
बिहार के दक्षिण-पश्चिमी हिस्सों से होकर राज्य में प्रवेश करने वाली सोन नदी महज एक नदी नहीं है. इसका पानी करीब करीब शाहाबाद क्षेत्र से लेकर पटना जिले की खेती को समृद्ध करता है, जबकि इससे निकलने वाला बालू बिहार की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. अब इसी सोन नदी के पानी को गया की पहचान मानी जाने वाली फल्गु नदी तक पहुंचाने की योजना को बिहार सरकार ने अंतिम मंजूरी दे दी है. मंगलवार को हुई बिहार कैबिनेट की बैठक में करीब 996 करोड़ 5 लाख रुपये की लागत वाली सोन-फल्गु नदी जोड़ो परियोजना को स्वीकृति प्रदान की गई.
सरकार का मानना है कि सोन का पानी फल्गु नदी में पहुंचने के बाद गयाजी के विष्णुपद मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं को पिंडदान और तर्पण के लिए सालभर पानी उपलब्ध हो सकेगा. इसके साथ ही पर्यटन को बढ़ावा मिलने, मगध क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा बेहतर होने और पेयजल संकट को दूर करने की उम्मीद है. हालांकि, परियोजना को लेकर विशेषज्ञों की चिंताएं भी सामने आई हैं. उनका कहना है कि सोन और फल्गु नदियों की प्रकृति, जल प्रवाह और भूगर्भीय संरचना में काफी अंतर है. ऐसे में योजना को लागू करने से पहले इसके पर्यावरणीय और भूगर्भीय प्रभावों का विस्तृत अध्ययन जरूरी है.
मंगलवार को हुई कैबिनेट बैठक में गयाजी से जुड़ा यह महत्वपूर्ण फैसला लिया गया. मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग के अपर मुख्य सचिव अरविंद कुमार चौधरी के मुताबिक, गया में मौजूद रामायण कालीन फल्गु यानी निरंजना नदी को सोन नदी से जोड़ा जाएगा. इसके लिए सरकार ने 996 करोड़ 5 लाख रुपये का प्रावधान किया है. योजना के तहत सोन नदी पर इंद्रपुरी बैराज से करीब 23 किलोमीटर ऊपर की ओर एक इंटेक वेल का निर्माण प्रस्तावित है. इस इंटेक वेल के जरिए सोन नदी का आवश्यक पानी करीब 11 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन के माध्यम से उत्तर कोयल मुख्य नहर के लगभग 32.77 किलोमीटर के बिंदु तक पहुंचाया जाएगा. इसके बाद सोन का पानी उत्तर कोयल दायां मुख्य नहर के जरिए स्वत: प्रवाहित होकर अंतिम छोर तक पहुंचेगा.
रांची विश्वविद्यालय के भू-विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नीतिश प्रियदर्शी कई सवाल उठाते हुए कहते हैं कि सरकार की पहल अच्छी हो सकती है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या फल्गु नदी सोन के पानी को अपने में समाहित करने के लिए तैयार है? उनके मुताबिक, दोनों नदियों की प्रकृति अलग है. सोन नदी का इस्तेमाल मुख्य रूप से कृषि और सिंचाई के लिए होता है, जबकि फल्गु की एक अलग भौगोलिक एवं जल प्रवाह व्यवस्था है, जिसमें कई स्थानों पर पानी बालू के नीचे प्रवाहित होता है. ऐसे में सोन का पानी फल्गु में आने पर उसके साथ आने वाले जलीय जीवों और अन्य सूक्ष्मजीवों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका अध्ययन जरूरी है. फल्गु नदी में पहले से बड़ी मात्रा में बालू मौजूद है. ऐसे में सोन के पानी के साथ आने वाला अतिरिक्त तलछट और बालू नदी की मौजूदा संरचना को किस तरह प्रभावित करेगा, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है.
डॉ. प्रियदर्शी के अनुसार, मॉनसून के दौरान जब दोनों नदियों का जलस्तर बढ़ेगा और उसी समय सोन का पानी फल्गु में छोड़ा जाता है, तो जलभराव और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है. इसके अलावा नदी के प्रवाह, तलछट, जलीय जीवन और आसपास के पर्यावरण में भी बदलाव देखने को मिल सकते हैं. उनका कहना है कि यदि सरकार ने इन संभावित प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन कराया है और उनसे निपटने के लिए पर्याप्त व्यवस्था की है, तो परियोजना को आगे बढ़ाया जा सकता है. लेकिन यदि ऐसा अध्ययन नहीं हुआ है, तो परियोजना के दीर्घकालिक प्रभावों को समझने के लिए पहले विस्तृत जांच जरूरी है.
डॉ. नीतिश प्रियदर्शी फल्गु नदी की मौजूदा भौगोलिक स्थिति को समझने पर भी जोर देते हैं. उनका कहना है कि ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि करोड़ों वर्ष पहले फल्गु नदी में सैंड ब्लास्ट हुआ था. इसी वजह से कई स्थानों पर नदी का जल बालू की परतों के नीचे प्रवाहित होता है. ऐसे में भविष्य में सोन का पानी फल्गु की इस प्राकृतिक संरचना को क्या आने वाले दिनों में प्रभावित नहीं करेगा. इन पहलुओं पर भी सरकार को सोचना होगा.
बता दें के बोधगया के पास लीलाजन (निरंजना) और मोहाना नदियों के संगम के बाद फल्गु नदी का निर्माण होता है. ये दोनों नदियां झारखंड के छोटानागपुर पठार क्षेत्र से निकलती हैं. इसके विपरीत सोन नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में अमरकंटक के पास होता है.
सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार के पर्यावरण विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. राजेश रंजन का कहना है कि सोन का पानी फल्गु तक पहुंचाने से पहले कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि दोनों नदियों के उद्गम स्थल अलग-अलग हैं. फल्गु की सहायक नदियां झारखंड के पठारी क्षेत्र से निकलती हैं, जबकि सोन का उद्गम मध्य प्रदेश में है. इसलिए सबसे पहले दोनों नदियों के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन करना जरूरी है. इसके अलावा दोनों नदियों के पानी की रासायनिक संरचना (वाटर केमिस्ट्री) को भी समझना होगा. दोनों नदियों के जल प्रवाह में भी अंतर है. सोन में करीब पूरे साल पानी उपलब्ध रहता है, जबकि फल्गु नदी में मॉनसून सीजन के दौरान पानी देखने को मिलता है.
विशेषज्ञों के मुताबिक, दोनों नदियों के पानी का आसपास की खेती, भूजल, जलीय जीव-जंतुओं और मिट्टी पर पड़ने वाले प्रभाव का भी आकलन किया जाना चाहिए. यदि इन सभी पहलुओं का वैज्ञानिक अध्ययन करने के बाद परियोजना को मंजूरी दी गई है, तो उसके आधार पर आगे बढ़ा जा सकता है. अन्यथा इन विषयों पर विशेषज्ञों की एक समिति गठित कर विस्तृत अध्ययन कराना जरूरी होगा. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि मेरी जानकारी में इस तरह का कोई अध्ययन, जांच या कमेटी बनी हो, इसकी जानकारी नहीं है.
परियोजना का एक प्रमुख उद्देश्य गयाजी में पिंडदान और तर्पण करने वाले श्रद्धालुओं के लिए सालभर पानी उपलब्ध कराना है. डॉ. राजेश रंजन का कहना है कि यहां एक धार्मिक और सांस्कृतिक सवाल भी जुड़ा हुआ है. गयाजी आने वाले श्रद्धालुओं के लिए फल्गु नदी का धार्मिक महत्व सदियों पुराना है. ऐसे में यदि नदी में सोन का पानी पहुंचाया जाता है तो क्या श्रद्धालु उसे उसी धार्मिक परंपरा के अनुरूप स्वीकार करेंगे, यह भी एक बड़ा सवाल है. क्योंकि आने वाले कुछ दिनों में ऐतिहासिक पितृपक्ष मेला शुरू होने वाला है, जहां विश्वभर से हिंदू अपने पितरों का तर्पण करने के लिए जुटने वाले हैं. इसमें फल्गु नदी का अपना एक विशेष धार्मिक महत्व है. गया जिले के पंडा महेश बाबू कहते हैं कि जब गया जिले में गंगा का पानी लाया गया तब भी फल्गु नदी में उसको नहीं छोड़ा गया था. फिर सोन का पानी लाने की बात ही नहीं उठती है. पिंडदानियों के लिए फल्गु का पानी गंगा नदी के पानी से भी ज्यादा पवित्र है. इसलिए फल्गु नदी का पानी उसी रूप में रखा जाए.
वहीं, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक कार्यक्रम में कहा था कि सीता माता के श्राप से फल्गु को मुक्त करने के लिए सोन का पानी नदी में लाया जाएगा. उन्होंने कहा कि भगवान राम के पुत्र लव-कुश के वंशज इस कार्य को पूरा करेंगे. हालांकि, इस व्यवस्था को लेकर श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया भविष्य में ही स्पष्ट हो सकेगी.
गयाजी के पत्रकार कुंदन कुमार के मुताबिक, सोन का पानी फल्गु नदी में पहुंचने से सबसे बड़ा असर गया शहर के पर्यटन क्षेत्र पर पड़ सकता है. सरकार की प्रमुख कोशिश यह है कि गयाजी में सालभर पिंडदान करने वाले श्रद्धालुओं को फल्गु में पर्याप्त पानी उपलब्ध कराया जा सके. वर्तमान में वर्ष के कई महीनों में फल्गु नदी सूखी रहती है. ऐसे में श्रद्धालुओं को पिंडदान और तर्पण के लिए रबर डैम क्षेत्र का रुख करना पड़ता है.
कुंदन कुमार कहते हैं कि इस परियोजना के सफल होने पर जिले के आमस और गुरुआ, शेरघाटी, डोभी, बारह चट्टी, बोधगया, गया शहर और मानपुर सहित आसपास के क्षेत्रों को लाभ मिलने की उम्मीद है. इससे भूजल स्तर में सुधार, नदी किनारे के खेतों की सिंचाई और पेयजल उपलब्धता में मदद मिल सकती है. वही यह भी एक चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि बीते दिनों जहानाबाद और पटना जिले में पुनपुन नदी की वजह से जो बाढ़ के हालात देखने को मिले, उस नदी में पानी फल्गु नदी का था. वही जब सोन का भी अपनी इस नदी में आएगा तो बाढ़ के हालात और भी भयावह हो सकते हैं.