पुणे की ऑर्गेनिक फार्म कंपनी के घी को मिला पहला Glyphosate-Residue-Free सर्टिफिकेट

पुणे की ऑर्गेनिक फार्म कंपनी के घी को मिला पहला Glyphosate-Residue-Free सर्टिफिकेट

ग्लाइफोसेट दरअसल एक रासायनिक खरपतवारनाशी (Herbicide) है. इसका प्रयोग इस्तेमाल खेतों में उगने वाले अनचाहे खरपतवार (जंगली घास) को खत्‍म करने के लिए किया जाता है. इसका सबसे ज्‍यादा प्रयोग धान, गेहूं, मक्का, सोयाबीन, कपास जैसी फसलों में होता है. यह पौधों में मौजूद एक खास एंजाइम को रोक देता है, जिससे खरपतवार सूखकर मर जाते हैं. 

ऋचा बाजपेयी
  • New Delhi ,
  • Jan 14, 2026,
  • Updated Jan 14, 2026, 9:38 AM IST

पुणे की टू ब्रदर्स ऑर्गेनिक फार्म्स को एक बड़ी कामयाबी मिली है. फर्म की तरफ से तैयार किए जाने वाला A2 कल्चर्ड घी भारत का पहला ऐसा उत्‍पाद बन गया है जिसे इंडिपेंडेंट ग्लाइफोसेट रेसिड्यू-फ्री सर्टिफिकेशन मिला है. इस फर्म को यह सर्टिफिकेट ऐसे समय में मिला है जब खाने की चीजों की सुरक्षा को लेकिर चिंताएं बढ़ती जा रही हैं. टू ब्रदर्स ऑर्गेनिक फार्म्स का इस कैटेगरी में आना निश्चित तौर पर भारत की फूड इंडस्‍ट्री के लिए एक राहत वाली खबर होगी. टू ब्रदर्स फर्म  पुणे के दो भाई सत्यजीत और अजिंक्य हांगे मिलकर चलाते हैं. इनकी इस कंपनी को देश में खेती की सूरत को बदलने वाला करार दिया जाता है. 

क्‍या होता है ग्‍लाइफोसेट 

ग्लाइफोसेट रेसिड्यू-फ्री सर्टिफिकेशन DetoxProject.org की तरफ से दिया गया ह. यह एक अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर की मान्यता प्राप्त थर्ड-पार्टी ऑर्गनाइजेशन है जो फाइनल कंज्यूमेबल प्रोडक्ट की सख्त लैब टेस्टिंग के जरिए पता लगता है कि घी में ग्लाइफोसेट रेसिड्यू तो मौजूद नहीं है. ग्लाइफोसेट दरअसल एक रासायनिक खरपतवारनाशी (Herbicide) है. इसका प्रयोग इस्तेमाल खेतों में उगने वाले अनचाहे खरपतवार (जंगली घास) को खत्‍म करने के लिए किया जाता है. इसका सबसे ज्‍यादा प्रयोग धान, गेहूं, मक्का, सोयाबीन, कपास जैसी फसलों में होता है. यह पौधों में मौजूद एक खास एंजाइम को रोक देता है, जिससे खरपतवार सूखकर मर जाते हैं. 

क्‍या हैं इसके नुकसान 

लेकिन अगर ग्लाइफोसेट को अगर नियंत्रित न किया जाए तो इसका असर फसलों और मिट्टी तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह पूरी फूड चेन में फैल जाता है. जब मिट्टी, पानी और चारे वाली फसलों में हर्बिसाइड रेसिड्यू बने रहते हैं तो डेयरी जानवर जो चरते और खाते हैं, उसके जरिए इनडायरेक्टली इसके संपर्क में आते हैं. स्प्रे ड्रिफ्ट, गंदा धोने का पानी, और घास और चारे में रेसिड्यू जानवरों की हेल्थ पर असर डाल सकते हैं और समय के साथ, दूध से बने प्रोडक्ट्स की क्वालिटी और इंटीग्रिटी पर असर डाल सकते हैं. 

इके स्प्रे के बाद इसके अंश या रेसिड्यू फसलों, सब्जियों और अनाज में रह सकते हैं. अगर लंबे समय तक इसका सेवन किया जाए तो उससे स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ने की आशंका जताई जाती है. कई देशों में तो इसे लेकर कैंसर, हार्मोनल गड़बड़ी और मिट्टी की सेहत पर असर जैसी बहस तक चल रही हैं.

डेयरी उत्‍पाद के लिए क्‍या है महत्‍व 

यह मुद्दा खास तौर पर घी जैसे डेयरी प्रोडक्ट्स के लिए बहुत जरूरी हो जाता है, जो भारतीय घरों में रोजाना इस्तेमाल होने वाला एक जरूरी हिस्सा है. मिट्टी, पानी, चारे और फीड के जरिए फूड चेन में जाने वाले बचे हुए हिस्से, डेयरी जानवरों और समय के साथ दूध से बने प्रोडक्ट्स की मजबूती पर भी असर डाल सकते हैं.पेट की सेहत, विटामिन एब्‍जॉर्प्‍शन और भारतीय खाना पकाने में इसके अक्सर इस्तेमाल को देखते हुए, घी का लंबे समय तक कम मात्रा में बचे हुए हिस्सों के संपर्क में रहना भी बहुत जरूरी हो जाता है. 

क्‍या है टू ब्रदर्स ऑर्गेनिक फार्म 

टू ब्रदर्स ऑर्गेनिक फार्म्स के को-फाउंडर, अजिंक्य हांगे ने कहा, 'आज फूड सेफ्टी सिर्फ भरोसे पर नहीं बल्कि पारदर्शिता पर टिकी होनी चाहिए. जैसे-जैसे रेसिड्यू के बारे में सबूत बढ़ रहे हैं, हमारा मानना ​​है कि भारतीय खाने में टेस्टिंग और जानकारी देना आम बात होनी चाहिए, न कि कोई अपवाद.' सत्‍यजीत और आंजिक्‍य ने साल 2012 में टू ब्रदर्स ऑर्गेनिक फार्म्स (TBOF) की शुरुआत की थी. आज उनकी यह फर्म अपने ऑर्गेनिक प्रॉडक्‍ट्स के लिए मशहूर है. अब उनकी यह फर्म अपने बेचे जाने वाले हर उत्पाद की कहानी बताने के लिए ब्लॉकचेन टेक्‍नोलॉजी का प्रयोग कर रही है. रिटेल स्‍टोर से लेकर ईकॉमर्स और क्विक कॉमर्स सर्विसेज के जरिए इसके बारे में कंज्‍यूमर्स को बताया जा रहा है. 

यह भी पढ़ें- 

MORE NEWS

Read more!