Fish Farming: विदेशी नहीं, अब स्वदेशी मछलियों पर सरकार करेगी फोकस, मिलेगी नई पहचान, बढ़ेगी आय

Fish Farming: विदेशी नहीं, अब स्वदेशी मछलियों पर सरकार करेगी फोकस, मिलेगी नई पहचान, बढ़ेगी आय

भारत सरकार ने देश के मत्स्य क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए अब विदेशी नस्लों के बजाय स्वदेशी मछली प्रजातियों के विकास और संरक्षण पर विशेष जोर देने का निर्णय लिया है. इस पहल का मुख्य उद्देश्य मछली पालन के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाना और स्थानीय मछलियों को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दिलाना है.सरकार की इस बड़ी योजना से न केवल मछली पालकों की लागत कम होगी और उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से देसी प्रजातियों के उत्पादन में भी भारी उछाल आएगा। यह कदम 'ब्लू रेवोल्यूशन' को नई दिशा देते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और पर्यावरण के अनुकूल मत्स्य पालन को बढ़ावा देने में मील का पत्थर साबित होगा.

अब मछली पलकों की बढ़ेगी आयअब मछली पलकों की बढ़ेगी आय
क‍िसान तक
  • नई दिल्ली,
  • Jan 04, 2026,
  • Updated Jan 04, 2026, 9:57 AM IST

भारत की नदियों, तालाबों और समुद्री तटों में मछलियों का खजाना छिपा है. यह न केवल हमारे पर्यावरण का संतुलन बनाए रखती हैं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा हैं. वर्तमान में भारत सरकार का मत्स्य पालन मंत्रालय देश की इन स्वदेशी प्रजातियों को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दे रहा है. इसका मुख्य उद्देश्य मत्स्य पालन में स्थिरता लाना, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है. जब हम अपनी देशी मछलियों को पालते हैं, तो हम न केवल अपनी जैव विविधता को बचाते हैं, बल्कि विदेशी प्रजातियों पर निर्भरता कम करके 'आत्मनिर्भर भारत' के सपने को भी साकार करते हैं.

स्वदेशी मछलियों को बढ़ावा देगी सरकार

भारत में लगभग 2800 से अधिक स्थानीय मछली और शंख प्रजातियां पहचानी गई हैं. इनमें से 917 मीठे पानी की, 394 खारे पानी की और 1548 समुद्री प्रजातियां हैं. पिछले कुछ  सालो में वैज्ञानिकों ने 80 से अधिक प्रजातियों के प्रजनन की तकनीक विकसित कर ली है. हालांकि, एक बड़ी चुनौती यह है कि हमारे कुल उत्पादन का बड़ा हिस्सा केवल कुछ चुनिंदा प्रजातियों जैसे रोहू, कतला और मृगाल तक ही सीमित है. खारे पानी में भी हम अधिकतर विदेशी झींगे वन्नामेई पर निर्भर हैं. इस असंतुलन को दूर करने के लिए अब सरकार ने स्वदेशी मछलियों के विविधीकरण की योजना बनाई है.

देसी मछलियों के दिन बहुरेंगे,सरकार की खास तैयारी.

सरकार ने आर्थिक और क्षेत्रीय महत्व को देखते हुए कुछ खास स्वदेशी प्रजातियों को प्राथमिकता दी है. इनमें मुख्य रूप से फ्रिंज्ड-लिप्ड कार्प, ऑलिव बार्ब, पेंगबा, मुर्रेल यानि शोल, पाब्दा, सिंघी, एशियन सीबास और स्वदेशी टाइगर झींगा शामिल हैं. ये मछलियां न केवल हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छी हैं, बल्कि स्थानीय बाजारों में इनकी मांग और कीमत भी बहुत अधिक है. इनका पालन करने से मछुआरों की आय में भारी वृद्धि हो सकती है. सबसे अच्छी बात यह है कि इन प्रजातियों के बीज उत्पादन और पालन की तकनीक अब आसानी से उपलब्ध है, जिससे किसानों के लिए इन्हें अपनाना सरल हो गया है.

सरकार ने शुरू की खास तैयारी.

मत्स्य पालन क्षेत्र को आधुनिक बनाने के लिए सरकार 'प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना' (PMMSY) और अन्य बुनियादी ढांचा के माध्यम से काम कर रही है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के संस्थान मछलियों के आनुवंशिक सुधार और बेहतर बीज तैयार करने में जुटे हैं. भुवनेश्वर (ओडिशा) में मीठे पानी की मछलियों के लिए और मंडपम (तमिलनाडु) में समुद्री मछलियों के लिए विशेष प्रजनन केंद्र स्थापित किए गए हैं. सरकार का लक्ष्य किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज और सस्ता चारा उपलब्ध कराना है, ताकि वे बिना किसी डर के आधुनिक तरीके से मछली पालन कर सकें.

स्वदेशी मछलियों पर सरकार का फोकस

स्वदेशी मछलियों के उत्पादन को रफ्तार देने के लिए देश भर में 34 विशेष क्लस्टर अधिसूचित किए गए हैं. इन क्लस्टरों में मछलियों के उत्पादन से लेकर उनकी प्रोसेसिंग (Processing) तक की सुविधा होगी. जैसे ओडिशा में स्कैम्पी (झींगा), तेलंगाना में मुर्रेल, त्रिपुरा में पाब्दा और कश्मीर व लद्दाख में ट्राउट मछली के क्लस्टर बनाए जा रहे हैं. इन केंद्रों से न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि ग्रामीण महिलाओं और युवाओं को रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे. जागरूकता और सही प्रशिक्षण के जरिए भारत अपनी समृद्ध जलीय विरासत को सहेजते हुए मत्स्य पालन के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व कर सकता है.

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