
आज के बदलते दौर में जब पढ़ी-लिखी महिलाएं अपने ज्ञान और हुनर का इस्तेमाल खेती-किसानी और उससे जुड़े क्षेत्रों में कर रही हैं, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर बदल रही है. अब महिलाएं केवल पारंपरिक खेती या घर के कामों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे वैज्ञानिक सोच और नए 'इनोवेशन' के जरिए खेती को एक मुनाफे वाला व्यवसाय बना रही हैं. इसी की एक शानदार मिसाल हैं असम के नगांव जिले की रहने वाली गार्गी गीतम बोराह.
एम.एससी तक शिक्षित गार्गी एक बेहद समझदार महिला हैं, जिन्होंने अपनी शिक्षा और 6 वर्षों के लंबे अनुभव का उपयोग करके स्थानीय संसाधनों का सही मूल्यवर्धन किया है. उन्होंने समाज में कुपोषण जैसी बड़ी समस्या का समाधान खोजने के लिए मछलियों से एक ऐसा खास उत्पाद तैयार किया है, जिसके बारे में पहले किसी ने सोचा भी नहीं होगा. उन्होंने छोटी मछलियों के बेहतरीन पोषण को चॉकलेट के मीठे स्वाद के साथ मिलाकर 'फिश चॉकलेट' का आविष्कार किया है. उनका यह अनूठा प्रयोग स्वास्थ्य और स्वरोजगार दोनों के लिहाज बेहद उपयोगी है.
गार्गी गीतम बोराह द्वारा विकसित यह 'फिश चॉकलेट' स्वाद और सेहत का एक अनोखा मेल है. इस नवाचार में पौष्टिक छोटी मछलियों को सावधानीपूर्वक साफ करके, सुखाकर या पकाकर उनका एक महीन पेस्ट तैयार किया जाता है. इसके बाद, इस पेस्ट को उच्च गुणवत्ता वाली तरल चॉकलेट के साथ मिलाया जाता है. इस मिश्रण को आकर्षक सांचों में ढालकर ठोस बनाया जाता है और फिर रंगीन चमकीले कागजों में लपेटा जाता है.
यह उत्पाद उन लोगों के लिए वरदान है जो मछली खाना पसंद नहीं करते या जिन्हें इसके कांटों से डर लगता है, क्योंकि इसमें मछली की गंध नहीं आती बल्कि केवल चॉकलेट का मीठा स्वाद और मछली का प्रोटीन मिलता है.
गार्गी का कहना है कि मछली वाली चॉकलेट का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर है, जो हमारे देश में बच्चों और महिलाओं में कुपोषण जैसी बड़ी समस्या को दूर करने का एक स्वादिष्ट जरिया बन सकती है. इसके फायदों की बात करें तो यह छोटी देशी मछलियों के गुणों और स्वाद के लिए जानी जाती है, जिससे शरीर को जरूरी पोषण मिलता है. यह बच्चों के लिए भी पूरी तरह फायदेमंद है क्योंकि उनकी खाने की आदतों को बदले बिना उन्हें जरूरी विटामिन और मिनरल्स देने का यह सबसे आसान तरीका है.
साथ ही, यह नवाचार उन छोटी मछलियों के इस्तेमाल को बढ़ावा देता है जो अक्सर बाजार में कम कीमत पर बिकती हैं या बेकार हो जाती हैं, लेकिन इस फिश प्रोसेसिंग की तकनीक से अब मछलियों का चाकलेट बनाकर लोगों को पोषण दिया जा सकता है.
गार्गी गीतम बोराह का कहना है आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो 'फिश चॉकलेट' का भविष्य बहुत उज्ज्वल है. 1 किलोग्राम मछली वाली चॉकलेट बनाने की लागत लगभग 400 रुपये आती है, जो इसके गुणों को देखते हुए काफी किफायती है. इसे न केवल स्थानीय बाजारों में बल्कि शहरी क्षेत्रों और अंतरराष्ट्रीय निर्यात बाजारों में भी 'हेल्थ सप्लीमेंट' के रूप में बेचा जा सकता है.
यह नवाचार मत्स्य पालन क्षेत्र में 'वैल्यू एडिशन' का एक बेहतरीन उदाहरण है. इससे न केवल बनाने वाले को मुनाफा होता है, बल्कि मछली पालने वाले को भी उनकी उपज का बेहतर दाम मिलता है. यह उत्पाद उन राज्यों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद है जहां मछली का उत्पादन अधिक होता है.
गार्गी के इस सफल प्रयोग को बड़े स्तर पर ले जाने की जरूरत है. विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, केरल, ओडिशा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां मछलियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं. वहां इस तकनीक का प्रशिक्षण देकर महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को सशक्त बनाया जा सकता है. हालांकि, इसे बड़े बाजार में उतारने से पहले इसका वैज्ञानिक परीक्षण और पोषक तत्वों का सटीक विश्लेषण करना जरूरी है. अगर सरकार और संस्थाएं मिलकर गार्गी जैसी महिला उद्यमियों को प्रोत्साहित करें, तो कृषि क्षेत्र की पूरी तस्वीर बदल सकती है.