बिहार में सोयाबीन की खेती बढ़ाने की टिप्सकेंद्र सरकार ने तिलहन फसलों की खरीद की रफ्तार बढ़ा दी है. तिलहन के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए किसानों से अधिक उपज खरीद को बढ़ावा दिया जा रहा है. इसमें एक राज्य बिहार भी है जहां तिलहन में कई फसलों की खेती होती है, लेकिन सोयाबीन की खेती बहुत कम है. सरकार किसानों के बीच सोयाबीन की खेती को प्रचलित करने के लिए कई तरह के अभियान चला रही है. किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे सोयाबीन जैसी फसलों की खेती कर तिलहन के क्षेत्र में खुद को और पूरे देश को आत्मनिर्भर बना सकते हैं. साथ ही, यह कमाई किसानों के लिए फायदे का सौदा बनेगी.
इस क्रम में किसानों को जानना चाहिए कि वे बिहार में सोयाबीन की खेती को कैसे बढ़ा सकते हैं और इसके लिए उन्हें क्या करना चाहिए. सबसे पहले जान लेते हैं कि बिहार में कौन सी किस्में सोयाबीन की अधिक उपज दे सकती हैं.
बिहार के लिए अनुशंसित सोयाबीन की किस्मों में JS 20-116 (2019), SL 955 (2020), SL 979 (2020), NRC 132 (IS 132) (2021), NRC 147 (IS 147) (2021), NRC 128 (IS 128) (2021), NRC 136 (IS 136) (2021), NRCSL-1 (ISLS 1) (2021), RSC 11-07 (2021), RSC 10-46 (2021), SL 1028 (2021), SL 1074 (2021), AMS 2014-1 (PDKV Purva) (2021), RSC 10-71 (2022), और RSC 10-52 (2022) शामिल हैं.
पूर्वी क्षेत्र (जिसमें बिहार भी शामिल है) के लिए बुवाई का अनुशंसित समय 15 जून से 30 जून है. इस दौरान खेती करने से अच्छी उपज पाई जा सकती है.
पूर्वी क्षेत्र के लिए 55 किलो/हेक्टेयर बीज दर और 45 सेमी के स्पेस की सिफारिश की जाती है. इस क्षेत्र में बिहार भी आता है.
पूर्वी क्षेत्र के लिए 25:100:50:50 किग्रा NPKS/हेक्टेयर की अनुशंसित पोषण खुराक है. इसे 56 किग्रा यूरिया + 625 किग्रा एसएसपी + 84 किग्रा एमओपी प्रति हेक्टेयर के माध्यम से पूरा किया जा सकता है.
सोयाबीन में खरपतवार 20-70% तक उपज का नुकसान कर सकते हैं. बुवाई के 20 और 40 दिनों के बाद दो बार हाथ से निराई करना फायदेमंद होता है. रासायनिक नियंत्रण के लिए, बुवाई के बाद या अंकुरण से पहले अनुशंसित प्री-इमरजेंस हर्बिसाइड का उपयोग करें.
सोयाबीन एक वर्षा आधारित फसल है. सूखे या नमी के तनाव से बचने के लिए ब्रॉड बेड फरो (BBF) या रिज और फरो विधियों का उपयोग करें. फूल आने, फली बनने और बीज भरने जैसी महत्वपूर्ण अवस्थाओं में फसल को जरूर सिंचाई दें.
सोयाबीन अलग-अलग प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है, लेकिन अच्छी जल निकासी वाली, रेतीली दोमट से चिकनी मिट्टी, जिसमें मध्यम पानी रोकने की क्षमता हो, कार्बनिक पदार्थ से भरपूर हो और लगभग न्यूट्रल पीएच हो, अधिकतम उपज के लिए आदर्श है.
सोयाबीन को अरहर, मक्का, ज्वार, कपास, बाजरा, रागी के साथ अंतरफसल के रूप में उगाया जा सकता है. धान के खेतों की मेड़ों पर भी सोयाबीन उगाया जा सकता है.
सोयाबीन के साथ इंटरक्रॉपिंग से किसानों को निम्नलिखित फायदे हो सकते हैं-
अधिक लाभ: एकल फसल की तुलना में उपयुक्त सह फसल के साथ सोयाबीन की इंटरक्रॉपिंग अधिक लाभदायक पाई गई है.
वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त: वर्षा आधारित क्षेत्रों में जहां केवल एक फसल संभव है, वहां सोयाबीन को अरहर के साथ इंटरक्रॉप करना चाहिए.
सिंचित क्षेत्रों के लिए विकल्प: सिंचित परिस्थितियों में, इसे मक्का, ज्वार, कपास, बाजरा, रागी के साथ इंटरक्रॉप किया जा सकता है ताकि अगली रबी फसल में कोई परेशानी न हो.
अतिरिक्त आय: सोयाबीन को धान के खेतों की मेड़ों पर भी सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है जिससे अतिरिक्त आय मिलती है.
बागानों में खेती: किसान शुरुआती वर्षों के दौरान आम, कटहल, अमरूद और पपीता जैसे बागानों में उपलब्ध जगह में भी सोयाबीन उगा सकते हैं.
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