जलवायु-अनुकूल खेती की नई राह: डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) पर निवेश क्यों है जरूरी

जलवायु-अनुकूल खेती की नई राह: डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) पर निवेश क्यों है जरूरी

डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) पर IRRI के अध्ययन से पता चला है कि यह तकनीक कम पानी, कम लागत और बेहतर पैदावार के साथ जलवायु-अनुकूल खेती का मजबूत विकल्प है. नई उन्नत किस्में किसानों की आय बढ़ाने, पर्यावरण संरक्षण और भारत की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने में मदद करेंगी.

DSR तकनीक से धान की रोपाईDSR तकनीक से धान की रोपाई
क‍िसान तक
  • Noida,
  • Feb 05, 2026,
  • Updated Feb 05, 2026, 10:30 AM IST

भारत में चावल बहुत बड़े पैमाने पर उगाया जाता है. यह हमारे खाने का अहम हिस्सा है. लेकिन आज चावल की खेती के सामने कई समस्याएं हैं. पानी की कमी हो रही है, खेतों में काम करने वाले मजदूर महंगे हो गए हैं और मौसम भी बदल रहा है. ज्यादा बारिश, कभी सूखा-इन सबका असर खेती पर पड़ता है. ऐसे में वैज्ञानिक नई और आसान खेती की तकनीक खोज रहे हैं.

क्या है डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR)?

डायरेक्ट सीडेड राइस यानी ऐसी खेती जिसमें चावल के बीज सीधे खेत में बोए जाते हैं. आमतौर पर किसान पहले पौधे तैयार करते हैं और फिर उन्हें पानी से भरे खेत में रोपते हैं. इसे पारंपरिक खेती कहते हैं. इसमें बहुत पानी और मेहनत लगती है. DSR में बीज सीधे बो दिए जाते हैं, जैसे गेहूं की खेती होती है. इससे पानी कम लगता है और मजदूरों की जरूरत भी कम होती है.

IRRI का नया अध्ययन क्या कहता है?

अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (IRRI) ने भारत के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर एक अध्ययन किया है. इस अध्ययन में बताया गया है कि अगर DSR पर सही तरीके से निवेश किया जाए, तो यह खेती को ज्यादा मजबूत और सुरक्षित बना सकता है. इस शोध को भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) का भी सहयोग मिला है.

नई किस्मों पर ध्यान

वैज्ञानिकों ने ऐसी चावल की किस्मों पर काम किया है जो सीधे बोने पर भी अच्छे से उगें. ये किस्में जल्दी बढ़ती हैं, बीमारियों से लड़ सकती हैं और अच्छी पैदावार देती हैं. खेतों में किए गए प्रयोगों में देखा गया कि ये नई किस्में DSR तरीके से उगाने पर करीब 15 प्रतिशत ज्यादा चावल देती हैं. अच्छी बात यह है कि ये पारंपरिक तरीके में भी अच्छा काम करती हैं.

किसानों को कैसे होगा फायदा?

किसानों को वही किस्में पसंद होती हैं जिन पर वे भरोसा करते हैं. वैज्ञानिकों ने उन्हीं पुरानी और लोकप्रिय किस्मों को बेहतर बनाया है. इससे किसान बिना डर के DSR अपना सकते हैं. DSR से पानी कम खर्च होगा, मजदूरी कम लगेगी और मुनाफा बढ़ेगा. इससे किसानों की आमदनी भी बेहतर होगी.

पर्यावरण और जलवायु के लिए अच्छा

DSR अपनाने से खेतों में कम पानी लगेगा. इससे भूजल बचेगा. साथ ही चावल की खेती से निकलने वाली गैसें भी कम होंगी. यह जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करेगा. भारत ने दुनिया से जो जलवायु से जुड़े वादे किए हैं, उन्हें पूरा करने में भी DSR सहायक होगा.

भविष्य की खेती की ओर कदम

वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में चावल की खेती भी गेहूं जैसी हो जाएगी. यानी कम पानी में, सीधे बीज बोकर खेती होगी. कुछ नई किस्में अब सरकारी जांच के अंतिम दौर में हैं और जल्द ही किसानों तक पहुंच सकती हैं.

डायरेक्ट सीडेड राइस पर निवेश करना सिर्फ खेती का फैसला नहीं है, बल्कि देश के भविष्य का फैसला है. इससे किसान खुशहाल होंगे, पानी बचेगा और पर्यावरण सुरक्षित रहेगा. बदलते मौसम में यह तकनीक भारत की खेती को मजबूत बना सकती है.

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