
हिंदी भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है. इसे आम जनमानस की भाषा भी कहा जाता है. वहीं देश के दस से अधिक राज्यों के ज्यादातर लोग लिखने-पढ़ने और बोलने के लिए हिंदी का इस्तेमाल करते हैं. वहीं, बात करें दुनिया की, तो स्पेनिश, इंग्लिश और मंडारिन (चीनी भाषा) के बाद हिंदी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है. हिंदी भारत के अलावा अन्य देशों में भी बोली जाती है, जिनमें मॉरीशस, फिजी, पाकिस्तान, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद, टोबैगो और नेपाल शामिल हैं. ऐसे में हिंदी के महत्व को लोगों तक पहुंचाने और इसे बढ़ावा देने के मकसद से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है.
भारत में भले ही हिंदी दिवस मनाने की शुरुआत आजादी के बाद हुई है. हालांकि, इस दिन की नींव स्वतंत्रता से पहले ही रख दी गई थी. वहीं 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया था कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी. पहला हिंदी दिवस 1953 में मनाया गया था.
भारत में 22 भाषाएं और उनकी 72507 लिपी हैं. एक देश में इतनी सारी भाषाओं और विविधताओं के बीच हिंदी वह भाषा है जो भारत को जोड़ती है. इसके अलावा हिंदी की अनदेखी को रोकने के लिए भी हिंदी दिवस मनाया जाता है. महात्मा गांधी ने तो हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था. उन्होंने कहा था, “राष्ट्रभाषा वही हो सकती है जो सरकारी कर्मचारियों के लिए सहज और सुगम हो. जो धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में माध्यम भाषा बनने की शक्ति रखती हो. जिसको बोलने वाला बहुसंख्यक समाज हो, जो पूरे देश के लिए सहज रूप से उपलब्ध हो. अंग्रेजी किसी तरह से इस कसौटी पर खरी नहीं उतर पाती.“ इस प्रकार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने तत्कालीन अंग्रेजी-शासनकाल की अंग्रेजी-भाषा की तुलना में एकमात्र हिन्दी-भाषा में ही राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा (लिंक लेंगवेज) एवं राजभाषा होने के सामर्थ्य का दर्शन किया था. हालांकि, हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है, लेकिन भारत की राजभाषा जरूर मानी जाती है.
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वहीं अगर बात हिन्दी भाषा की हो रही हो, और हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार जिन्होंने हिन्दी को आम जनमानस की भाषा बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है उनका जिक्र नहीं किया जाए तो बेमानी होगी. हम बात कर रहे हैं हिंदी साहित्य के 'उपन्यास सम्राट' मुंशी प्रेमचंद की. प्रेमचंद ने कहानी और उपन्यास में एक नई परंपरा की शुरुआत की जिसने आने वाली पीढ़ियों के साहित्यकारों के अपने साहित्यिक रचना में आम जनमानस की भाषा इस्तेमाल करने का मार्गदर्शन किया. उनकी हर रचना बहुमूल्य है. उन्होंने अपने उपन्यास और कहानियों में आम जनमानस की भाषा में किसानों के बारे में बहुत ही संजीदगी से लिखा है जो अपने समय की सच्चाई को बयां करती हैं. ऐसे में आइए हिन्दी दिवस के मौके पर जानते हैं कथा सम्राट प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में आम जनमानस की भाषा में किसानों का वर्णन किस प्रकार से किया है-
‘पूस की रात’: मुंशी प्रेमचंद द्वारा ‘पूस की रात’ कहानी 1931 में लिखी गई थी. लगभग सौ साल हो चुके हैं. लेकिन किसान आज भी उसी तरह कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं. खेती किसानी लगभग सौ साल पहले भी घाटे का सौदा थी आज भी है. इस कहानी को आप पढ़ेंगे तो आपको यह विश्वास हो जाएगा कि किसान अगर कर्ज के बोझ तले दबते हैं, तो वे मजदूर हो जाते हैं. दरअसल, इस कहानी की पृष्ठभूमि में महामंदी की भूमिका है. किसान, विशेष रूप से छोटे किसानों की तबाही की दास्तान इसमें है. जाड़े के मौसम और सहना साहूकार के जुल्म की दोहरी मार के बीच छटपटाता हल्कू एक बहुत ही छोटा और गरीब किसान है. पूस के मौसम में रात को अपनी छोटी सी फसल की रक्षा के लिए खून जमा देने वाली ठंड में पहरा देने के लिए हल्कू को एक कंबल की जरूरत होती है. जिसे खरीदने के लिए उसकी पत्नी मुन्नी ने बमुश्किल तीन रूपया बचा के रखा था, पर सहना साहूकार की गाली और अपमान से बचने के लिए हल्कू किसान वह तीन रूपया सहना साहूकार को दे देता है. ठंड से बचाव के लिए कुछ नहीं होता है तो वह ठंड से बचने के लिए खेत से थोड़ी दूर जाकर आग तापने बैठ जाता है. इसी दौरान उसकी पूरी फसल को छुट्टा जानवर बर्बाद कर देते हैं. जिसके बाद वह मालगुजारी भरने के लिए मजदूरी करने का फैसला करता है.
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दो बैलों की कथा: दो बैलों की कथा मुंशी प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध कहानी है, जिसमें प्रेमचंद्र एक किसान और उसके दो बैलों के भाव को प्रकट करते हैं. इस कथा के माध्यम से जीवों के प्रति प्रेम भाव और स्वतंत्रता के भाव को दर्शाया गया है. दरअसल, यह कहानी दो बैल हीरा और मोती की है जिनको झुरी ने बड़े ही प्यार से पाला था. एक बार किसी कारणवश झुरी को उन बैलों को अपने ससुराल में झुरी के साले गया के पास छोड़ना पड़ता है. लेकिन हीरा और मोती को लगता है कि उनके मालिक ने उन्हें गया को बेच दिया है, इसलिए वे जल्दी से उसके चंगुल से छूट के अपने घर जाना चाहते थे. रात को जब गया उन्हें चारा देके सो जाता है तब वें दोनों रस्सी तोड़ के झुरी के पास आ जाते है. उन्हें देख के झुरी बहुत खुश होता है लेकिन उसकी पत्नी को बहुत गुस्सा आता है और वह उन्हें कामचोर समझती है. वह उन दोनों बैलों को पुनः गया के हवाले कर देती है. दूसरी बार जब गया उन्हें फिर ले के जाता है तो उनपर अति क्रोधित होने के कारण उन्हें बहुत सताने लगता है. एक रात दोनों उसके कैद से भाग जाते हैं. और कहीं पर फंस जाते हैं फिर उनको किसी और के द्वारा एक कसाई के हाथों बेच दिया जाता है. उसके साथ चलते-चलते जब वे अपने घर के रास्ते को पहचान लेते हैं तो वो दौड़ते हुए झुरी के पास पहुंचते है और झुरी की पत्नी भी उन्हें प्यार से चूम लेती है.