Paddy-Wheat Trap: क्या सिर्फ वादों से बढ़ेगी इनकम? धान-गेहूं के 'मोह-जाल' से किसानों को निकालने में नाकाम रही सरकार!

Paddy-Wheat Trap: क्या सिर्फ वादों से बढ़ेगी इनकम? धान-गेहूं के 'मोह-जाल' से किसानों को निकालने में नाकाम रही सरकार!

वर्तमान सिस्टम में एक बड़ी विसंगति है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सरकार की 60 फीसद से ज्यादा योजनाएं और सब्सिडी आज भी सिर्फ धान-गेहूं की फसल चक्र तक सीमित हैं. सरकारी वैज्ञानिक और फर्टिलाइजर का पैसा भी इन्हीं दो फसलों पर सबसे ज्यादा खर्च होता है. इसका नतीजा यह है कि हम सिर्फ कार्बोहाइड्रेट पैदा कर रहे हैं, जिससे देश में डायबिटीज और मोटापे जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं.

Paddy-Wheat TrapPaddy-Wheat Trap
जेपी स‍िंह
  • नई दिल्ली,
  • Apr 02, 2026,
  • Updated Apr 02, 2026, 11:33 AM IST

आज भारतीय कृषि एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहां पारंपरिक खेती अब मुनाफे का सौदा नहीं रही. एक औसत किसान परिवार की मासिक आय 2024-25 के अनुमान के मुताबिक महज 19,696 रूपये है. इसकी सबसे बड़ी वजह है जमीन का घटता आकार, जो अब औसतन सिर्फ 1.08 हेक्टेयर रह गया है. जो किसान आज भी सिर्फ धान और गेहूं के फसल चक्र पर टिके हैं,  इन दोनों फसलों में खाद, कीटनाशक और सिंचाई का खर्च साल-दर-साल बढ़ रहा है, जिससे मिट्टी की सेहत खराब हो रही है और किसान की लागत बढ़ रही वही इनकम स्थिर हो गया है.अगर हमें ग्रामीण भारत और किसान  की तकदीर बदलनी है, तो इस पुराने ढर्रे को छोड़कर फल, सब्जी और मसालों की ओर कदम बढ़ाना ही होगा.

इन राज्यों में छोटी जोत, बड़ी कमाई

हैरानी की बात यह है कि कम जमीन होने के बावजूद केरल और मेघालय जैसे राज्यों के किसान आज सबसे ज्यादा खुशहाल हैं. मेघालय में किसानों की आय राष्ट्रीय औसत से 187.2% अधिक है, जबकि केरल में यह 75.3% ज्यादा है. इन राज्यों की सफलता का राज 'हाई-वैल्यू' फसलों में छिपा है. यहां का किसान सिर्फ पेट भरने के लिए अनाज नहीं उगाता, बल्कि बाजार की डिमांड के हिसाब से मसाले और बागवानी फसलों पर फोकस करता है. यह साबित करता है कि अगर हम सही फसल का चुनाव करें, तो एक छोटा सा खेत भी परिवार के लिए बड़ी आमदनी का जरिया बन सकता है.

पंजाब-हरियाणा को पशुपालन का सहारा

पंजाब और हरियाणा में किसानों की आय राष्ट्रीय औसत से क्रमशः 161.3 फीसद और 123.5 फीसद अधिक है. यहां के पास बड़ी जमीनें हैं और सरकार का खरीद सिस्टम (MSP) बहुत मजबूत है. लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि इन राज्यों की अमीरी का एक बड़ा हिस्सा पशुपालन और डेयरी से आता है. नीति आयोग के आंकड़े बताते हैं कि जिन किसानों के पास पशुधन है, उनकी आय सिर्फ फसल उगाने वालों से 86.2 फीसद ज्यादा है. पशुपालन न केवल नियमित कमाई देता है, बल्कि फसल खराब होने की स्थिति में एक मजबूत ढाल की तरह काम करता है. डेयरी और मछली पालन ही आने वाले समय में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ बनेंगे .

सरकारी नीतियों का असंतुलन

वर्तमान सिस्टम में एक बड़ी विसंगति है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सरकार की 60 फीसद से ज्यादा योजनाएं और सब्सिडी आज भी सिर्फ धान-गेहूं की फसल चक्र तक सीमित हैं. सरकारी वैज्ञानिक और फर्टिलाइजर का पैसा भी इन्हीं दो फसलों पर सबसे ज्यादा खर्च होता है. इसका नतीजा यह है कि हम सिर्फ कार्बोहाइड्रेट पैदा कर रहे हैं, जिससे देश में डायबिटीज और मोटापे जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं. साथ ही, ये फसलें बेतहाशा पानी पी रही हैं, जिससे भूजल स्तर पाताल में जा रहा है. सरकार को अब अपनी नीति बदलनी होगी. सब्सिडी का रुख धान-गेहूं से हटाकर सब्जी तिलहन, दलहन और बागवानी की तरफ मोड़ना ही पड़ेगा ताकि खेत और इंसान दोनों का स्वास्थ्य सुधर सके.

इन राज्यों की बदहाली और बोनस की राजनीति

झारखंड, ओडिशा, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में किसानों की हालत चिंताजनक है.झारखंड में  किसान परिवार राष्ट्रीय आय औसत से 52.1%  उड़ीसा 50 % पश्चिम बंगाल 33.8% और  बिहार की 26.2% कम है , यहां पर अधिकतर किसान आज भी सिर्फ धान की खेती पर निर्भर है और आधुनिक तकनीक से कोसों दूर है. कई राज्य सरकारें वोट बैंक के लिए छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान में धान और गेहूं पर भारी बोनस तो दे देती हैं, लेकिन यह लॉन्ग-टर्म में गरीबी का कारण बन रहा है. बोनस के लालच में किसान दूसरी फसलों की तरफ नहीं जाता. अब समय आ गया है कि सरकारें बोनस देने के बजाय फल-सब्जियों के लिए कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग यूनिट और बेहतर बाजार बनाने पर पैसा खर्च करें.

खाद्यान्न से आगे निकली बागवानी: इनकम की नई उम्मीद

एक बेहद सकारात्मक आंकड़ा यह है कि अब देश में पहली बार खाद्यान्न के मुकाबले फल और सब्जियों की पैदावार बढ़ गई है. ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, जहां अनाज उत्पादन लगभग 330 मिलियन टन के आसपास है, वहीं बागवानी फल, सब्जी, मसाले का उत्पादन इसे पार करते हुए 350 मिलियन टन से ऊपर निकल गया है. नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि अगर किसान अपनी जमीन के 40 फीसदी हिस्से पर भी बागवानी करता है, तो उसकी कमाई में 56 फीसदी तक का इजाफा हो सकता है. वह भी सब्जी में सिर्फ आलू-प्याज उगाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि हमें हाइ-वैल्यू और पोषक तत्वों वाली सब्जियां और  इनकी 'प्रोसेसिंग' यानी वैल्यू एडिशन पर ध्यान देना होगा. चिप्स, जैम, पाउडर और पैकेज्ड फूड के जरिए ही छोटे किसान की तकदीर बदलेगी.

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