इथेनॉल नीति से तिलहन संकट का खतरा, खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता पर उठे सवाल

इथेनॉल नीति से तिलहन संकट का खतरा, खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता पर उठे सवाल

भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने की रणनीति से तिलहन फसलों पर दबाव बढ़ने की आशंका है. चावल और मक्का से बढ़ते इथेनॉल उत्पादन के कारण DDGS जैसे सस्ते विकल्प पशु आहार में इस्तेमाल हो रहे हैं, जिससे ऑयलमील की मांग घट रही है और सोयाबीन जैसी तिलहन फसलों का रकबा कम हो रहा है. इससे खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.

ethanol plant crisisethanol plant crisis
रवि कांत सिंह
  • New Delhi ,
  • Mar 25, 2026,
  • Updated Mar 25, 2026, 6:19 PM IST

भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने की रणनीति से तिलहन फसलों पर दबाव बढ़ने की आशंका है. चावल और मक्का से बढ़ते इथेनॉल उत्पादन के कारण DDGS जैसे सस्ते विकल्प पशु आहार में इस्तेमाल हो रहे हैं, जिससे ऑयलमील की मांग घट रही है और सोयाबीन जैसी तिलहन फसलों का रकबा कम हो रहा है। इससे खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

भारत कच्चे तेल और खाद्य तेल दोनों का बड़ी मात्रा में आयात करता है. पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बीच कच्चे तेल के आयात पर संकट है, एलपीजी की भी घोर कमी है. हालांकि खाद्य तेलों की सप्लाई में कोई समस्या नहीं है. कच्चे तेल के आयात में आई गिरावट ने इथेनॉल के विकल्प को अधिक महत्व दिया है. अभी तक पेट्रोल में 20 परसेंट इथेनॉल की ब्लेंडिंग की जा रही है, लेकिन उसे बढ़ाने की वकालत है. इसके अलावा, एलपीजी की तरह घरों में ईंधन के रूप में इथेनॉल सप्लाई किए जाने की मांग है. जाहिर है, इससे इथेनॉल का उपयोग बढ़ेगा जिससे उसकी मांग भी बढ़ेगी. इससे देश में इथेनॉल का उत्पादन बढ़ाना होगा. लेकिन यह इथेनॉल किस फसल की कीमत पर बढ़ेगा?

पशु आहार में डीडीजीएस का प्रयोग

देश में इथेनॉल का उत्पादन मुख्य तौर पर चावल और मक्के से किया जाता है. इससे इथेनॉल बनने के बाद बड़ी मात्रा में DDGS बायप्रोडक्ट के रूप में पैदा होता है. यह डीडीजीएस ऑयलमील का स्थान ले रहा है जिसका प्रयोग पशु आहार से लेकर पोल्ट्री फीड तक में बड़ी मात्रा में होता है. डीडीजीएस चूंकि सस्ता चारा है, इसलिए लोगों ने ऑयलमील या खली का प्रयोग कम कर दिया है जिससे तिलहन फसलों की खेती घट रही है. सोयाबीन जैसी फसलों का रकबा इसलिए कम हुआ है क्योंकि इसकी मांग कम हो रही है. 

सवाल है कि जब इथेनॉल की वजह से तिलहन का उत्पादन घटेगा तो इसकी भरपाई कहां से होगी? जाहिर है खाद्य तेलों की भरपाई के लिए सरकार को विदेश से आयात करना होगा. ऐसे में समझना आसान है कि कच्चे तेल के आयात को पूरा करने के लिए हम खाद्य तेलों के इंपोर्ट को बढ़ावा दे रहे हैं. यानी किसी एक समस्या को सुलझाने के लिए हम दूसरी समस्या बढ़ा रहे हैं. यह ऐसा कदम है जिससे सरकार का आत्मनिर्भर तिलहन मिशन धीमा पड़ सकता है.

इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने को क्यों उठी मांग?

पश्चिम एशिया में जारी लड़ाई के बीच भारत में ऊर्जा के रूप में इथेनॉल सबसे सटीक विकल्प के रूप में उभरा है. सरकार ने खुद आंकड़ा दिया है कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से विदेशी मुद्रा में 1.63 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बचत हुई है और 2014 से अब तक कच्चे तेल का आयात 277 लाख मीट्रिक टन कम हुआ है. इस फायदे को देखते हुए इथेनॉल का इस्तेमाल अब बाकी क्षेत्रों में बढ़ाने की मांग उठ रही है. अभी तक इसे गाड़ियों के ईंधन में मिलाया जाता था, अब घरों में इससे चूल्हा जलाने की बात हो रही है. आने वाले दिनों में जैसे सिलेंडर और पीएनजी से खाना बनता है, वैसे ही इथेनॉल से भी बनेगा. इन तमाम सुविधाओं को देखते हुए इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने पर जोर है. लेकिन इसका एक छिपा हुआ जोखिम है.

डीडीजीएस से कैसे निपटेगी सरकार

डिस्टीलर्स ड्रायड ग्रेन्स विद सोल्यूबुल्स यानी DDGS आजकल बहुत चर्चा में है, खासकर अमेरिकी ट्रेड डील का प्रस्ताव आने के बाद. आसान भाषा में कहें तो यह इथेनॉल बनने के बाद निकलने वाला एक तरह का कचरा है जो सूखे अनाज के दानों के रूप में होता है. हालांकि, यह कचरा (बायप्रोडक्ट) भले हो, मगर पशुओं के चारे के लिए बहुत कारगर है. मक्के से बनने वाले इथेनॉल में डीडीजीएस की मात्रा अधिक होती है जिसमें प्रोटीन और पोषक तत्वों का भंडार होता है. जो किसान पशु आहार के लिए सोया, सरसों और मक्के की चरी या खली पर निर्भर हैं, उनके लिए डीडीजीएस सबसे अच्छा विकल्प बनकर उभरा है. सोया, सरसों और मक्के पर होने वाले खर्च की तुलना में डीडीजीएस कम लागत में चारे की जरूरत पूरी कर रहा है. इसलिए आने वाले समय में इसकी मांग और बढ़ने वाली है. लेकिन इस DDGS ने बड़ी समस्या खड़ी की है.

'रॉयटर्स' की एक रिपोर्ट में उद्योग के अधिकारियों ने बताया कि भारत में DDGS का उत्पादन पिछले दो वर्षों में लगभग 13 गुना बढ़ गया है, और इस वित्त वर्ष के अंत तक इसके अनुमानित 55 लाख टन तक पहुंचने की उम्मीद है. जानकार बताते हैं कि डीडीजीएस की यह वृद्धि तिलहन फसलों की खेती की कीमत पर दर्ज की जा रही है, तभी सोयाबीन और मूंगफली जैसी फसल का रकबा घट रहा है. किसान भी इस बात को महसूस कर रहे हैं. उनका कहना है कि जब सोयाबीन से अधिक दाम मक्के को मिलेगा तो वे सोयाबीन की खेती क्यों करेंगे?

सोयाबीन पिछड़ा, मक्का आगे निकला

सोयाबीन जैसी फसल का पिछड़ना और मक्के का आगे निकलना खेती-बाड़ी के साथ ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ी घटना है. सरकार ने किसानों को मक्के की खेती बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया क्योंकि इथेनॉल ब्लेंडिंग का बड़ा लक्ष्य था. किसानों ने सरकार की बात मानी और कई परंपरागत फसलों की खेती छोड़कर मक्के में लग गए. इसका रिजल्ट बहुत अच्छा मिला. इथेनॉल बनाने में मक्के की हिस्सेदारी 50 फीसद से ऊपर चली गई. टारगेट से अधिक इथेनॉल बनाने का काम पूरा हो गया. लेकिन अचानक सरकार ने पलटी मारी और इथेनॉल खरीदना बंद कर दिया. किसानों में गहरी मायूसी फैल गई, खासकर बिहार जैसे राज्यों में जहां इथेनॉल फैक्ट्रियों से मक्के को अच्छा भाव मिल रहा था. किसानों की इस नाराजगी के बीच पश्चिम एशिया का संघर्ष शुरू हो गया और सरकार को दोबारा इथेनॉल पर लौट कर आना पड़ा.

आगे कैसा रहेगा खतरा

एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने 2024 में 17 अरब डॉलर के खाद्य तेलों का आयात किया था. जिस देश में इतने बड़े पैमाने पर खाने के तेलों का आयात होता हो, वहां तिलहन का रकबा घटना या खेती में किसानों की घटती दिलचस्पी जोखिम भरा कदम हो सकता है. इस जोखिम को डीडीजीएस और भी गंभीर बना रहा है.

रॉयटर्स की रिपोर्ट बताती है, 2023-24 में खाने के तेल का आयात बढ़कर 160 लाख टन हो गया है, जो दो दशक पहले 44 लाख टन था. इससे भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल का खरीदार बन गया है, जो इंडोनेशिया और मलेशिया से पाम तेल, और अर्जेंटीना, ब्राजील, रूस और यूक्रेन से सोया तेल और सूरजमुखी तेल खरीदता है. भारत का लक्ष्य 2030-31 तक घरेलू खाने के तेल का उत्पादन मौजूदा 127 लाख टन से बढ़ाकर 254 लाख टन करना है. अगर इतना उत्पादन होता है तो हमारी मांग का 72 परसेंट पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा. लेकिन DDGS इसमें अड़ंगा डाल रहा है और उसकी सप्लाई में हुई भारी बढ़ोतरी के कारण तिलहन आत्मनिर्भरता के प्रयास में बाधा आ रही है.

जाहिर है, जब हम कच्चे तेल की मांग को पूरा करने के लिए इथेनॉल बढ़ाएंगे तो डीडीजीएस भी बढ़ेगा. डीडीजीएस के बढ़ने से तिलहन घटेगा. तिलहन घटने से खाद्य तेलों का आयात बढ़ेगा. लिहाजा, कच्चे तेल का आयात कम तो होगा, लेकिन खाद्य तेलों की कीमत पर यह मुमकिन है.

MORE NEWS

Read more!