चित्रकूट के किसानों का कमाल! बिना महंगी खाद-दवाई के जैविक खेती से बढ़ा मुनाफा

चित्रकूट के किसानों का कमाल! बिना महंगी खाद-दवाई के जैविक खेती से बढ़ा मुनाफा

चित्रकूट के कई किसान रासायनिक खाद और कीटनाशकों का खर्च कम करने के लिए जैविक और प्राकृतिक खेती अपना रहे हैं. गोबर की खाद, जीवामृत और घन जीवामृत से किसान फसल उगा रहे हैं. कुछ किसानों का दावा है कि इससे लागत कम हुई और आमदनी बढ़ी. कृषि विभाग भी किसानों को प्रशिक्षण और अनुदान देकर जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहा है.

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चित्रकूट के किसानों का कमाल! बिना महंगी खाद-दवाई के जैविक खेती से बढ़ा मुनाफाचित्रकूट के किसान अपना रहे जैविक खेती का रास्ता

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में कई किसान अब खेती का तरीका बदल रहे हैं. रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर बढ़ते खर्च के बीच किसान जैविक और प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं. जिले के कई गांवों में किसान गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट, जीवामृत और प्राकृतिक तरीके से तैयार खाद का इस्तेमाल कर रहे हैं. किसानों का कहना है कि इससे खेती का खर्च कम हुआ है और फसल से अच्छी आमदनी भी हो रही है.

क्या है जैविक खेती?

जैविक खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल कम या नहीं किया जाता है. इसकी जगह गोबर की खाद, कंपोस्ट, हरी खाद, जीवामृत और दूसरी प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल किया जाता है. खेत में कीड़े और फसल की बीमारी रोकने के लिए भी प्राकृतिक तरीके अपनाए जाते हैं. इस खेती का मकसद मिट्टी को स्वस्थ रखना है. जब मिट्टी अच्छी रहती है तो फसल भी अच्छी होती है. साथ ही किसान को हर बार महंगी रासायनिक खाद और दवाइयां खरीदने की जरूरत कम पड़ती है. जैविक खेती से तैयार फसलों की बाजार में मांग भी बढ़ रही है, जिससे किसानों को अच्छी कीमत मिलने का मौका मिल रहा है.

रिटायर्ड शिक्षक ने 2022 में शुरू की जैविक खेती

चित्रकूट की कर्वी तहसील के बैहार गांव के रहने वाले नत्थूराम रिटायर्ड शिक्षक हैं. उन्होंने साल 2022 में जैविक खेती शुरू की थी. इसके लिए उन्होंने कृषि विभाग की मदद से झांसी के चिरगांव राजकीय कृषि विद्यालय में तीन दिन का प्रशिक्षण लिया. प्रशिक्षण के बाद उन्होंने विशेष तरीके से जीवामृत तैयार किया और सबसे पहले मूली की खेती की. जब मूली की फसल से उन्हें अच्छा फायदा हुआ तो उन्होंने रबी और खरीफ की फसलें भी जैविक तरीके से उगानी शुरू कर दीं. अब वह करीब 18 बीघे जमीन पर खेती के साथ-साथ फलों की बागवानी भी कर रहे हैं.

साल में 4 से 5 लाख रुपये तक मुनाफे का दावा

नत्थूराम के मुताबिक, जैविक खेती से उन्हें साल में करीब 4 से 5 लाख रुपये का मुनाफा हो रहा है. उनका कहना है कि उनके खेत से निकलने वाले जैविक उत्पादों को बेचने के लिए उन्हें बाजार जाने की जरूरत नहीं पड़ती. कई बार ग्राहक सीधे खेत से ही उनकी फसल खरीद लेते हैं और उन्हें अच्छी कीमत मिल जाती है. नत्थूराम जीवामृत भी तैयार करते हैं और दूसरे किसानों को बेचते हैं. साथ ही वह किसानों को जीवामृत बनाने का तरीका भी बताते हैं. वह आसपास के किसानों को जैविक खेती के लिए जागरूक कर रहे हैं. उनके साथ इस समय 11 गांवों के करीब 250 किसान जैविक खेती कर रहे हैं.

कोठारी सिंह भी अपना रहे जैविक खेती

मानिकपुर तहसील के बरहट गांव के रहने वाले कोठारी सिंह पटेल भी जैविक खेती कर रहे हैं. वह राजस्व विभाग में कर्मचारी थे और रिटायर होने के बाद उन्होंने साल 2023 में जैविक खेती शुरू की. उन्होंने बताया कि वह पहले स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों से जूझ रहे थे. इसके बाद उन्होंने जैविक खेती शुरू की और खेत में उगाए गए जैविक अनाज और सब्जियों का इस्तेमाल अपने भोजन में करना शुरू किया. इससे उनका जैविक खेती के प्रति भरोसा और बढ़ा. अब वह धान, अरहर और ज्वार जैसी फसलें जैविक तरीके से उगा रहे हैं. खेत में खाद के तौर पर जीवामृत और घन जीवामृत का इस्तेमाल करते हैं.

'जीरो बैलेंस' खेती का दावा

कोठारी सिंह का कहना है कि जैविक खेती में रासायनिक खेती की तुलना में खर्च कम होता है. उनके मुताबिक, किसान को इसके लिए मुख्य रूप से मेहनत करनी पड़ती है. वह अपने परिवार के लिए पूरे साल का अनाज खुद पैदा कर लेते हैं और जो अनाज बच जाता है, उसे बाजार में बेच देते हैं. वह घर के इस्तेमाल के लिए जैविक सब्जियां भी उगाते हैं. जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने 'कृषि बचाओ अभियान' के तहत किसानों का एक संगठन भी बनाया है. उनके साथ भी 11 गांवों के करीब 250 किसान जैविक खेती कर रहे हैं.

2010 से प्राकृतिक खेती कर रहे योगेश जैन

चित्रकूट के कर्वी तहसील में बेड़ी पुलिया के पास रहने वाले प्रगतिशील किसान योगेश जैन ने साल 2010 में प्राकृतिक और जैविक खेती शुरू की थी. उनका कहना है कि जिस जमीन पर उन्होंने खेती शुरू की, वहां पहले लगातार रासायनिक खेती होने के कारण मिट्टी की हालत खराब हो गई थी. जमीन को फिर से उपजाऊ बनाने के लिए उन्होंने सबसे पहले पशुपालन शुरू किया. उन्होंने करीब 150 गायों की गौशाला बनाई. गायों से मिलने वाले गोबर और गौमूत्र का इस्तेमाल करके खाद तैयार की गई. इस खाद को खेतों में पहुंचाया गया. धीरे-धीरे मिट्टी की सेहत में सुधार हुआ और खेत की उर्वरता बढ़ने लगी.

जैविक खेती के साथ बागवानी पर भी जोर

योगेश जैन अब रबी और खरीफ की कई फसलें उगाते हैं. इसके साथ ही वह अलग-अलग तरह के फलों की बागवानी भी करते हैं. उनका कहना है कि प्राकृतिक और जैविक खेती में जल संरक्षण, जमीन की सुरक्षा, पेड़ लगाना, बागवानी और मसालों की खेती जैसे कामों पर भी ध्यान देना जरूरी है. उनके मुताबिक, खेत में रासायनिक खाद की जगह प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल करने से मिट्टी की सेहत सुधरती है. वह करीब 50 किसानों का एक समूह बनाकर प्राकृतिक खेती कर रहे हैं. उनका कहना है कि समूह में तैयार फसल को एक जगह बेचने से किसानों को बाजार में बेहतर कीमत मिल रही है.

जैविक खेती से 10 लाख रुपये तक कमाई का दावा

योगेश जैन का कहना है कि प्राकृतिक खेती से वह साल में करीब 10 लाख रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं. हालांकि, यह उनकी बताई गई कमाई है और हर किसान की आमदनी जमीन, फसल, उत्पादन और बाजार के हिसाब से अलग हो सकती है. वह दूसरे किसानों को भी प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दे रहे हैं. उनका कहना है कि रासायनिक खेती में खर्च ज्यादा होता है, जबकि प्राकृतिक खेती में स्थानीय संसाधनों के इस्तेमाल से लागत कम की जा सकती है.

सरकार भी किसानों को दे रही प्रशिक्षण और अनुदान

कृषि उप निदेशक जीत लाल गुप्ता ने बताया कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग योजना चला रही हैं. विभाग को 2026-27 में 25 क्लस्टर बनाने का लक्ष्य दिया गया है. इन क्लस्टरों के जरिए करीब 3,125 किसानों को जैविक और प्राकृतिक खेती से जोड़ने का लक्ष्य है. विभाग की ओर से गांवों में बैठक और प्रशिक्षण कार्यक्रम किए जा रहे हैं. किसानों को जैविक खेती शुरू करने के लिए 2,000 रुपये के अनुदान की जानकारी भी दी जा रही है. जो किसान जैविक खेती शुरू करना चाहते हैं, वे अपने ग्राम प्रधान या किसान समूह के जरिए कृषि विभाग को जानकारी दे सकते हैं. इसके बाद विभाग की ओर से प्रशिक्षण और दूसरी जरूरी मदद दी जाती है.

खेत से सीधे बिक रही जैविक फसल

कृषि विभाग के मुताबिक, कई किसानों की जैविक फसल खेत से ही बिक जाती है. अगर किसी किसान की फसल बच जाती है तो वह डिजिटल प्लेटफॉर्म, शॉपिंग मॉल या एफपीओ यानी किसान उत्पादक संगठन के जरिए उसे बेच सकता है. बड़े किसान जिनके पास ज्यादा उत्पादन है, वे जरूरी प्रक्रिया पूरी करने के बाद एपीडा के माध्यम से विदेशों में भी अपने कृषि उत्पाद भेज सकते हैं. इससे किसानों को अपने उत्पाद के लिए नए बाजार मिल सकते हैं.

शुरुआत में उत्पादन कम, बाद में बढ़ सकता है

कृषि विभाग के मुताबिक, जैविक और प्राकृतिक खेती शुरू करने पर शुरुआती समय में उत्पादन कुछ कम हो सकता है. लेकिन लगातार देशी खाद और प्राकृतिक तरीकों का इस्तेमाल करने से मिट्टी की सेहत में सुधार हो सकता है. इससे आगे चलकर उत्पादन क्षमता भी बढ़ सकती है. चित्रकूट के किसानों का अनुभव बताता है कि जैविक खेती में स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल करके खेती की लागत कम करने की कोशिश की जा सकती है. साथ ही जैविक उत्पादों की मांग बढ़ने से किसानों को अपनी फसल के लिए बेहतर बाजार और कीमत मिलने की संभावना भी बनती है. (अखिलेश कुमार सोनेकर के रिपोर्ट)

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