चीनी के भाव में तेजी (AI जनरेटेड इमेज)त्योहारी सीजन नजदीक आते ही देश में चीनी की कीमतें चर्चा का विषय बनी हुई हैं. बाजार में चीनी के खुदरा भाव 60 रुपये प्रति किलो के आसपास पहुंच चुके हैं, जबकि कुछ दिन पहले कई जगहों पर कीमतें 70 रुपये किलो के पार निकल गई थीं. तेजी से बढ़ती कीमतों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी, जिसके बाद कच्ची चीनी के आयात पर जीरो ड्यूटी की मंजूरी और महाराष्ट्र की चीनी मिलों से सामान्य समय से 15 दिन पहले पेराई शुरू करने का आग्रह किया गया.
सरकार को उम्मीद है कि नई चीनी बाजार में जल्दी पहुंचेगी तो कीमतों पर दबाव बनेगा और आम लोगों को राहत मिलेगी. लेकिन इस फैसले ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या महाराष्ट्र में वास्तव में 15 दिन पहले गन्ने की कटाई और पेराई संभव है? और अगर ऐसा होता भी है तो इसका नुकसान कौन उठाएगा?
महाराष्ट्र देश का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य है. सोलापुर और मराठवाड़ा जैसे इलाके गन्ना उत्पादन के बड़े केंद्र माने जाते हैं. 'किसान तक' से बातचीत में महाराष्ट्र के पूर्व चीनी आयुक्त संजय भोसले ने कहा कि 25 अक्टूबर से पहले बड़े पैमाने पर गन्ना कटाई शुरू होना मुश्किल दिखाई देता है.
उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र में अधिकांश गन्ना कटाई अब भी हाथों से की जाती है और इसके लिए बड़ी संख्या में मजदूर मध्य प्रदेश समेत दूसरे राज्यों से आते हैं. परंपरागत रूप से ये मजदूर दशहरा और दिवाली के बाद ही महाराष्ट्र पहुंचते हैं.
इस साल 20 अक्टूबर को दशहरा और नवंबर में दिवाली है. ऐसे में गन्ना कटाई की शुरुआत 15 अक्टूबर से कर पाना बेहद कठिन होगा. भोसले का कहना है कि जब पर्याप्त मात्रा में गन्ना ही उपलब्ध नहीं होगा तो चीनी मिलें पेराई कैसे शुरू करेंगी? किसी भी मिल को पेराई शुरू करने के लिए बड़ी मात्रा में गन्ना जुटाना पड़ता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि जल्दबाजी में गन्ना पेराई शुरू कराने से सबसे बड़ा असर चीनी रिकवरी पर पड़ सकता है. रिकवरी रेट वह प्रतिशत होता है जिससे पता चलता है कि गन्ने से कितनी चीनी निकलेगी.
संजय भोसले के मुताबिक यदि 15 अक्टूबर से 15 नवंबर के बीच पेराई शुरू होती है तो चीनी रिकवरी रेट सामान्य स्तर से नीचे जा सकता है. कुछ परिस्थितियों में यह 7 से 7.5 प्रतिशत तक गिर सकता है, जबकि सामान्य तौर पर नवंबर के बाद पेराई होने पर रिकवरी 8 प्रतिशत से ऊपर रहती है. सोलापुर बेल्ट में तो यह 8 से 11 प्रतिशत तक पहुंच जाती है.
रिकवरी में 3 से 4 प्रतिशत की कमी भी चीनी मिलों के लिए बड़ा आर्थिक नुकसान साबित हो सकती है. ऐसे में मिलों के सामने सवाल होगा कि घाटे का जोखिम उठाकर वे जल्दी पेराई क्यों करें?
इस पूरे मामले में नुकसान सिर्फ मिलों का ही नहीं बल्कि किसानों का भी हो सकता है. जानकारों के अनुसार गन्ने को पूरी तरह पकने के लिए पर्याप्त समय मिलना जरूरी है. यदि फसल पकने से पहले काट ली जाती है तो उसकी क्वालिटी और वजन दोनों प्रभावित हो सकते हैं. यहां तक कि गन्ना समय से पहले काटा जाए तो उसके तने की गुल्ली भी कम बन कर रह जाएगी जो कि किसानों और चीनी मिलों, दोनों के लिए नुकसान का सौदा होगा.
दूसरी ओर, गन्ने की क्वालिटी बेहतर होने पर मिलों को ज्यादा रिकवरी मिलती है और उसका लाभ किसानों को भी बेहतर भुगतान के रूप में मिलता है. लेकिन समय से पहले कटाई की स्थिति में किसान कम उत्पादन और कम लाभ दोनों का सामना कर सकते हैं.
यही वजह है कि किसान संगठनों और क्षेत्रीय विशेषज्ञों का सवाल है कि आखिर किसान अपने ही नुकसान का रास्ता क्यों चुनेंगे?
विशेषज्ञों ने महाराष्ट्र में इस बार गन्ने की उत्पादकता को लेकर भी चिंता जताई है. राज्य के कई हिस्सों में मॉनसून सामान्य नहीं रहा और बारिश की कमी का असर फसल पर दिखाई दे रहा है.
भले ही कुल उत्पादन में बड़ी गिरावट न आए, लेकिन प्रति हेक्टेयर उत्पादकता प्रभावित होने के संकेत मिल रहे हैं. ऐसे में किसानों की चिंता और बढ़ गई है. यदि पहले से दबाव में चल रही फसल को समय से पहले काटा गया तो इसका असर और गहरा हो सकता है.
सरकार का तर्क है कि बाजार में सप्लाई बढ़ने से कीमतें नियंत्रित होंगी. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ जल्दी पेराई शुरू करने भर से खुदरा बाजार में तुरंत राहत मिलने की गारंटी नहीं है.
सवाल यह भी है कि यदि मिलें घाटे में पेराई करेंगी तो क्या वे तुरंत बाजार में बड़ी मात्रा में चीनी उतारेंगी? और यदि चीनी बाजार में आती भी है तो क्या खुदरा कीमतें उसी अनुपात में नीचे आएंगी? फिलहाल इन सवालों के जवाब साफ नहीं हैं.
जानकारों का मानना है कि उपभोक्ताओं को राहत देना जरूरी है, लेकिन उसकी कीमत किसानों और चीनी मिलों को नहीं चुकानी चाहिए. उनका कहना है कि चीनी बाजार को संतुलित करने के लिए ऐसा समाधान खोजा जाना चाहिए जिससे ग्राहक, किसान और उद्योग तीनों का हित सुरक्षित रहे.
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार चीनी सस्ती करने की कोशिश में किसानों और चीनी मिलों पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है, या फिर यह कदम वास्तव में बाजार को राहत देने वाला साबित होगा? आने वाले कुछ सप्ताह में इसकी तस्वीर साफ हो जाएगी.
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