अन्नदाताओं के आंसू पोंछने वाला 'क्रांतिवीर' मौन, मायानगरी में रहकर भी नाना पाटेकर नहीं भूले किसानों का दर्द

अन्नदाताओं के आंसू पोंछने वाला 'क्रांतिवीर' मौन, मायानगरी में रहकर भी नाना पाटेकर नहीं भूले किसानों का दर्द

नाना पाटेकर सिर्फ सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नहीं, बल्कि किसानों और गांवों से गहरा जुड़ाव रखने वाले संवेदनशील इंसान भी थे. मराठवाड़ा के सूखा प्रभावित किसानों की मदद से लेकर नाम फाउंडेशन के जरिए जल संरक्षण, किसान परिवारों के पुनर्वास और ग्रामीण विकास तक उन्होंने जमीन पर काम किया. 8 अक्टूबर को उनके निधन से किसानों की आवाज उठाने वाला एक मजबूत चेहरा खामोश हो गया.

Nana Patelkar DeathNana Patelkar Death
ओम प्रकाश
  • New Delhi,
  • Oct 08, 2026,
  • Updated Oct 08, 2026, 3:46 PM IST

यह किस्सा नब्बे के दशक का है, जब नाना पाटेकर की फिल्म 'अग्नि साक्षी' ब्लॉकबस्टर हो चुकी थी और वे सफलता के शिखर पर थे. उनके पास शोहरत और पैसे की कोई कमी नहीं थी. उन्होंने अपने लिए डेढ़ करोड़ रुपये की एक चमचमाती लग्जरी कार पसंद की, जिसकी बुकिंग भी लगभग पक्की हो चुकी थी. तभी एक दिन वैनिटी वैन में टीवी देखते हुए उन्होंने महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ में पड़े भीषण सूखे और उसके कारण तड़पकर जान देने वाले किसानों की खबरें देखीं. कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की पत्नियों और अनाथ बच्चों का रोना देखकर नाना का मन पसीज गया.

फिल्म के लेखक रणबीर पुष्प जब उनसे मिलने पहुंचे, तो नाना की आंखों से आंसू बह रहे थे. नाना ने रूंधे गले से कहा, "मेरे देश का अन्नदाता पानी की एक-एक बूंद और रोटी के टुकड़े के लिए तरसकर मर रहा है, ऐसे में मैं करोड़ों की गाड़ी में कैसे घूम सकता हूं? मेरा जमीर इसकी इजाजत नहीं देता."

उन्होंने तुरंत कार की बुकिंग कैंसिल कराई और वह पूरे डेढ़ करोड़ रुपये पीड़ित किसान परिवारों की मदद के लिए दे दिए.  हिंदी और मराठी सिनेमा के इस महानायक का 8 अक्टूबर सुबह कार्डियक अरेस्ट से निधन हो गया. वे अभिनय की दुनिया के साथ-साथ अपनी माटी और खेती से गहरा जुड़ाव रखने वाले एक सच्चे किसान के रूप में भी जाने जाते थे. 

खामोश हुई किसानों की आवाज

सिनेमा के पर्दे पर जब वे अपनी कड़क और बुलंद आवाज में संवाद बोलते थे, तो थियेटरों में तालियों की गड़गड़ाहट थमने का नाम नहीं लेती थी. उनकी आंखें बोलने से पहले ही अभिनय कर देती थीं, उनकी खामोशी में एक गहरा अर्थ छिपा होता था और जब वे पर्दे पर चीखते थे, तो समाज की सोई हुई अंतरात्मा कांप उठती थी. लेकिन आज वो बुलंद आवाज हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो गई है. बृहस्पतिवार सुबह गोवा के डोना पाउला स्थित आवास पर अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें गंभीर कार्डियक अरेस्ट आया. डॉक्टरों ने मणिपाल अस्पताल में करीब 45 मिनट तक लगातार सीपीआर (CPR) देकर उन्हें होश में लाने की भरसक कोशिश की, लेकिन वे उन्हें बचा नहीं सके. सुबह 5:20 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.

नाना जैसा किसान हितैषी अभिनेता नहीं

नाना पाटेकर के जाने से सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री ने एक बेमिसाल अभिनेता को नहीं खोया है, बल्कि इस देश की मिट्टी और खेत-खलिहानों ने अपना सबसे सच्चा बेटा खो दिया है. चकाचौंध भरी फिल्मी दुनिया में इस वक्त उनके जैसा किसान हितैषी और संवेदनशील एक्टर शायद ही कोई बचा है. जहां सितारे अपनी लग्जरी लाइफस्टाइल और विदेशी वेकेशन की तस्वीरें साझा करने में मशगूल रहते हैं, वहीं नाना पाटेकर ने कैमरे बंद होने के बाद एक बेहद सादा जीवन चुना. वे मुंबई के आलीशान बंगलों को छोड़कर पुणे के पास अपने साधारण फार्महाउस पर सूती कुर्ता-पायजामा पहनकर खुद खेती करते थे, फसलों के बीच पसीना बहाते थे और जानवरों के साथ वक्त बिताते थे. वे दिल से एक शुद्ध किसान थे, जो कभी अपनी जड़ों को नहीं भूले.

पीड़ित परिवारों का हाथ थामा

नाना पाटेकर उन लोगों में से नहीं थे, जो सिर्फ दफ्तरों या बंगलों में बैठकर चेक काट देते हैं. वे खुद चिलचिलाती धूप और धूल भरे रास्तों से होते हुए मराठवाड़ा के लातूर और उस्मानाबाद जैसे दूर-दराज के गांवों में पहुंचे. वे उन झोपड़ियों और कच्चे मकानों में गए जहां मातम पसरा हुआ था. नाना ने उन बुजुर्ग माता-पिता और विधवा महिलाओं को गले लगाया, उनके आंसू पोंछे और खुद अपने हाथों से शुरुआती दौर में साठ से सत्तर से अधिक पीड़ित परिवारों को पंद्रह-पंद्रह हजार रुपये के चेक सौंपे. यह रकम भले ही उनके संकट के आगे छोटी रही हो, लेकिन दुख की उस घड़ी में देश के इतने बड़े स्टार को अपने बीच पाकर किसानों के परिवारों को यह अहसास हुआ कि इस दुनिया में कोई उनके साथ खड़ा है.

नाम फाउंडेशन की शुरुआत

जब नाना पाटेकर गांवों का दौरा कर रहे थे, तब उन्हें अहसास हुआ कि व्यक्तिगत रूप से की जाने वाली मदद की एक सीमा होती है. संकट इतना बड़ा था कि इसके लिए एक व्यवस्थित और बड़े प्रयास की जरूरत थी. इसी सोच के साथ सितंबर 2015 में नाना पाटेकर ने अपने बेहद करीबी दोस्त और मशहूर मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम फाउंडेशन’ नाम के एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) की स्थापना की.

नाना पाटेकर की ईमानदारी और विश्वसनीयता इतनी मजबूत थी कि संस्था की शुरुआत के पहले ही दिन आम जनता की तरफ से अस्सी लाख रुपये से ज्यादा का डोनेशन मिल गया, जो बाद में बढ़कर करोड़ों में तब्दील हो गया और सीधे गांवों के विकास में लगाया जाने लगा.

पानी की कहानी

नाना पाटेकर अच्छी तरह जानते थे कि किसानों की आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह पानी की कमी और लगातार पड़ने वाला सूखा है. अगर खेतों को पानी मिल जाए, तो किसान कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएगा. इसलिए नाम फाउंडेशन ने जल संरक्षण को अपना सबसे मुख्य मिशन बनाया.

नाना की संस्था ने आधुनिक मशीनों, स्थानीय प्रशासन और ग्रामीणों के श्रमदान की मदद से महाराष्ट्र के करीब दो सौ गांवों में जल संरक्षण का काम शुरू किया. दावा है कि पिछले एक दशक में नाम फाउंडेशन ने पांच सौ से अधिक नालों, छोटी धाराओं, नहरों और नदियों की गाद साफ करके उन्हें गहरा और चौड़ा करने का ऐतिहासिक काम पूरा किया.

उजड़े परिवारों को नया जीवन

किसान की मृत्यु के बाद सबसे ज्यादा दुख और संघर्ष उस परिवार की महिला को झेलना पड़ता है. नाम फाउंडेशन ने इन महिलाओं को समाज में सम्मान से जीने और अपने पैरों पर खड़े होने के लिए कई कदम उठाए. संस्था की तरफ से प्रभावित परिवारों की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सैकड़ों सिलाई मशीनें, आटा-मसाला पीसने की मशीनें और दुधारू बकरियां बांटी गईं, ताकि वे घर बैठे गरिमा के साथ अपनी आजीविका कमा सकें.

जिन पीड़ित किसान परिवारों के पास रहने के लिए सुरक्षित छत नहीं थी या जिनके घर ढह चुके थे, उनके लिए नाम फाउंडेशन ने पक्के और मजबूत मकानों का निर्माण करवाकर उन्हें सौंप दिया. नाना पाटेकर ने औरंगाबाद के 'धोंडलगांव' और वर्धा के 'आमला' जैसे कई अत्यंत पिछड़े और सूखाग्रस्त गांवों को गोद लिया. इन गांवों में पानी की पाइपलाइन बिछाने से लेकर, साफ-सफाई, पक्की सड़कों और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने तक का सारा काम संस्था ने अपने हाथ में लिया.

सादगी की मिसाल

आज के समय में जहां लोग अपनी सुख-सुविधाओं को बढ़ाने में लगे रहते हैं, वहीं नाना पाटेकर अपनी जिंदगी को न्यूनतम जरूरतों के साथ जीते थे. नाना पाटेकर अपनी फिल्मों, विज्ञापनों और पुरस्कारों से होने वाली बड़ी कमाई चुपचाप सामाजिक कार्यों और किसानों के कल्याण में लगा देते थे. वे खुद मुंबई में एक साधारण से घर में रहते थे और चकाचौंध से दूर एक शांत जीवन जीते थे. उनका कहना था, "जितना मैंने कमाया है वह मेरे लिए बहुत है, दूसरों को इसकी ज्यादा जरूरत है".

"अन्नदाता भिखारी नहीं है"

आर्थिक और सामाजिक मदद करने के साथ-साथ नाना पाटेकर हमेशा किसानों के अधिकारों के लिए भी लड़ते रहे. वे देश के एकमात्र ऐसे बड़े अभिनेता थे जिन्होंने खुले मंचों से राजनेताओं और सरकारों की नीतियों की तीखी आलोचना की. नाना ने एक बार बड़े ही कड़े शब्दों में कहा था कि हमारे देश का किसान कोई भिखारी नहीं है जो सरकारों के आगे भीख मांगे. उसे कर्जमाफी या खैरात की भीख नहीं, बल्कि उसकी फसल का सही दाम, उसका हक और समाज में सम्मान चाहिए.

नाना पाटेकर ने अपने कर्मों से यह साबित कर दिया कि असली नायक या 'हीरो' वह नहीं होता जो सिनेमा के पर्दे पर नकली विलेन को मारता है. असली हीरो वह होता है जो समाज के सबसे कमजोर और पीड़ित वर्ग के आंसू पोंछने के लिए खुद जमीन पर उतर आता है. आज भले ही नाना पाटेकर का शरीर शांत हो गया है, लेकिन महाराष्ट्र के हजारों किसान परिवारों के खिले हुए चेहरे हमेशा उनकी गवाही देते रहेंगे. मिट्टी का यह अनमोल लाल हमेशा इस देश के अन्नदाताओं के दिलों में अमर रहेगा. नाना को भावभीनी श्रद्धांजलि!

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