
आधुनिक जीवनशैली और बढ़ते शहरीकरण के बीच, महाराष्ट्र के बीड जिले के अंबाजोगाई शहर से एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है. दरअसल, स्वामी रामानंद तीर्थ महाविद्यालय के सहायक प्रोफेसर डॉ. राम बडे ने अपने घर की छत (टेरेस) पर खेती का सफल प्रयोग कर समाज के सामने एक नई मिसाल पेश की है. एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले डॉ. बडे ने अपने खेती के ज्ञान को आधुनिक तकनीक से जोड़कर घर की छत पर ही ताजी और जैविक सब्जियां उगाई हैं. उन्होंने साल 2023 में अपने घर के निर्माण के समय ही 'टेरेस गार्डन' की योजना बना ली थी. छत को नमी या लीकेज से बचाने के लिए उन्होंने विशेष सावधानी बरतते हुए प्लास्टिक की दो परतों के ऊपर ईंटों की डेढ़ फीट ऊंची क्यारियां (वाफे) तैयार कीं.
डॉ. बडे के इस प्रयोग की सबसे खास बात यह है कि उन्होंने क्यारियों को भरने के लिए घर की नींव खुदाई के दौरान निकली काली मिट्टी का ही उपयोग किया. साथ ही पानी के संरक्षण के लिए उन्होंने छत की टंकी में एक अलग वॉल्व लगाकर पाइप के जरिए फव्वारा सिंचाई (Sprinkler system) की व्यवस्था की है. इससे पौधों को जरूरत के अनुसार पानी मिलता है और पानी की बर्बादी भी नहीं होती.
वर्तमान में इस बाग से उनके परिवार को दैनिक आहार के लिए लगभग सभी जरूरी सब्जियां मिल रही हैं. उनके बगीचे में मुख्य रूप से फल सब्जियां जैसे, बैंगन, टमाटर, हरी मिर्च, खीरा, कद्दू. पत्तेदार सब्जियों में पालक, धनिया, मेथी, मूली, गाजर, चुकंदर, पत्ता गोभी और फूलगोभी उगाते हैं. डॉ. बडे बताते हैं कि इससे न केवल पैसों की बचत हो रही है, बल्कि बाजार में मिलने वाली रसायनों से युक्त सब्जियों के बजाय अब उनके परिवार को 'विषमुक्त' और शुद्ध सब्जियां मिल रही हैं.
उन्होंने बताया कि मैं मूल रूप से किसान हूं, इसलिए मिट्टी से लगाव हमेशा रहा है. घर बनवाते समय ही मैंने सब्जियों के मामले में आत्मनिर्भर होने का विचार किया था. आज बाजार की केमिकल युक्त सब्जियों के बजाय घर की ताजी और जैविक सब्जियां खाते वक्त जो संतुष्टि मिलती है, वह अनमोल है. डॉ. बडे का यह प्रयास उन शहरी नागरिकों के लिए एक बड़ा सबक है, जो जगह की कमी का बहाना बनाकर बागवानी से कतराते हैं. उपलब्ध संसाधनों में अपनी जरूरत की सब्जियां कैसे उगाई जा सकती हैं, इसका यह एक बेहतरीन उदाहरण है.