
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के एक छोटे से गांव नांगला अखू के रहने वाले अवनीश कुमार त्यागी आज देश के लाखों किसानों के लिए एक मिसाल बन चुके हैं. 57 वर्षीय अवनीश जी कोई साधारण किसान नहीं हैं, बल्कि उन्होंने गणित विषय में एम.एससी. की डिग्री हासिल की है. शिक्षा का यह आधार उनके 35 वर्षों के खेती के अनुभव के साथ मिलकर एक ऐसी ताकत बना, जिसने आम की खेती के पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया. उन्होंने यह साबित कर दिया कि खेती केवल पसीने का काम नहीं है, बल्कि यह दिमाग और सही गणना का खेल है.
अक्सर ऊंची शिक्षा प्राप्त युवा खेती से दूर भागते हैं, लेकिन अवनीश जी ने अपनी गणितीय बुद्धि का उपयोग मिट्टी की समस्याओं को सुलझाने में किया. उन्होंने अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह समझा कि तकनीक और योजना का सही मेल हो, तो मिट्टी से सोना उगाया जा सकता है. उनकी यह सफलता शिक्षा और मेहनत के अद्भुत मिलन का परिणाम है.
आम के बागवानों के सामने सबसे बड़ी और पुरानी समस्या रही है 'अल्टरनेट बेयरिंग' यानी आम के पेड़ पर एक साल फल आना और दूसरे साल बाग का पूरी तरह खाली रह जाना. इस समस्या के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति डगमगा जाती थी और उन्हें हर दूसरे साल घाटे का सामना करना पड़ता था. अवनीश ने इस समस्या को एक चुनौती के रूप में लिया. उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा विकसित आम की आधुनिक और संकर किस्मों का गहराई से अध्ययन किया.
उन्होंने अपने बाग में पूसा अरुणिमा, पूसा लालिमा, पूसा प्रतिभा, पूसा श्रेष्ठ, पूसा पीतांबर और पूसा सूर्या जैसी उन्नत किस्में लगाईं. इन किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये हर साल फल देने की क्षमता रखती हैं. अवनीश ने केवल पौधे नहीं लगाए, बल्कि विभिन्न किस्मों के बीच ऐसे 'परम्यूटेशन और कॉम्बिनेशन' तैयार किए, जिससे परागण की प्रक्रिया बेहतर हुई और फसल की पैदावार में निरंतरता सुनिश्चित हुई.
पारंपरिक आमों के मुकाबले अवनीश जी द्वारा उगाए जा रहे आईएआरआई (IARI) के ये हाइब्रिड आम दिखने में बेहद खूबसूरत और रंगीन हैं. लाल, सुनहरे और बैंगनी रंग की आभा वाले ये आम बाजार में देखते ही ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं. इन आमों की केवल सुंदरता ही इनकी खूबी नहीं है, बल्कि इनका स्वाद और गुणवत्ता भी बेमिसाल है.
अवनीश जी ने महसूस किया कि आज का ग्राहक केवल स्वाद ही नहीं, बल्कि फल की दिखावट और शुद्धता भी चाहता है. उनके बाग के आमों की 'शेल्फ-लाइफ' यानी रखे रहने की क्षमता पारंपरिक आमों से कहीं अधिक है. इसका मतलब यह है कि फल टूटने के कई दिनों बाद तक भी ताजा बने रहते हैं, जिससे दूर-दराज के बाजारों और विदेशों में निर्यात करना आसान हो गया है. इस नवाचार ने आम को केवल एक मौसमी फल से ऊपर उठाकर एक प्रीमियम ब्रांड बना दिया है, जिसकी मांग अब साल भर बनी रहती है.
अवनीश त्यागी के इस नवाचार ने किसानों की आय के गणित को पूरी तरह से बदल दिया है. जहां सामान्य आम की कीमतें बाजार में बहुत कम मिलती हैं, वहीं उनके द्वारा तैयार किए गए रंगीन और उच्च गुणवत्ता वाले आम 150 से 200 रुपये किलो तक के ऊंचे दाम पर बिकते हैं. यह आमदनी सामान्य खेती के मुकाबले कई गुना अधिक है.
इस सफलता ने न केवल अवनीश त्यागी के परिवार को आर्थिक मजबूती दी, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में 'क्लस्टर फार्मिंग' (समूह खेती) के लिए एक नया रास्ता खोला है. आज उनके बाग को देखने के लिए दूर-दूर से किसान और कृषि वैज्ञानिक आते हैं, क्योंकि उन्होंने दिखा दिया है कि कम लागत और सही किस्मों के चुनाव से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सूरत बदली जा सकती है.