
दुनिया भर में धान की खेती ज्यादातर गीली मिट्टी में पौधे (सीडलिंग आनी बिजड़ा) लगाकर की जाती है. दुनिया के कई हिस्सों में किसान अलग-अलग तरह के धान ट्रांसप्लांटर का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनके लिए 'मैट-टाइप' सीडलिंग की जरूरत होती है. मशीन को चलाने में मुश्किल, इसकी ज्यादा कीमत, मैट-टाइप सीडलिंग उगाने की जरूरत और अलग-अलग तरह की मिट्टी और खेतों में मशीन की अलग-अलग क्षमता की वजह से भारत में ट्रांसप्लांटर को अपनाने की रफ्तार बहुत धीमी है.
बेहतर किस्मों और असरदार खरपतवारनाशकों (weedicides) के विकास के साथ 'डायरेक्ट सीडेड पैडी' (DSP) या सीधे बीज बोकर धान की खेती तेजी पकड़ रही है. आजकल, किसान धीरे-धीरे DSR (डायरेक्ट सीडेड राइस) तकनीक अपना रहे हैं और अच्छी तरह तैयार की गई मिट्टी में धान के सूखे बीज बिखेर रहे हैं. जुताई के औजारों से बीज बिखेरने पर बीज मिट्टी में अलग-अलग गहराई और बेतरतीब ढंग से फैल जाते हैं, जिससे बीज ठीक से अंकुरित नहीं हो पाते और फसल भी अच्छी तरह नहीं जम पाती.
'राइस-व्हीट सीडर' मशीन बीज की मात्रा को नियंत्रित कर सकती है और बीजों को मिट्टी में सही गहराई पर बो सकती है, साथ ही कतार में पौधों के बीच 8-15 cm की सही दूरी भी बनाए रखती है. मशीन की यह खूबी किसानों को 20 cm की दूरी पर बनी कतारों में धान उगाने में मदद करती है, जिससे उन्हें दो कतारों के बीच खरपतवार हटाने के लिए मैकेनिकल औजारों का इस्तेमाल करने का मौका मिलता है.
'राइस-व्हीट सीडर' मशीन को डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, पूसा के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है और इसे M/s बिहार मां दुर्गा एग्रो इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड, पंडौल, जिला मधुबनी, बिहार द्वारा बनाया जा रहा है.
लागत तुलना के आंकड़ों के अनुसार, राइस-व्हीट सीडर के माध्यम से प्रत्यक्ष बुवाई (डीएसआर) पद्धति अपनाने पर किसानों को परंपरागत रोपाई विधि की तुलना में प्रति हेक्टेयर 10,450 रुपये तक की शुद्ध बचत हो सकती है.
रोपाई पद्धति में पौध तैयार करने पर लगभग 1,200 रुपये, पडलिंग (कीचड़ तैयार करने) पर 3,750 रुपये और रोपाई काम पर 6,000 रुपये प्रति हेक्टेयर का अतिरिक्त खर्च आता है, जबकि डीएसआर तकनीक में इन कार्यों की जरूरत नहीं पड़ती. इसके अलावा सिंचाई मद में भी लगभग 2,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की बचत होती है.
हालांकि डीएसआर में मशीन चलाने पर करीब 1,700 रुपये प्रति हेक्टेयर और रासायनिक खरपतवार नियंत्रण पर 800 रुपये अतिरिक्त खर्च आता है, लेकिन कुल मिलाकर यह पद्धति किसानों के उत्पादन खर्च को आसानी से कम करती है.
राइस-व्हीट सीडर उपकरण का प्रदर्शन बिहार सहित कई राज्यों में कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके), राज्य सरकार के अधिकारियों और निर्माता कंपनियों द्वारा किया जा चुका है. यह उपकरण प्रतिष्ठित बीज कंपनी पायनियर सीड्स की प्रोत्साहन योजनाओं में भी शामिल रहा है. इस तकनीक के उपयोग से छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार के किसानों ने धान और गेहूं की लाइन बुवाई में बेहतर रिजल्ट हासिल किए हैं. विशेष रूप से गेहूं की फसल में पारंपरिक छिटकवां बुवाई (ब्रॉडकास्टिंग) की तुलना में अधिक उपज दर्ज की गई है.