Drought-risk : जून में मानसून की सुस्ती और देशव्यापी सूखे की घंटी

Drought-risk : जून में मानसून की सुस्ती और देशव्यापी सूखे की घंटी

देश में 1 से 23 जून के बीच सामान्य से 42 कम बारिश हुई है,जिससे यूपी, बिहार और झारखंड सहित 17 राज्यों में खरीफ की फसलें ख़तरे में पड़ गई हैं। तापमान बढ़ने और बारिश न होने से फसलों पर नमी का तनाव बढ़ रहा है. इस भारी संकट को देखते हुए कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक हाई-लेवल इमरजेंसी मीटिंग बुलाकर प्रभावित 260 से अधिक जिलों के लिए फौरन 'कंटिनजेंसी प्लान' तैयार करने के निर्देश दिए हैं,दरअसल, प्रशांत महासागर में बन रहा 'सुपर एल-नीनो' लंबे सूखे और बेतहाशा गर्मी से ग्रामीण अर्थव्यवस्था, मवेशियों और फसलों को तबाह कर सकता है, जिससे आने वाले दिनों में अनाज की किल्लत और भारी महंगाई की दोहरी मार पड़ना तय है.

सूखे की आहटसूखे की आहट
जेपी स‍िंह
  • नई दिल्ली,
  • Jun 24, 2026,
  • Updated Jun 24, 2026, 12:41 PM IST

मौसम विभाग (IMD) के ताज़ा आंकड़े किसानों के लिए एक गहरी फिक्र लेकर आए हैं. 1 से 23 जून के बीच पूरे देश में आम दिनों के मुकाबले 42 फीसदी कम बारिश हुई है. इस वक़्त देश का एक बड़ा हिस्सा मॉनसून की बेरुखी झेल रहा है. हालात ये हैं कि 17 राज्यों यानि देश का 50 फीसदी हिस्सा में कम बारिश हुई है, जबकि 9 राज्यों 24 फीसदी हिस्सा में तो सूखे जैसे हालात बन गए हैं.यूपी 47फीसदी  बिहार 44 फीसदी और झारखंड 65 फीसद कम बारिश से हालत लगातार नाज़ुक हो रही है, जिससे खरीफ की फसल खतरे में है. 

विशेषज्ञो का कहना है कि पिछले 30 सालों में 0.7 से 1.0 सेंटीग्रेड तक तापमान बढ़ा है.पारा चढ़ने से पौधों को ज्यादा पानी चाहिए होता है, और बारिश न होने से फसलों पर 'नमी का तनाव'  बढ़ रहा है. इससे पैदावार पर सीधा और बुरा असर पड़ना तय है.कृषि कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, तापमान में हर 1°सेंटीग्रेड की बढ़ोतरी होने से पौधों को 5 से 10 प्रतिशत तक ज़्यादा पानी की ज़रूरत पड़ सकती है. कम बारिश और बेतहाशा बढ़ती गर्मी का यह दोहरा सितम फसलों में 'नमी के तनाव'  को और ज़्यादा बढ़ा देता है. इस मुश्किल सूरत में सीधा और बुरा असर  पूरी पैदावार पर पड़ता है. 

झुलसते मानसून के बीच सरकार का प्लान 

बारिश की इस भारी कमी को देखते हुए कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक हाई-लेवल इमरजेंसी मीटिंग बुलाई है. इस बैठक में प्रभावित इलाकों के लिए फौरन एक 'कंटिनजेंसी प्लान' तैयार करने का हुक्म दिया गया है. मौसम और कृषि महकमे के अंदाज़े के मुताबिक़, इस बार देश के तक़रीबन 260 से ज़्यादा ज़िलों में बारिश बेहद कम होने का अंदेशा है.सरकार ने साफ़ कर दिया है कि इन संकट वाले ज़िलों में सिंचाई के लिए दूसरे विकल्पों का इंतज़ाम किया जाए.सभी राज्य सरकारों को हिदायत दी गई है कि वे बीजों और सब्सिडी वाले फर्टिलाइज़र का रिज़र्व स्टॉक तैयार रखें. मकसद ये है कि अगर बारिश की कमी से मुख्य फसल बर्बाद हो जाए, तो किसान बिना वक़्त बर्बाद किए कम दिनों में तैयार होने वाली दूसरी फसलें बो सकें.

रूठा  मौसम, किसानों पर बढ़ती आफत 

प्रशांत महासागर में बन रहे 'सुपर एल-नीनो' के हालात हमारी किसानी का पूरा ताना-बाना बिगाड़ने की ताक़त रखते हैं.इसकी वजह से सिर्फ मॉनसून ही कमज़ोर नहीं पड़ रहा, बल्कि लंबे सूखे और बेतहाशा गर्मी जैसी मुसीबतें भी सामने आ रही हैं.मौसम के इस मिज़ाज का सीधा असर हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आम ज़िंदगी पर पड़ेगा.पानी के सोर्सेज़ सूखने से पीने के पानी की किल्लत बढ़ेगीऔर चारे की कमी से मवेशियों की सेहत पर भी बुरा असर पड़ेगा. ज़ाहिर सी बात है कि जब धान और मक्के जैसी मुख्य फसलों की पैदावार गिरेगी, तो बाज़ार में अनाज की किल्लत होगी.इस पूरी सूरत-ए-हाल का नतीजा यह होगा कि आने वाले महीनों में महंगाई की ज़बरदस्त मार आम इंसान की जेब पर पड़ेगी.

संकट के दौर में सबसे बड़ा सहारा

ऐसे मुश्किल और चुनौतीपूर्ण हालात में, खेती के तरीकों में बदलाव लाना महज़ एक विकल्प नहीं, बल्कि बर्बादी से बचने का सबसे मज़बूत हथियार बन गया है. कम पानी और सूखे के इस माहौल में, किसानों को ऐसी फसलें चुननी चाहिए जो जल्दी तैयार हो जाएं और सूखा बर्दाश्त कर सकें. कम अवधि वाली धान, मक्का, अरहर, मूंग और उड़द जैसी फसलों की कम दिनों वाली किस्मों को लगाकर हम फसल को तब भी सुरक्षित बचा सकते हैं, इसके अलावा, बुवाई करने में बिल्कुल भी जल्दबाज़ी न करें,जब तक कम से कम 75 से 100 मिलीमीटर अच्छी बारिश न हो जाए और मिट्टी में सही नमी न बन जाए, तब तक खेतों में बीज न डालें.

इसके आलावा  किसान अपनी पूरी क़िस्मत सिर्फ़ धान पारंपरिक फसलों के भरोसे न छोड़ें. इसके बजाय,वे अपने खेतों में  बागवानी, पशुपालन, मछली पालन और मशरूम उगाने जैसे अलग-अलग काम शुरू करें. सोचिए ,अगर अल-नीनो की वजह से पानी की कमी हुई और धान सूख गया, तो डेयरी, बकरी पालन या कम पानी वाली सब्ज़ियां किसान को रोज़ाना की नकद आमदनी देती रहेंगी.इससे कम से कम किसान के घर-परिवार पर भुखमरी की नौबत नहीं आएगी और उसका गुज़ारा अच्छे से चलता रहेगा.

खाद का स्मार्ट इस्तेमाल, खरपतवार से जंग!

कम पानी और सूखे जैसी आफ़त में पुरानी तरीके से खाद डालना नुकसानदेह हो सकता है. बिना नमी के ज़्यादा यूरिया या डीएपी डालने से फसल जल सकती है. इसलिए, इस नाज़ुक वक़्त में किसानों को 'स्मार्ट तरीके' आज़माने होंगे कृषि वैज्ञानिको की राय है कि खेत की नमी बचाने के लिए वर्मीकंपोस्ट जैसी जैविक खाद बेहतरीन विकल्प है.वहीं,सूखे में खरपतवार फसल के हिस्से का पानी पी जाते हैं.इसलिए वक़्त पर निराई-गुड़ाई और सही दवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए.अगर जुलाई तक बारिश न हो, तो किसानों को लंबे वक़्त वाले धान के बजाय मक्का, मूंग, उड़द, रागी या बाजरा जैसी कम पानी और कम समय वाली फसलें लगानी चाहिए। खेत में नमी रोकने के लिए मल्चिंग तकनीक का इस्तेमाल भी बेहद कारगर साबित होता है.

 


 

MORE NEWS

Read more!