
वैश्विक स्तर पर गेहूं उत्पादन को लेकर चिंता पैदा करने वाली तस्वीर सामने आई है. अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत को छोड़कर दुनिया के अधिकांश प्रमुख गेहूं उत्पादक देशों में इस साल उत्पादन में गिरावट आने का अनुमान है. ऐसे समय में जब पहले से ही वैश्विक महंगाई और पश्चिम एशिया में तनाव से बाजार प्रभावित है, यह स्थिति खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बना सकती है. युद्ध की मार के बीच अल नीनो का खतरा भी बड़ा है जिसने पूरी दुनिया को चिंता में डाल रखा है. किसानों के सामने एक ही सवाल है कि आगे क्या होगा, उनकी खेती चलेगी या चौपट होगी.
रिपोर्ट के मुताबिक भारत इस बार गेहूं के उत्पादन में रिकॉर्ड बना सकता है. देश में करीब 121 मिलियन टन गेहूं उत्पादन का अनुमान जताया गया है, जो पिछले साल के 118 मिलियन टन से लगभग 3 मिलियन टन अधिक है. हालांकि, घरेलू आपूर्ति और महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सरकार फिलहाल गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध जारी रखे हुए है.
भारत में गेहूं उत्पादन बढ़ने के पीछे सबसे बड़ी वजह रकबे में वृद्धि है. रबी सीजन 2026 में गेहूं की खेती का रकबा बढ़कर करीब 334.17 लाख हेक्टेयर हो गया, जो पिछले साल 328.04 लाख हेक्टेयर था. इसका मतलब है कि इस बार ज्यादा किसानों ने गेहूं की खेती पर भरोसा दिखाया. इसकी मुख्य वजह सरकार द्वारा दिया जा रहा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और मजबूत सरकारी खरीद व्यवस्था है. इससे संकेत मिलता है कि इस साल भी अच्छी फसल ने किसानों का साथ दिया. कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने गेहूं उत्पादन 1202 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान दिया है.
दूसरी ओर, अमेरिका में गेहूं उत्पादन में भारी गिरावट का अनुमान है. 2026-27 के लिए उत्पादन घटकर 1.561 बिलियन बुशल रहने की संभावना है, जो पिछले साल से 21 प्रतिशत कम है. यह 1972-73 के बाद का सबसे निचला स्तर होगा. सूखा, कम बोआई क्षेत्र और घटती पैदावार इसके प्रमुख कारण बताए गए हैं. उत्पादन कम होने से अमेरिकी निर्यात भी घटकर 775 मिलियन बुशल रहने का अनुमान है, जबकि कीमतें बढ़कर 6.50 डॉलर प्रति बुशल तक पहुंच सकती हैं.
रूस में भी गेहूं उत्पादन करीब 5 प्रतिशत घटकर 86 मिलियन टन रहने का अनुमान है. कनाडा में उत्पादन 12 प्रतिशत गिरकर 35 मिलियन टन हो सकता है. इसके अलावा यूरोपियन यूनियन, अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी उत्पादन प्रभावित रहने की संभावना जताई गई है.
वैश्विक स्तर पर कुल गेहूं उत्पादन घटकर 819.1 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि प्रमुख निर्यातक देशों में उत्पादन घटने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति कम होगी, जिससे गेहूं और उससे जुड़े उत्पादों की कीमतों में तेजी आ सकती है.
विशेषज्ञों के अनुसार, पहले से ही बढ़ती खाद्य महंगाई के बीच गेहूं उत्पादन में यह गिरावट चिंता का विषय है. ब्रेड, आटा, पास्ता और अन्य गेहूं से बनने वाले खाद्य पदार्थों की कीमतें और बढ़ सकती हैं. पश्चिम एशिया में जारी तनाव और सप्लाई चेन की समस्याएं भी इस स्थिति को और जटिल बना सकती हैं.
कुल मिलाकर, जहां भारत में रिकॉर्ड पैदावार राहत दे सकती है, वहीं दुनिया के अन्य हिस्सों में घटता उत्पादन वैश्विक महंगाई को और बढ़ाने का संकेत दे रहा है.
USDA के चार्ट के अनुसार दुनिया में गेहूं उत्पादन (2026/27 अनुमान) 819.06 मिलियन मीट्रिक टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल के 843.84 मिलियन मीट्रिक टन से 24.78 मिलियन टन (−2.94%) कम है.
विश्व क्षेत्रफल: 218.42 मिलियन हेक्टेयर
औसत उपज: 3.75 टन/हेक्टेयर
कुल उत्पादन: 819.06 मिलियन टन
वार्षिक परिवर्तन: −24.78 मिलियन टन (−2.94%)
यह दिखाता है कि 2026/27 में दुनिया में गेहूं उत्पादन में हल्की गिरावट का अनुमान है. इससे साफ है कि गेहूं और उसके प्रोडक्ट की महंगाई देखी जाएगी. वह भी ऐसे समय में जब पूरी दुनिया ईरान-अमेरिका युद्ध की वजह से तेल, खाद जैसी जरूरी चीजों की सप्लाई से जूझ रही है. भारत अगर अपना निर्यात खोल दे तो दुनिया में कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन ताजा हालात इस बात की ओर कम ही इशारा करते हैं. ऐसे में मान कर चलें कि दुनिया के बाजार में गेहूं की कमी रहेगी और इसकी महंगाई आम लोगों को परेशान करेगी.
एक तरफ गेहूं उत्पादन गिरने का अनुमान है तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. इसका कारण यह है कि दुनिया में गेहूं की सप्लाई घट रही है और निर्यात के लिए उपलब्ध स्टॉक कम होता जा रहा है. इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ रहा है. गेहूं महंगा होने से आटा, ब्रेड और बिस्किट जैसी रोजमर्रा की खाने की चीजें भी महंगी हो जाती हैं. इससे घर का खर्च बढ़ जाता है और लोगों का बजट बिगड़ने लगता है.
सिर्फ यही नहीं, गेहूं महंगा होने से पशुओं के चारे की लागत भी बढ़ती है और बेकरी जैसे कारोबार पर भी असर पड़ता है. कुल मिलाकर, गेहूं की कीमतों में बढ़ोतरी महंगाई को और तेज कर देती है.