
दुनिया के महासागर रिकॉर्ड स्तर पर गर्म हो रहे हैं. जून महीने में समुद्र की सतह का औसत तापमान अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया, जिससे जलवायु विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ गई हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि महासागरों में जमा हो रही अतिरिक्त गर्मी का मुख्य कारण कोयला, तेल और गैस के उपयोग से बढ़ी ग्रीनहाउस गैसें हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक, औद्योगिकीकरण से पहले समुद्र की सतह का औसत तापमान करीब 19.6 डिग्री सेल्सियस था, जबकि अब यह लगभग 21 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है. यह अंतर भले ही कम दिखाई देता हो, लेकिन महासागरों के विशाल आकार को देखते हुए इसमें बेहद बड़ी मात्रा में ऊर्जा शामिल है.
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पृथ्वी पर बढ़ी अतिरिक्त गर्मी का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा महासागरों ने अपने भीतर सोख लिया है. वर्ष 2025 में महासागरों में जमा हुई अतिरिक्त गर्मी हर दिन हर सेकंड लगभग 12 हिरोशिमा-स्तर के परमाणु बमों के विस्फोट के बराबर आंकी गई है.
यह बढ़ती गर्मी केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहती. गर्म महासागर वातावरण में अधिक नमी पहुंचाते हैं, जिससे भारी बारिश, बाढ़, समुद्री तूफान और तेज हीटवेव की घटनाएं बढ़ जाती हैं. गर्म समुद्र जमीन को ठंडा करने की अपनी क्षमता भी खोने लगते हैं, जिससे कई क्षेत्रों में गर्मी और अधिक तीव्र हो सकती है.
इस समय ट्रॉपिकल प्रशांत महासागर में अल नीनो विकसित हो रहा है. इसके कारण मध्य-पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से करीब 1.24 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है. वहीं, पूर्वी प्रशांत महासागर में सतह के नीचे का तापमान औसत से 6 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा है.
यूरोप इस समय रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव का सामना कर रहा है. भूमध्य सागर के कुछ हिस्सों का तापमान सामान्य से 6 डिग्री सेल्सियस अधिक है, जबकि उत्तरी सागर के कई क्षेत्रों में तापमान औसत से 3 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा दर्ज किया गया है.
विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो का असर आमतौर पर एक साल तक रहता है, लेकिन इसका पूरा प्रभाव बाद में दिखाई देता है. ऐसे में 2026 के बाद भी वैश्विक तापमान नए रिकॉर्ड बना सकते हैं. 2023-24 और 2015-16 के अल नीनो के दौरान भी ऐसा देखा गया था. समुद्री तापमान में लगातार वृद्धि से कोरल रीफ, समुद्री घास के मैदान और अन्य समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है. वर्ष 2023 में उत्तरी अटलांटिक महासागर में आई रिकॉर्ड समुद्री हीटवेव के बाद यूरोप में भीषण गर्मी, स्पेन में बाढ़ और भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में जंगल की आग जैसी घटनाएं देखने को मिली थीं.
वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो के दौरान पश्चिमी हिंद महासागर जैसे क्षेत्रों में अधिक शक्तिशाली चक्रवात आ सकते हैं. वहीं, पश्चिमी दक्षिण अमेरिका में भारी बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, जबकि ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में सूखे की स्थिति बन सकती है.
हालांकि समुद्री डेटा और आधुनिक तकनीकों की मदद से अब समुद्री हीटवेव और मौसम संबंधी चरम घटनाओं का कई महीने पहले अनुमान लगाया जा रहा है. इससे सरकारों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को पहले से तैयारी करने का अवसर मिलता है. लेकिन विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समुद्री निगरानी और जलवायु डेटा जुटाने वाले नेटवर्क कमजोर हुए तो भविष्य में सटीक पूर्वानुमान लगाना कठिन हो सकता है, जिससे जलवायु संकट का सामना करना और चुनौतीपूर्ण हो जाएगा.