खेती के साथ सौर ऊर्जा से कमाई का मौका, एग्रीवोल्टाइक पर सरकार का बड़ा प्लान

खेती के साथ सौर ऊर्जा से कमाई का मौका, एग्रीवोल्टाइक पर सरकार का बड़ा प्लान

एग्रीवोल्टाइक तकनीक से किसान एक ही खेत में फसल उगाने के साथ सौर बिजली भी बना सकेंगे. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने छोटे और सीमांत किसानों के हित में इस तकनीक को बढ़ावा देने पर जोर दिया. सरकार पीएम कुसुम योजना के अगले चरण में बड़ा अभियान शुरू करने की तैयारी कर रही है, जिससे किसानों की आय और ग्रामीण रोजगार बढ़ने की उम्मीद है.

छोटे किसानों के लिए बनेगी एग्रीवोल्टाइक नीतिछोटे किसानों के लिए बनेगी एग्रीवोल्टाइक नीति
क‍िसान तक
  • New Delhi,
  • Oct 21, 2026,
  • Updated Oct 21, 2026, 5:41 PM IST

देश के किसानों की आमदनी बढ़ाने और खेती के साथ बिजली बनाने के लिए सरकार एग्रीवोल्टाइक तकनीक को बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है. इस तकनीक में खेत के ऊपर सोलर पैनल लगाए जाते हैं और नीचे फसलों की खेती की जाती है. इससे किसान एक ही जमीन से अनाज भी पैदा कर सकते हैं और बिजली बनाकर अतिरिक्त कमाई भी कर सकते हैं. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में सातवें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन करते हुए इस तकनीक को किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने का एक नया रास्ता बताया.

क्या है एग्रीवोल्टाइक तकनीक?

एग्रीवोल्टाइक खेती का ऐसा तरीका है, जिसमें एक ही खेत में फसल उगाने और सौर ऊर्जा बनाने का काम एक साथ किया जाता है. खेत में जमीन से कुछ ऊंचाई पर सोलर पैनल लगाए जाते हैं. इन पैनलों से बिजली बनती है, जबकि नीचे उपलब्ध जगह पर किसान अपनी जरूरत के अनुसार फसल उगा सकते हैं. इस तकनीक से किसानों को खेती के साथ बिजली उत्पादन से भी कमाई का मौका मिल सकता है. अगर सही तरीके से सोलर पैनल लगाए जाएं, तो खेती की जमीन का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि, इसके लिए फसल, मिट्टी, मौसम और पैनलों की बनावट को ध्यान में रखना जरूरी है.

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि देश का किसान अब केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि ऊर्जादाता भी बन सकता है. यानी किसान खेत में अनाज उगाने के साथ बिजली बनाकर देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में भी मदद कर सकता है.

छोटे और सीमांत किसानों के लिए बनेगी नीति

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत में 85 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे और सीमांत किसान हैं. इनके पास खेती के लिए जमीन कम होती है. इसलिए एग्रीवोल्टाइक से जुड़ी नीति बनाते समय इन किसानों की जरूरतों का विशेष ध्यान रखना होगा. उन्होंने कहा कि ऐसा मॉडल तैयार किया जाना चाहिए, जिसे छोटे किसान भी आसानी से अपना सकें. किसानों को अपनी जमीन पर केवल सोलर पैनल लगाने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए. खेती का काम किसी भी कीमत पर प्रभावित नहीं होना चाहिए. केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सोलर पैनल लगाने से पहले उनकी ऊंचाई, खंभों के बीच की दूरी और खेत में मशीनों के आने-जाने की व्यवस्था पर ध्यान देना जरूरी है. इससे किसान ट्रैक्टर और दूसरे कृषि उपकरणों की मदद से खेती कर सकेंगे. साथ ही वे हर साल अपनी पसंद के अनुसार फसल और फसल चक्र भी बदल सकेंगे.

बारिश के पानी का भी होगा बेहतर इस्तेमाल

एग्रीवोल्टाइक परियोजनाओं में केवल सोलर पैनल लगाना ही काफी नहीं है. खेत में पानी की निकासी और बारिश के पानी को जमा करने की व्यवस्था भी जरूरी है. शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सोलर पैनलों से गिरने वाला बारिश का पानी खेत की मिट्टी को नुकसान न पहुंचाए, इसके लिए उचित इंतजाम होने चाहिए. पानी का सही इस्तेमाल किया जाए, ताकि किसानों को खेती में मदद मिले और मिट्टी का कटाव भी कम हो.

उन्होंने यह भी कहा कि किसानों को पैदा होने वाली बिजली की बिक्री और भुगतान में परेशानी नहीं होनी चाहिए. बिजली खरीदने वाली कंपनियों और बिजली ग्रिड तक पहुंच की व्यवस्था पारदर्शी होनी चाहिए. किसानों को उनकी बिजली का भुगतान समय पर मिलना भी जरूरी है.

गांवों में युवाओं और महिलाओं को मिलेगा रोजगार

एग्रीवोल्टाइक तकनीक से खेती के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं. सोलर पैनलों को चलाने, उनकी मरम्मत करने और रखरखाव के लिए प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होगी. शिवराज सिंह चौहान ने सुझाव दिया कि किसान उत्पादक संगठनों यानी एफपीओ को भी इस काम से जोड़ा जाए. गांव के युवाओं और महिलाओं को सोलर उपकरणों के संचालन और मरम्मत का प्रशिक्षण दिया जाए. इससे उन्हें अपने गांव में ही रोजगार मिल सकता है.

उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई कंपनी बीच में परियोजना छोड़ देती है या अनुबंध खत्म होने पर सोलर पैनल हटाने पड़ते हैं, तो उसका आर्थिक बोझ किसान पर नहीं पड़ना चाहिए. इसके लिए शुरुआत में ही जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए.

2050 तक बिजली की मांग पूरी करने में मदद कर सकती है तकनीक

केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने सम्मेलन में कहा कि भारत की बिजली उत्पादन क्षमता में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. उनके मुताबिक, वर्ष 2014 से पहले देश की कुल बिजली क्षमता करीब 249 गीगावाट थी, जो अब 560 गीगावाट से अधिक हो गई है. इसमें गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों की स्थापित क्षमता 308 गीगावाट से ज्यादा हो चुकी है. प्रह्लाद जोशी ने टेरी के एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि भारत की कृषि भूमि का बड़ा हिस्सा एग्रीवोल्टाइक तकनीक के लिए उपयुक्त है. अध्ययन के अनुसार, देश की 11.6 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से 4.75 करोड़ हेक्टेयर जमीन इस तकनीक के लिए तकनीकी रूप से उपयुक्त बताई गई है. इसमें महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की बड़ी हिस्सेदारी है. उन्होंने कहा कि अगर इस उपयुक्त जमीन के केवल 10 प्रतिशत हिस्से पर भी एग्रीवोल्टाइक परियोजनाएं लगाई जाएं, तो वर्ष 2050 तक देश की अनुमानित बिजली मांग को पूरा करने में बड़ी मदद मिल सकती है.

उन्होंने यह भी बताया कि कुछ अध्ययनों में एग्रीवोल्टाइक व्यवस्था के तहत फसलों की पैदावार में 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है. हालांकि, इसका वास्तविक लाभ फसल, मौसम और खेती की तकनीक पर निर्भर करेगा.

पीएम कुसुम योजना के अगले चरण में बड़ा अभियान

प्रह्लाद जोशी ने कहा कि पीएम कुसुम योजना के तहत अब तक 30 लाख कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ने की जानकारी दी गई है. इससे किसानों को सिंचाई के लिए सौर बिजली का इस्तेमाल करने में मदद मिल रही है. उन्होंने घोषणा की कि सरकार पीएम कुसुम योजना के अगले चरण में बड़े स्तर पर एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी कर रही है. इस कार्यक्रम का उद्देश्य खेती और सौर ऊर्जा उत्पादन को एक साथ बढ़ावा देना है. उनके मुताबिक, इस क्षेत्र में करीब 3.32 लाख पूर्णकालिक स्थानीय रोजगार पैदा होने की संभावना है. इससे ग्रामीण युवाओं को काम के लिए बड़े शहरों की ओर जाने की जरूरत कम हो सकती है.

कृषि और ऊर्जा मंत्रालय मिलकर करेंगे काम

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि एग्रीवोल्टाइक तकनीक को सफल बनाने के लिए कृषि और ऊर्जा मंत्रालय मिलकर काम करेंगे. उन्होंने जोर दिया कि किसानों के हितों को सबसे ऊपर रखते हुए योजनाएं तैयार की जानी चाहिए. एग्रीवोल्टाइक तकनीक किसानों के लिए खेती और बिजली उत्पादन को जोड़ने का एक नया विकल्प बन सकती है. इससे जमीन का बेहतर इस्तेमाल, अतिरिक्त आय और गांवों में रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है. लेकिन इस तकनीक की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सोलर पैनल लगाने के बाद खेती कितनी आसान रहती है, किसानों को बिजली का उचित दाम मिलता है या नहीं और छोटे किसानों के लिए परियोजना कितनी किफायती साबित होती है.

ये भी पढ़ें: 

दिल्ली-एनसीआर में बढ़ा प्रदूषण, GRAP का पहला स्टेज लागू
महाराष्ट्र में चीनी उत्‍पादन 10 लाख टन तक घटने की आशंका, गन्‍ना बकाया भुगतान पर भी आया बड़ा अपडेट

MORE NEWS

Read more!