Gehu Gyanभारत में रबी सीजन की सबसे महत्वपूर्ण फसलों में गेहूं का नाम सबसे ऊपर आता है. वही, अभी गेहूं की बुवाई किसानों को लगभग महीना गुजर चुका है. गेहूं की बुवाई के बाद ही किसानों के लिए खेतों में नई उम्मीदें जन्म लेती हैं कि इस बार पैदावार अच्छी होगी और मेहनत का पूरा फल मिलेगा, लेकिन गेहूं की बुवाई के साथ एक बड़ा खतरा भी होता है कीट और रोगों का, जो लग जाए तो पूरी फसल को बर्बाद कर सकता है. किसान अक्सर तब तक खतरे को समझ नहीं पाते जब तक नुकसान बड़ा न हो जाए, इसलिए जरूरी है कि गेहूं में लगने वाले प्रमुख रोग और कीटों की समय पर पहचान और सही उपाय किया जाए. ऐसे में आज हम आपको गेहूं में लगने वाले 5 सबसे खतरनाक कीट और रोग के लक्षण और प्रभावी रोकथाम के तरीके बताएंगे.
भूरा रतुआ रोग के लक्षण की बात करें तो, फसल पर इस रोग के लगने पर भूरे या नारंगी रंग के छोटे-छोटे धब्बे गेहूं की पत्तियों पर बन जाते हैं. ये धब्बे दोनों सतहों पर तेजी से फैलते हैं और फसल बढ़ने के साथ उनका प्रकोप बढ़ता है. पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश सहित उत्तर और पूर्वी क्षेत्रों में भूरा रतुआ गेहूं की फसल के लिए एक आम समस्या है. वहीं, इस रोग के लगने से गेहूं की फसल को भारी नुकसान होता है, जिससे 15 फीसदी से लेकर गंभीर मामलों में 40-50 फीसदी या उससे भी अधिक उपज खराब हो सकती है.
गेहूं की फसल के लिए ये बहुत खतरनाक रोग है. इस रोग में गहरा भूरा या काला चूर्ण जैसे धब्बे सबसे पहले तने पर और फिर पत्तियों पर दिखाई देते हैं. इससे पौधा कमजोर होने लगता है और दाने हल्के और छोटे बनते हैं. यह रोग मुख्य रूप से मध्य भारत और दक्षिण पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है. काला रतुआ रोग लगने से गेहूं की फसल को भारी नुकसान होता है, जिससे 50 से 100 फीसदी तक पैदावार घट सकती है.
पीला रतुआ रोग के प्रमुख लक्षण यह हैं कि पत्तियों पर पीली लंबी धारियां बन जाती हैं, जिनसे उंगलियों पर पीला चूर्ण लग जाता है. यह रोग ठंडे और पहाड़ी क्षेत्रों, जैसे हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में अधिक होता है. पीला रतुआ रोग गेहूं की फसल को बहुत नुकसान पहुंचाता है, जिससे उपज में 5 फीसदी से लेकर 50 प्रतिशत या उससे भी ज्यादा उपज की कमी आ सकती है.
गेहूं की फसल के लिए ये बहुत खतरनाक कीट है. एफिड छोटे हरे रंग के कीट होते हैं जो पत्तियों और बालियों से रस चूस लेते हैं. इनके कारण पौधों पर काली फफूंद बढ़ने लगती है, जिससे पौधा कमजोर हो जाता है और दाने ठीक से नहीं बन पाते. वहीं, इस कीट के लगने से उपज में 20 से 90 फीसदी तक भारी कमी आ सकती है.
दीमक पौधों की जड़ों को खाकर उनका रस सोख लेती है. नमी की कमी और सूखी मिट्टी वाले क्षेत्रों में इसका प्रकोप ज्यादा होता है. पौधे पीले होने लगते हैं और धीरे-धीरे ऊपर से गिर जाते हैं. गेहूं की फसल में दीमक लगने से उत्पादन में भारी कमी आती है. यह 45 फीसदी तक फसल बर्बाद कर सकती है.
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