‘नमो ड्रोन दीदी’कहते हैं कि अगर हौसले बुलंद हों तो कोई भी चुनौती सफलता की राह नहीं रोक सकती. इसकी मिसाल हैं वाराणसी के काशी विद्यापीठ ब्लॉक के ऊंच गांव की रहने वाली नीतू सिंह. कभी गांव के घर-परिवार तक सीमित रहने वाली नीतू आज आधुनिक तकनीक के जरिए खेती की तस्वीर बदल रही हैं. ड्रोन से खेतों में उर्वरक और दवाओं का छिड़काव करने वाली नीतू सिंह अब उत्तर प्रदेश के कई जिलों से लेकर बिहार तक पहचान बना चुकी हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उनके काम की सराहना कर चुके हैं. आज उन्हें लोग ‘नमो ड्रोन दीदी’ के नाम से जानते हैं. आइए जानते हैं उनकी सफलता की कहानी.
नीतू सिंह का जन्म मिर्जापुर में हुआ. पालन-पोषण और शिक्षा मुंबई में हुई. शादी के बाद जब वह गांव आईं तो स्वयं सहायता समूह की महिलाओं से जुड़ गईं. इसी दौरान जनवरी 2024 में उन्हें सखी ड्रोन योजना के बारे में जानकारी मिली. उन्होंने योजना को समझा और आवेदन कर दिया. इसके बाद प्रयागराज के फूलपुर में उन्हें प्रशिक्षण दिया गया, जहां ड्रोन संचालन, वाहन चलाने और तकनीकी पहलुओं की जानकारी मिली.
मई 2024 में सरकार की ओर से उन्हें ड्रोन मशीन, तीन पहिया इलेक्ट्रिक वाहन और जनरेटर उपलब्ध कराया गया. इन मशीनों की अनुमानित कीमत करीब 15 लाख रुपये बताई गई. आधुनिक तकनीक से लैस इस व्यवस्था ने नीतू के लिए रोजगार के नए दरवाजे खोल दिए.
ड्रोन मिलने के बाद नीतू के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों का भरोसा जीतने की थी. गांव में ड्रोन से खेतों में छिड़काव की तकनीक नई थी. किसान इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं थे कि इससे उनकी फसलों को फायदा होगा. परिवार और आसपास के लोगों की निराशा के बावजूद नीतू ने हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने किसानों को इस तकनीक के फायदे समझाए और करीब 20 से 25 एकड़ खेतों में निशुल्क छिड़काव किया. इसका असर तब दिखाई दिया, जब इन खेतों में फसल अच्छी हुई. इसके बाद किसानों ने उन्हें दोबारा बुलाना शुरू कर दिया. गांव से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे आराजी लाइन और सेवापुरी ब्लॉक तक पहुंचा और फिर वाराणसी के बाहर भी उनकी मांग बढ़ने लगी.
नीतू सिंह के काम की चर्चा वाराणसी के बाद जौनपुर, आजमगढ़, मिर्जापुर, सोनभद्र और चंदौली तक फैल गई. अब बिहार से भी उन्हें छिड़काव के लिए बुलावा आने लगा है. कई बार एक ही समय पर अलग-अलग जगहों से मांग आने के कारण उन्हें कुछ किसानों के यहां जाने का कार्यक्रम रद्द करना पड़ता है. नीतू के मुताबिक, ड्रोन से छिड़काव की सुविधा ने किसानों का समय और मेहनत दोनों बचाए हैं. पहले खेतों में उर्वरक या दवाओं का छिड़काव करने के लिए मजदूरों की मदद लेनी पड़ती थी या परिवार के किसी सदस्य को खुद खेत में उतरना पड़ता था. इसमें काफी समय और मेहनत लगती थी. अब ड्रोन की मदद से करीब 15 मिनट में एक एकड़ खेत में यूरिया का छिड़काव किया जा सकता है. नीतू एक दिन में लगभग 10 से 15 एकड़ खेतों में छिड़काव कर लेती हैं.
नीतू बताती हैं कि उनके आधुनिक ड्रोन में मैपिंग सिस्टम है. इसकी मदद से खेत के निर्धारित हिस्से में छिड़काव किया जाता है, जिससे एक ही जगह बार-बार छिड़काव होने की आशंका कम होती है. इससे काम अधिक व्यवस्थित और सटीक तरीके से किया जा सकता है. किसानों के लिए यह तकनीक समय बचाने के साथ खेती के काम को आसान बनाने में भी मददगार साबित हो रही है.
ड्रोन दीदी बनने से पहले नीतू सिंह छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहती थीं. उन्होंने बताया कि पहले वह 20 से 25 रुपये के लिए भी दूसरों का सहारा लिया करती थीं, लेकिन आज ड्रोन संचालन के जरिए प्रतिदिन करीब 2,000 रुपये तक कमा लेती हैं. नीतू के साथ दो सहयोगी भी काम करते हैं, जिन्हें वह प्रतिदिन 600 से 700 रुपये तक देती हैं. इस तरह उन्होंने अपने लिए रोजगार का साधन तैयार करने के साथ दूसरे लोगों को भी काम दिया है.
नीतू के पति राजगीर का काम करते हैं और उनकी प्रतिदिन की कमाई करीब 500 रुपये है. नीतू ने बताया कि कई बार पति भी उनके साथ काम पर जाते हैं. ऐसे में दोनों की संयुक्त कमाई 2,000 से 3,000 रुपये तक हो जाती है. इससे परिवार, बच्चों और माता-पिता के खर्च चलाने में काफी मदद मिलती है.
नीतू सिंह के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी दो बार मुलाकात हो चुकी है. पहली मुलाकात वाराणसी के बरकी में आयोजित जनसभा के दौरान हुई थी. वहां प्रधानमंत्री ने उनके काम का जिक्र करते हुए उन्हें ‘नमो ड्रोन दीदी’ के रूप में संबोधित किया. इससे पहले वह ‘सखी ड्रोन’ के नाम से जानी जाती थीं.
नीतू बताती हैं कि करीब 2,000 एकड़ खेतों में छिड़काव का काम पूरा करने के बाद उनके काम की सराहना हुई. इसके बाद उन्हें दिल्ली में प्रधानमंत्री से मिलने का अवसर मिला. मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री ने उनसे पूछा कि काम कैसा चल रहा है और क्या अब लोग उन्हें बुलाने लगे हैं. नीतू ने बताया कि काम बढ़ रहा है और उन्हें एक और ड्रोन की जरूरत है. इस पर प्रधानमंत्री ने उन्हें जरूरत पड़ने पर बताने को कहा.
नीतू सिंह की कहानी बताती है कि सही प्रशिक्षण, सरकारी योजनाओं और खुद पर भरोसे के सहारे ग्रामीण महिलाएं भी आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना सकती हैं. कभी गांव में नई तकनीक को लेकर संदेह का सामना करने वाली नीतू आज किसानों के लिए उपयोगी साबित हो रही हैं. उनकी सफलता न केवल उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रही है, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी यह संदेश दे रही है कि अवसर मिलने पर वे भी अपनी जिंदगी बदल सकती हैं और दूसरों के लिए रोजगार के रास्ते खोल सकती हैं. (सुरेंद्र कुमार गुप्ता की रिपोर्ट)
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