरा सिस्टम ही कागज और पेपर आधारित है जिसमें किसी तरह कोई ट्रैकिंग सिस्टम नहीं है. फैक्ट्री से निकलकर कोई पेस्टिसाइड खेत से कैसे और किस क्वालिटी के साथ पहुंचता है, इसे ट्रैक करने का कोई सिस्टम नहीं है. इससे देश में नकली दवाओं का एक पूरा बाजार खड़ा हो गया है जिसका नुकसान किसान भुगत रहा है.
इन सभी समस्याओं को देखते हुए नए प्रस्तावित बिल को पेस्टिसाइड की दुनिया में समाधान मान सकते हैं. इसमें सबसे बड़ा काम पेस्टिसाइड से जुड़े काम को डिजिटल किया जा रहा है. इसमें कुछ भी कागजी नहीं रह जाएगी. इस तरह केंद्र सरकार की नेशनल डिजिटल रजिस्ट्री अब हर पेस्टिसाइड के बनने से खेत तक पहुंचने और उसके असर को ट्रैक करेगी.
पुराने कानून में किसानों और पेस्टिसाइड से जुड़े कर्मचारियों की सुरक्षा की बहुत चिंता नहीं होती थी. तभी हर साल कई मौतें होती थीं. अब ऐसा नहीं होगा. नए प्रस्तावित बिल के मुताबिक, देश में पहली बार इस कानून के जरिये किसानों और कर्मचारियों के लिए प्रोटेक्टिव गियर, ट्रेनिंग और सेफ हैंडलिंग नियमों को अनिवार्य किया जा रहा है.
नए कीटनाशकों को तभी मंजूरी मिलेगी जब विज्ञान और प्रयोगशालाओं में उसकी मुकम्मल जांच होगी और वहां से फाइनल 'टेस्टेड ओके' मिलेगा. पर्यावरण पर होने वाले प्रभाव, प्रदूषण, जहर घुलने का खतरा और जलवायु से जुड़े नुकसान, इन सभी बातों की जांच होने के बाद ही किसी कीटनाशक को हरी झंडी दी जाएगी.
भारत दुनिया में पेस्टिसाइड का इस्तेमाल करने और बनाने वाले सबसे बड़े देशों में से एक है. हालांकि, मौजूदा कानून के तहत रेगुलेटरी कमियां, पुराने तरीके, कमजोर निगरानी और सीमित जवाबदेही से किसानों के साथ-साथ आम लोगों और पर्यावरण को भी नुकसान उठाना पड़ा है. नया बिल यह बताता है कि केंद्र सरकार के लिए पेस्टिसाइड रेगुलेशन पर कंट्रोल रखना जनहित में है, क्योंकि यह खाने की सुरक्षा, पर्यावरण की सुरक्षा और किसानों के कल्याण के लिए राष्ट्रीय महत्व का विषय है.
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