रेपोरा के विशाल अंगूरों का जलवाकश्मीर की पहचान आमतौर पर सेब के बागों, केसर के खेतों और खूबसूरत वादियों से जुड़ी रही है, लेकिन मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले का एक छोटा सा गांव अपनी अलग पहचान के कारण चर्चा में है. रेपोरा गांव को आज पूरे क्षेत्र में ‘अंगूरों वाला गांव’ कहा जाता है. यहां की मिट्टी, जलवायु और सदियों पुरानी खेती की परंपरा ने ऐसे अंगूर पैदा किए हैं, जिनका स्वाद, आकार और क्वालिटी उन्हें विशेष बनाती है.
माना जाता है कि करीब 600 वर्ष पहले सूफी संत शेख नूर-उद-दीन नूरानी (RA) ने रेपोरा के अंगूरों और उनकी ख्याति का उल्लेख करते हुए कहा था, “दाची रेपोरा, नजर चाय च्कोपूर”. इसका आशय था कि रेपोरा के अंगूर दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं. छह शताब्दियों बाद भी यह गांव उस विरासत को जीवित रखे हुए है.
श्रीनगर से करीब 30 किलोमीटर उत्तर में स्थित रेपोरा ने कश्मीर की पारंपरिक कृषि व्यवस्था से अलग अपनी विशेष पहचान बनाई है. गर्मियों के अंतिम महीनों में गांव के बाग हरे और लाल अंगूरों के भारी-भरकम गुच्छों से लद जाते हैं. यही दृश्य रेपोरा को घाटी के अन्य गांवों से अलग बनाता है.
गांदरबल जिला जम्मू-कश्मीर के प्रमुख अंगूर उत्पादक क्षेत्रों में गिना जाता है. यहां लगभग 206 हेक्टेयर भूमि पर अंगूर की खेती की जाती है और सरकारी आंकड़ों के अनुसार हर वर्ष करीब 1,500 मीट्रिक टन अंगूर का उत्पादन होता है. इन अंगूरों की आपूर्ति न केवल स्थानीय बाजारों में होती है, बल्कि जम्मू-कश्मीर के बाहर भी भेजी जाती है.
रेपोरा में मुख्य रूप से साहिबी और हुसैनी किस्म के अंगूरों की व्यावसायिक खेती की जाती है. वहीं थॉम्पसन किस्म का उपयोग अधिकतर किशमिश तैयार करने में होता है. बागवानी विशेषज्ञ साहिबी को क्षेत्र की बेहतरीन रंगीन अंगूर किस्मों में से एक मानते हैं.
किसानों का कहना है कि यहां के अंगूरों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी कटाई का समय है. जब दुनिया के अधिकांश हिस्सों में ताजे अंगूर उपलब्ध नहीं होते, तब रेपोरा की फसल बाजार में पहुंचती है. इससे किसानों को बेहतर दाम मिलने की संभावना बढ़ जाती है.
रेपोरा में अंगूर केवल एक फसल नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. गांव की लगभग 90 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अंगूर उत्पादन से जुड़ी हुई है.
प्रगतिशील किसान अब्दुल रहमान भट बताते हैं कि गांव का लगभग हर परिवार अंगूर की खेती करता है. उनके अनुसार, रेपोरा-लार क्षेत्र में 200 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर अंगूर उगाए जाते हैं, जिससे सैकड़ों परिवारों की आजीविका चलती है.
उन्होंने बताया कि अंगूर तोड़ने का मौसम अगस्त में शुरू होकर सितंबर तक चलता है. भट के अनुसार, इस क्षेत्र में अंगूर की खेती महाराजा हरि सिंह के समय से बड़े पैमाने पर होती रही है. महाराजा की जमीन पर भी अंगूर की खेती की जाती थी, जो वर्तमान में बागवानी विभाग के अधीन है.
रेपोरा के अंगूरों की सबसे अनोखी पहचान उनके दानों का आकार है. स्थानीय किसानों का दावा है कि यहां एक अंगूर का वजन 14 से 15 ग्राम तक पहुंच जाता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रीमियम गुणवत्ता वाले अंगूरों का मानक आकार लगभग 4 से 5 ग्राम माना जाता है.
अब्दुल रहमान भट के अनुसार, कुछ वर्षों पहले विशेषज्ञों की एक टीम गांव पहुंची थी. जांच के दौरान एक अंगूर का वजन 15 ग्राम दर्ज किया गया, जिसने विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया. किसानों का मानना है कि यही विशेषता रेपोरा के अंगूरों को वैश्विक स्तर पर अलग पहचान दिला सकती है.
रेपोरा के किसान खेती में रसायनों की मात्रा कम करने पर भी जोर दे रहे हैं. किसानों के मुताबिक पहले जहां सात बार कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता था, वहीं अब यह संख्या घटकर तीन बार रह गई है.
स्थानीय उत्पादकों का लक्ष्य भविष्य में पूरी तरह जैविक खेती अपनाना है. उनका कहना है कि क्षेत्र की प्राकृतिक परिस्थितियां अंगूरों को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करती हैं, जिससे रासायनिक दवाओं की जरूरत कम पड़ती है.
रेपोरा के लोगों के लिए अंगूर केवल कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि उनकी आध्यात्मिक विरासत का हिस्सा भी हैं. स्थानीय लोग अंगूर उत्पादन की समृद्धि का श्रेय सूफी संत मीर सैयद शाह सादिक कलंदर (RA) को देते हैं. माना जाता है कि उन्होंने इस क्षेत्र को अपने आशीर्वाद से समृद्ध बनाया.
स्थानीय निवासी गुलाम मुहम्मद कहते हैं कि यह सूफी संतों की कृपा है कि यहां के अंगूर स्वाद, आकार और गुणवत्ता में विशेष हैं. उनका विश्वास है कि इस आध्यात्मिक विरासत ने गांव को एक अलग पहचान प्रदान की है.
रेपोरा के अंगूरों की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए बागवानी विभाग अब इस मॉडल को घाटी के अन्य इलाकों तक पहुंचाने की योजना बना रहा है. अधिकारियों का मानना है कि अगर आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक प्रबंधन को पारंपरिक ज्ञान के साथ जोड़ा जाए, तो कश्मीर में अंगूर उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है.
हालांकि किसानों को इस साल अनियमित बारिश के कारण फसल पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव की चिंता है, फिर भी उन्हें बेहतर उत्पादन की उम्मीद है. रेपोरा आज इस बात का उदाहरण बन चुका है कि कैसे सदियों पुरानी परंपरा और आधुनिक बागवानी का मेल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई पहचान दे सकता है.
कश्मीर का यह छोटा सा गांव अब केवल अंगूर उगाने के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी विरासत, गुणवत्ता और कृषि नवाचार के लिए भी पूरे देश का ध्यान आकर्षित कर रहा है.
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