
आलू की खेतीबिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सर्फुद्दीन गांव के किसान राजू कुमार चौधरी ने आधुनिक खेती की मिसाल पेश कर दी है. दरअसल, जिस आलू की खेती को इलाके में लंबे समय से घाटे का सौदा माना जाता रहा, उसी खेती को उन्होंने मुनाफे का जरिया बना दिया है. राजू चौधरी ने इजरायली तकनीक से आलू की खेती कर न सिर्फ बेहतर उत्पादन हासिल किया है, बल्कि आसपास के किसानों के लिए भी उम्मीद की नई किरण जगा दी है.
प्रगतिशील किसान राजू कुमार चौधरी ने करीब 30 कट्ठा जमीन में इजरायली किस्म के आलू की खेती की है. इस खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह फसल मात्र 45 दिनों में तैयार हो जाती है, जबकि सामान्य देशी आलू को तैयार होने में लगभग 105 दिन का समय लगता है. कम समय में फसल तैयार होने से किसानों को जल्दी आमदनी मिलती है और उसी खेत में दूसरी फसल लगाने का भी अवसर मिल जाता है.
राजू कुमार चौधरी ने बताया कि इजरायली आलू की खेती में लागत अपेक्षाकृत कम आती है और उत्पादन सामान्य आलू की तुलना में कई गुना अधिक होता है, जहां एक कट्ठा में सामान्य आलू से लगभग 7 क्विंटल उपज मिलती है, वहीं इजरायली आलू से उसी अवधि में करीब 21 क्विंटल तक उत्पादन संभव है. कम पानी और कम कीटनाशक की जरूरत होने के कारण यह खेती पर्यावरण के अनुकूल भी मानी जा रही है.

किसान का कहना है कि उनके क्षेत्र में आलू की खेती को लेकर किसानों में निराशा थी. बाजार में डिमांड होने के बावजूद उचित दाम नहीं मिलने से लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता था. इसी समस्या के समाधान की तलाश में उनकी बातचीत इजराइल के वैज्ञानिकों से हुई, जहां उन्हें इजरायली आलू के बीज और उसकी उन्नत खेती तकनीक की जानकारी मिली. उन्होंने बताया कि इस आलू में पारंपरिक बीज की जगह नर्सरी में तैयार किए गए सीड का उपयोग किया जाता है.
इजरायली आलू की एक और खासियत यह है कि यह कभी मीठा नहीं होता. इसमें करीब 70 प्रतिशत पानी की मात्रा होती है, जिससे यह डायबिटीज के मरीजों के लिए भी सुरक्षित माना जा रहा है. किसान का दावा है कि इसे “शुगर फ्री आलू” के रूप में देखा जा सकता है, जो स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहतर विकल्प है.
राजू कुमार चौधरी ने बताया कि 30 कट्ठा जमीन में इजरायली आलू की खेती पर उन्हें करीब 55 हजार रुपये की लागत आई है और अनुमान है कि इस खेत से लगभग 180 क्विंटल आलू की उपज होगी. मौजूदा बाजार भाव के अनुसार इसकी कीमत करीब 15 लाख रुपये तक आंकी जा रही है. यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो यह खेती जिले के किसानों के लिए एक नई दिशा साबित होगी.
शैक्षणिक रूप से इंटर तक पढ़े-लिखे राजू कुमार चौधरी एग्रीकल्चर के क्षेत्र में मास्टर ट्रेनर के रूप में भी काम कर चुके हैं. खेती में नए तकनीक और उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2002 में मुख्यमंत्री और वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री द्वारा बेस्ट एग्रीकल्चर परफॉर्मेंस अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है, उनकी यह सफलता की कहानी अब मुजफ्फरपुर ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार के किसानों के लिए प्रेरणा बन रही है.
Copyright©2025 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today