किसानों का फायदा या गोदामों का बोझ...क्या है गेहूं नीति में बदलाव के पीछे की असली कहानी?

किसानों का फायदा या गोदामों का बोझ...क्या है गेहूं नीति में बदलाव के पीछे की असली कहानी?

भारत सरकार की ओर से गेहूं निर्यात कोटा बढ़ाने का फैसला किसानों की आय बढ़ाने से ज्यादा भरे हुए सरकारी गोदामों के दबाव का नतीजा माना जा रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार बफर से कई गुना अधिक स्टॉक, नई फसल की आवक और वैश्विक बाजार में अर्जेंटीना जैसे देशों से मुकाबले के चलते यह कदम उठाया गया, जिससे MSP खरीद और भंडारण व्यवस्था पर असर पड़ सकता है.

India wheat export policy changeIndia wheat export policy change
रवि कांत सिंह
  • New Delhi,
  • Apr 21, 2026,
  • Updated Apr 21, 2026, 6:39 PM IST

करीब चार साल बाद भारत ने अपनी गेहूं निर्यात नीति में बड़ा बदलाव किया है. यह किसानों के प्रति उदारता से ज्यादा 'मजबूरी का सौदा' नजर आता है. दरअसल, भारतीय कृषि बाजार इस समय एक दोहरी मुसीबत में फंसा हुआ है. एक तरफ देश के गोदाम जरूरत से ज्यादा (बफर कोटे से तीन गुना) भरे हैं, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में अर्जेंटीना जैसे देशों के सस्ते गेहूं ने भारत को कड़ी चुनौती दी है. नई फसल को रखने के लिए जगह बनाने और वैश्विक ग्राहकों को हाथ से फिसलने से बचाने के लिए सरकार ने रणनीतिक रूप से निर्यात कोटे को दोगुना कर 50 लाख टन तो कर दिया है, लेकिन असल सवाल यह है कि क्या यह फैसला किसानों की आय बढ़ाएगा या सिर्फ सरकारी गोदामों का बोझ कम करेगा?

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र सरकार के अधिकारी स्टॉक मैनेजमेंट का सटीक अनुमान लगाने में नाकाम रहे. यह स्थिति 'आग लगने पर कुआं खोदने' जैसी है. जब अप्रैल 2026 की नई आवक सिर पर है और गोदामों में गेहूं रखने की जगह नहीं बची, तब जाकर सरकार को निर्यात की याद आई है. जानकारों का कहना है कि यदि यह स्टॉक समय रहते खाली नहीं किया गया, तो मंडियों में नई फसल का उठान ठप हो जाएगा, जिससे सीधे तौर पर एमएसपी (MSP) पर होने वाली सरकारी खरीद प्रभावित होगी. साथ ही, गोदामों में पड़े इस पुराने स्टॉक के रखरखाव का बढ़ता खर्च सरकारी खजाने पर बोझ भी बनेगा. इसी संकट से बचने के लिए अब आनन-फानन में निर्यात का कोटा बढ़ाया गया है. 

व‍िश्व बाजार की चुनौत‍ियां 

गेहूं निर्यात के फैसले के पीछे दूसरी बड़ी वजह वैश्विक बाजार में भारतीय गेहूं की ऊंची कीमतें भी हैं. फिलहाल भारत का गेहूं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महंगा साबित हो रहा है, जिसका सीधा असर हमारे निर्यात पर पड़ रहा है. यही कारण है कि बांग्लादेश जैसे हमारे पारंपरिक और बड़े खरीदार अब अर्जेंटीना जैसे देशों का रुख कर रहे हैं, जहां उन्हें सस्ता गेहूं मिल रहा है. 

सरकार के सामने चुनौती यह थी कि यदि निर्यात की अनुमति नहीं दी जाती, तो यूएई और खाड़ी के अन्य महत्वपूर्ण देशों के बाजार भी हाथ से निकल जाने का जोखिम था. रणनीतिक हितों को देखते हुए सरकार ने निर्यात कोटा बढ़ाने का फैसला किया है. भारतीय खाद्य निगम (FCI) के आंकड़े बताते हैं कि 31 मार्च तक भारत के पास 218 लाख टन गेहूं का स्टॉक मौजूद था, जो अप्रैल में महीने भर के खर्च के बाद बफर स्टॉक की अनिवार्य सीमा से लगभग तीन गुना अधिक रह सकता है. 

इतने विशाल भंडार को लंबे समय तक सुरक्षित रखना चुनौतीपूर्ण है, विशेषकर तब जब नई फसल मंड‍ियों में भरी हुई है. ऐसे में निर्यात ही एकमात्र व्यावहारिक समाधान नजर आता है. गौरतलब है कि भारत ने मई 2022 में गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाया था, जिसे फरवरी 2026 में हटाते हुए शुरुआती तौर पर 25 लाख टन निर्यात की अनुमति दी गई. APEDA के अनुसार, इस कोटे के तहत नेपाल और यूएई को खेप भेजी जा चुकी है. अब स्टॉक मैनेजमेंट और बाजार की मांग को देखते हुए, 20 अप्रैल को अतिरिक्त 25 लाख टन गेहूं के निर्यात को मंजूरी दे दी गई है. 

गेहूं निर्यात का अगला ठ‍िकाना 

S&P Global की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश भारतीय गेहूं के निर्यात के लिए अगला बाजार बन सकता है, और उम्मीद है कि जल्द ही इसकी खेप भेजी जानी शुरू हो जाएगी. फुल सर्कल कमोडिटीज के डायरेक्टर अंकित माहेश्वरी ने कहा, "बिहार का गेहूं सिर्फ उत्तरी बांग्लादेश के लिए ही बराबर की कीमत पर उपलब्ध है, और वह भी सिर्फ रैक (ट्रेन) के जरिए." "बांग्लादेश हर साल लगभग 72 लाख मीट्रिक टन गेहूं आयात करता है, लेकिन अभी माल ढुलाई की ऊंची दरों के चलते, भारतीय गेहूं अर्जेंटीना और बाकी देशों के गेहूं के साथ मुकाबला कर रहा है."  

इस साल की शुरुआत में जब भारत ने गेहूं के निर्यात का कोटा लगाया, उसके बाद से दक्षिण‑पूर्व एशिया में भारतीय गेहूं की मांग बहुत कम रही है. चाहे पशुओं के चारे के लिए हो या आटा बनाने के लिए, दोनों मामलों में मांग कमजोर है. उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि इसकी दो मुख्य वजहें हैं. भारतीय गेहूं की कीमतें दूसरी देशों की तुलना में अधिक हैं, क्वालिटी को लेकर खरीदारों को भरोसा नहीं है.

भारतीय गेहूं से दूरी क्यों? 

एक स्थानीय व्यापारी ने बताया कि दक्षिण‑पूर्व एशिया के आटा मिल मालिक भारतीय गेहूं खरीदने से कतराते हैं, क्योंकि भारत की एक्सपोर्ट पॉलिसी बार‑बार बदलती रहती है और उस पर भरोसा नहीं बन पाता. वियतनाम के एक आटा मिल मालिक ने S&P Global से कहा कि भारतीय गेहूं की कीमतें दूसरे देशों से काफी ज्यादा हैं. उन्होंने यह भी बताया कि पहले भारतीय गेहूं में “ब्लैक फंगस” (काली फफूंदी) जैसी समस्या देखी गई थी, इसलिए वियतनाम अब भारतीय गेहूं से दूरी बनाए रखना चाहता है.

इसी तरह इंडोनेशिया के आटा मिल मालिकों ने भी कहा कि अगर भारत को ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका और ब्लैक सी क्षेत्र के गेहूं से मुकाबला करना है, तो अपनी कीमतों में भारी कटौती करनी होगी. दूसरी ओर, मध्य प्रदेश के एक निर्यातक ने बताया कि ईरान युद्ध की वजह से गिरे एक्सपोर्ट के बीच सरकार अगर कुछ मदद करे तो भारतीय गेहूं खरीदारों के लिए कुछ फायदे का सौदा बन सकता है. निर्यातक ने आगे कहा कि अगर सरकार गेहूं निर्यातकों को सब्सिडी देती है- जैसा कि उसने तीन साल पहले चीनी निर्यातकों को 30% सब्सिडी दी थी तो भारतीय गेहूं की कीमतें इंटरनेशनल मार्केट में कुछ घट सकती हैं.

भारतीय गेहूं और व‍िश्व बाजार 

कुल मिलाकर, सरकार का यह कदम आर्थिक संतुलन और रणनीतिक कूटनीति के बीच एक बेहतर तालमेल बिठाने की कोशिश है. एक ओर जहां बफर स्टॉक की अधिकता और नई फसल की आवक ने निर्यात को एक मजबूरी बना दिया, वहीं दूसरी ओर वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बचाए रखना भारत की अगली व्यापारिक रणनीति का हिस्सा है. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ते मुकाबले और ऊंचे दामों की चुनौती बरकरार है, लेकिन निर्यात कोटे में इस बढ़ोतरी से न केवल सरकारी गोदामों का बोझ कम होगा, बल्कि वैश्विक फूड चेन सप्लाई में भारत की साख भी मजबूत होगी. आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच भारतीय गेहूं अपनी जगह कितनी मजबूती से बना पाता है.

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