Cashew Industry: अवैध आयात और कमजोर रुपया, दोहरी मार झेल रहा भारत का काजू उद्योग, जानें क्‍या बोले एक्‍सपर्ट

Cashew Industry: अवैध आयात और कमजोर रुपया, दोहरी मार झेल रहा भारत का काजू उद्योग, जानें क्‍या बोले एक्‍सपर्ट

कमजोर रुपये ने भारतीय काजू उद्योग की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. निर्यातकों को राहत मिली है, लेकिन आयात पर निर्भर प्रोसेसर 20-25 प्रतिशत बढ़ी लागत से जूझ रहे हैं. अवैध आयात और कमजोर मांग ने संकट और गहरा दिया है.

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क‍िसान तक
  • Noida,
  • Jan 09, 2026,
  • Updated Jan 09, 2026, 4:43 PM IST

भारतीय काजू उद्योग इस समय अपने सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है. रुपये में आई तेज गिरावट ने पूरे सेक्टर पर असमान असर डाला है. जहां एक ओर कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए अस्थायी राहत बनकर आया है. वहीं, दूसरी ओर आयात पर निर्भर प्रोसेसिंग उद्योग के लिए यह बड़ा झटका साबित हो रहा है. खासकर पश्चिम अफ्रीकी देशों से कच्चे काजू के आयात के लिए निर्भर प्रोसेसर्स की लागत अचानक बेकाबू हो गई है. भारत की काजू प्रोसेसिंग क्षमता घरेलू कच्चे काजू उत्पादन से कहीं अधिक है. यही वजह है कि उद्योग को बड़ी मात्रा में कच्‍चे काजू इंपोर्ट करना पड़ते हैं. डॉलर के मुकाबले रुपये के 90 से 92 के स्तर को 2026 की शुरुआत में छूने से आयात लागत में 20 से 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. 

घाटे में माल बेच रहे घरेलू प्रोसेसर्स

बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, Beta Group के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर जे. राजमोहन पिल्लई ने कहा कि यह स्थिति केवल लागत बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रोसेसिंग सिस्टम को नुकसान की ओर धकेल रही है. सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि कच्चे माल की कीमतें तो तेजी से बढ़ीं, लेकिन घरेलू बाजार में काजू के दाम लगभग स्थिर बने हुए हैं. इसका नतीजा यह हो रहा है कि कई प्रोसेसर घाटे में माल बेचने को मजबूर हैं, ताकि नकदी बनी रहे और स्टॉक निकल सके. इस दबाव का सीधा असर रिटेल मार्केट पर भी पड़ा है. जैसे ही कीमतें बढ़ाने की कोशिश होती है, उपभोक्ता मांग कमजोर पड़ने लगती है.

अवैध काजू आयात बढ़ा रहा और मुश्किल

इस बीच, काजू का अवैध आयात स्थिति को और गंभीर बना रहा है. अफ्रीका और वियतनाम से तैयार काजू गिरी को पशु आहार या भूसी बताकर देश में लाया जा रहा है, जिससे 25 से 30 प्रतिशत इंपोर्ट ड्यूटी से बचा जा सके. गोवा काजू मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रोहित जाट्ये के अनुसार, वियतनाम से आने वाले ऐसे कंसाइनमेंट तेजी से बढ़े हैं, जिन्हें रोस्‍टेड काजू बताकर शून्य ड्यूटी का फायदा लिया जा रहा है. जिसके चलते पहले ही ऊंची मजदूरी और बिजली लागत से जूझ रहे घरेलू प्रोसेसर और पीछे छूट रहे हैं.

एक्‍सपोर्ट वैल्‍यू में बढ़ाेतरी

हालांकि, एक्‍सपोर्ट ओरिएंटेड यूनिट्स के लिए तस्वीर कुछ अलग है. कुछ इकाइयों ने हाल के महीनों में रिकॉर्ड शिपमेंट दर्ज किए हैं और एक्‍सपोर्ट वैल्‍यू में 100 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी देखी गई है. लेकिन, यह पूरे उद्योग का छोटा सा हिस्सा है. अधिकांश प्रोसेसर के लिए महंगा डॉलर कच्चे काजू के आयात को लगभग असंभव बना रहा है, जिससे लागत और बाजार कीमतों के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है.

इन राज्‍यों में लगी नई प्रोसेसिंग यूनिट

इसी बीच, देश में काजू की प्रोसेसि‍ंग क्षमता भी बढ़ी है. मैकेनाइजेशन के चलते गुजरात, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम जैसे इलाकों में नई प्रोसेसिंग यूनिट्स लगी हैं. इससे घरेलू सप्लाई तो बढ़ी है, लेकिन प्रतिस्पर्धा भी तेज हुई है. उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि 8 से 10 प्रतिशत की संभावित मार्केट ग्रोथ के बावजूद सभी नए प्‍लेयर्स टिकाऊ मुनाफा कमा पाएंगे या नहीं, यह अभी साफ नहीं है.

इसे लेकर केरल के कोल्लम स्थित विजयलक्ष्मी काजू कंपनी के एमडी प्रताप नायर का कहना है कि जनवरी के मध्य से शादी-ब्याह के सीजन के साथ घरेलू मांग में कुछ सुधार आने की उम्मीद है. फिलहाल भारत में काजू गिरी की करीब 70 प्रतिशत मांग आयात से और 30 प्रतिशत घरेलू उत्पादन से पूरी होती है. ऐसे में रुपये की चाल आने वाले महीनों में इस उद्योग की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी.

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