'कैक्टस' से जल्द पैदा होगी LPG गैस, ICARDA के वैज्ञानिक नेहा तिवारी से समझिए पूरी टेक्नोलॉजी?

'कैक्टस' से जल्द पैदा होगी LPG गैस, ICARDA के वैज्ञानिक नेहा तिवारी से समझिए पूरी टेक्नोलॉजी?

Cactus Farming: वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ नेहा तिवारी का मानना है कि यदि अन्य किसान भी इस मॉडल को अपनाते हैं, तो एलपीजी पर निर्भरता कम होगी. साथ ही, पर्यावरण संरक्षण और कृषि में भी सुधार होगा. यह पहल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकती है.

ICARDA scientist neha tiwary produce methane gas from cactus and cow dungICARDA scientist neha tiwary produce methane gas from cactus and cow dung
नवीन लाल सूरी
  • LUCKNOW,
  • Apr 06, 2026,
  • Updated Apr 06, 2026, 6:49 PM IST

देशभर में एलपीजी गैस की किल्लत के कारण आम लोगों को परेशानी हो रही है. गैस सिलेंडर के लिए घंटों कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है. ऐसे समय में मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के अमलाहा क्षेत्र में स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर एग्रीकल्चर रिसर्च इन द ड्राई एरियाज (ICARDA) की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ नेहा तिवारी ने एक अनोखा शोध किया है. इंडिया टुडे के किसान तक से खास बातचीत में डॉ नेहा तिवारी ने बताया कि 90 फीसदी कैक्टस (cactus) और 10 फीसदी गोबर (Cow Dung) की खाद को मिलाकर एक शोध किया, जिससे मीथेन गैस (Methane Gas) का उत्पादन हो रहा है. बेहद कम लागत में  'कैक्टस और गोबर का उपयोग कर गैस बनाई जा रही है. वहीं हम लोग बंजर जमीन पर 'कैक्टस' की खेती को लेकर बढ़ावा दे रहे है. संस्थान की वैज्ञानिक ने बताया कि इस प्रक्रिया को को करने में 25 दिन का समय लगता है. उसके बाद रोजाना मीथेन गैस बनने लगता हैं. वहीं, 90 किलो कैक्टस में 10 किलो गोबर के साथ 5 लीटर पानी का प्रयोग किया जाता हैं. जिससे 62 प्रतिशत मीथेन गैस पैदा होती है. 

पूरे देश के किसानों को मिलेगा लाभ 

वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ नेहा तिवारी का मानना है कि यदि अन्य किसान भी इस मॉडल को अपनाते हैं, तो एलपीजी पर निर्भरता कम होगी. साथ ही, पर्यावरण संरक्षण और कृषि में भी सुधार होगा. यह पहल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकती है.

बंजर जमीन पर किसान कर सकते है कैक्टस की खेती

उन्होंने बताया कि देशभर में एलपीजी गैस की किल्लत के कारण आम लोगों को परेशानी हो रही है. लेकिन आने वाले में समय में पूरे देश के किसानों को लाभ मिलेगा. संस्थान की वैज्ञानिक बताती हैं कि भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय और ICARDA के सयुक्त प्रयास से यह प्रयोग किया गया है.

फ्लेक्सिबल बैलून की टंकी में तैयार किया बायोगैस प्लांट

उन्होंने बताया कि बहुत जल्द भारत सरकार के द्वारा किसानों के लिए प्रमोट किया जाएगा. वहीं सबसे खास बात है कि इस कैक्टस में कांटे नहीं होते है. जिससे पशुओं के चारे के लिए किसान इस्तेमाल कर सकते है. हालांकि इस प्रयास में कुछ चुनौतियां भी सामने आ रही हैं. इसके बावजूद यह पहल पर्यावरण संरक्षण और वैकल्पिक ऊर्जा के उपयोग की दिशा में एक सराहनीय उदाहरण बनकर उभरेगा. शोधकर्ताओं के अनुसार, बायोगैस प्लांट तैयार किया गया,फ्लेक्सिबल बैलून से शोध किया गया है. जो एक महीने तक LPG गैस पैदा हो रही है. 

90 % कैक्टस और 10% गोबर की खाद

ICARDA की वैज्ञानिक डॉ नेहा तिवारी ने बताया कि 90 % कैक्टस और 10% गोबर की खाद को मिलाकर मीथेन गैस का उत्सर्जन किया जा रहा है.  इस प्लांट की खास बात यह है कि गैस बनने के बाद जो अवशेष बचता है, वह जैविक खाद बन जाता है, जिसे खेतों में इस्तेमाल किया जाता है.

फ्लेक्सिबल बैलून में किया अनोखा प्रयोग

इससे खेती की लागत भी कम होती है और केमिकल खाद की जरूरत भी घटती है. शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि किसानों को आर्थिक रूप से भी लाभ होगा. वहीं हम लोग सुरक्षा के लिहाज से इस पूरे सिस्टम में कई स्तरों पर निगरानी रखी जाती है. उन्होंने बताया कि ICARDA के निदेशक डॉ शिव कुमार अग्रवाल का सहयोग और मार्गदर्शन हमेशा मिलता रहता हैं. 

एक गाय से प्रतिदिन 10 किलोग्राम गोबर

उन्होंने अन्य किसानों से भी अपील की है कि वे बंजर जमीन पर 'कैक्टस' की खेती को बढ़ावा दे. जिससे देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है. गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने बताया कि एक देशी गाय से प्रतिदिन औसतन लगभग 10 किलोग्राम गोबर प्राप्त होता है, जिससे मीथेन युक्त बायोगैस का उत्पादन संभव है. उन्होंने बताया कि आंकलन के अनुसार यूपी में एक लाख गायों के गोबर से मीथेन का दोहन कर पेट्रोलियम उत्पादों में लगभग 500 करोड़ रुपये तक की बचत की संभावना बन सकती है. इससे अन्य देशों से आयात होने वाले एलपीजी पर निर्भरता भी घटेगी.

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