
देश में इस साल चीनी उद्योग के सामने कई चुनौतियां रहने वाली हैं. चीनी के रिकॉर्ड प्रोडक्शन के बीच मांग में गिरावट सबसे बड़ी चिंता का कारण बनने वाला है. इथेनॉल बनाने के लिए चीनी का डायवर्जन भी पहले से कम हो गया है जिसे लेकर चीनी कंपनियां फिक्रमंद हैं. इसके अलावा, दुनिया में चीनी के दाम में लगातार गिरावट भी उद्योग को संकट में धकेल रहा है. जानकारों का मानना है कि इसका एक बड़ा असर किसानों के गन्ना पेमेंट पर भी दिख सकता है. उद्योग ने चिंता जताई है कि मांग में कमी के कारण चीनी का स्टॉक लगातार बढ़ता जा रहा है और इसका क्लीयरेंस नहीं हुआ तो कई मायनों में परेशानी खड़ी हो सकती है.
देश के कई इलाकों से किसानों के गन्ना पेमेंट में रुकावट की खबरें आ रही हैं. चीनी मिलों पर किसानों का बकाया लगातार बढ़ता जा रहा है जिसके पीछे बड़ी वजह चीनी का रिकॉर्ड प्रोडक्शन, लेकिन मांग में गिरावट है. मार्केट में चीनी की मांग निचले स्तर पर है और आगे कोई त्योहारी सीजन भी नहीं आने वाला है. इसे देखते हुए चीनी उद्योग ने सरकार से तुरंत कोई बड़ा कदम उठाने की मांग की है. उद्योग ने इथेनॉल के लिए चीनी के डायवर्जन पर भी चिंता जताई है और कहा है कि इसकी मात्रा बढ़ाने के बजाय घटा दी गई है जिससे समस्या और बढ़ गई है. गन्ना पेमेंट रुकने का एक बड़ा कारण ये भी है.
इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) के अनुसार, 31 दिसंबर, 2025 तक चीनी का उत्पादन लगभग 119 लाख टन तक पहुंच गया, जो पिछले साल की तुलना में 25 प्रतिशत की मजबूत बढ़ोतरी है. महाराष्ट्र ने 48.61 लाख टन के साथ इस बढ़ोतरी में सबसे आगे रहा, जो 62 प्रतिशत ज्यादा है, जबकि उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में भी बढ़ोतरी देखी गई.
पूरे सीजन के लिए अनुमान अलग-अलग हैं, USDA ने 350 लाख टन और ISMA ने लगभग 343 लाख टन का अनुमान लगाया है, जिसका कारण खेती का बढ़ा हुआ रकबा और अच्छा मॉनसून है.
हालांकि, यह बंपर उत्पादन घरेलू खपत में कमी के बीच आया है. अनुमानों के अनुसार, सेहत की चिंता में लोग चीनी कम इस्तेमाल कर रहे हैं जिसके कारण मांग 280-285 लाख टन रहने की उम्मीद है. लोगों को शुगर और मोटापे की चिंता सता रही है. इसी बीच कई तरह के जागरुकता अभियान चलाए जा रहे हैं जिसमें चीनी की खपत कम करने की सलाह दी जा रही है. इन सभी वजहों से चीनी की मांग में कमी दर्ज की जा रही है. विदेशी मांग में भी यही ट्रेंड है.
इस समस्या को और बढ़ा रहा है इथेनॉल के लिए चीनी का कम डायवर्जन. नवंबर 2025 में 20 प्रतिशत ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल करने के बावजूद, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने इस साल के लिए चीनी-आधारित फीडस्टॉक से सिर्फ 289-307 करोड़ लीटर ही आवंटित किया, और खाद्य सुरक्षा के लिए अनाज (70 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी) को तवज्जो दी. इससे डायवर्जन 34 लाख टन तक सीमित हो गया, जो मिलों के 50 लाख टन के लक्ष्य से काफी कम है, जिससे बाजार में ज्यादा चीनी बच गई है.
एक्स-मिल कीमतें इस अधिक सप्लाई को दिखाती हैं, महाराष्ट्र में ये 3,600-3,720 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास हैं—जो सीजन की शुरुआत से 8-10 प्रतिशत कम हैं और कई लोगों के लिए उत्पादन लागत से भी कम हैं. कम वैश्विक कीमतों के कारण सरकार के 15 लाख टन के निर्यात कोटे को ठंडा रिस्पॉन्स मिला है, और मार्च 2026 के बाद इसकी समीक्षा की जाएगी.