
बिहार का मशहूर मगही पान अब सिर्फ अपनी मिठास और स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि किसानों की बढ़ती आमदनी के लिए भी चर्चा में है. वर्षों से मगध क्षेत्र के किसान इसकी खेती करते आ रहे हैं, लेकिन अब GI (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग मिलने के बाद इसकी पहचान देशभर में और मजबूत हुई है.
मगही पान को 28 मार्च 2018 को GI टैग मिला था. हालांकि शुरुआत में किसानों को यह जानकारी नहीं थी कि इस टैग का फायदा कैसे उठाया जाए. बाद में जागरुकता अभियान चलाकर किसानों को GI के बारे में जानकारी दी गई और उन्हें अधिकृत उपयोगकर्ता (Authorized User) के रूप में रजिस्ट्रेशन कराने के लिए प्रेरित किया गया.
बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर और ICAR के सहयोग से किसानों को GI टैग के फायदे समझाए गए. इसके चलते नवादा और नालंदा जिले के 1001 किसानों ने GI अधिकृत उपयोगकर्ता के रूप में रजिस्ट्रेशन कराया.
इससे किसानों को अपने उत्पाद की अलग पहचान बनाने, सामूहिक ब्रांडिंग करने और बेहतर बाजार तक पहुंचने का मौका मिला.
मगही पान मुख्य रूप से औरंगाबाद, गया, नवादा और नालंदा जिलों में उगाया जाता है. इसकी खासियतें इसे दूसरे पानों से अलग बनाती हैं.
इन्हीं गुणों की वजह से मगही पान की देशभर में अलग पहचान है.
मगही पान उत्पादकों को एक मंच पर लाने के लिए नवादा जिले के हिसुआ क्षेत्र में 'रेणु एंड राजेंद्र मगही पान प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड' का गठन किया गया. यह किसान उत्पादक कंपनी (FPC) सितंबर 2023 में रजिस्टर हुई.
इस कंपनी के जरिए किसान उत्पादन, पैकिंग, ब्रांडिंग, मार्केटिंग और मूल्यवर्धन के काम सामूहिक रूप से कर रहे हैं. इससे उनकी बाजार में ताकत बढ़ी है.
बिहार सरकार भी मगही पान की खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है. विशेष बागवानी फसल योजना और पान विकास योजना के तहत किसानों को सहायता दी जा रही है.
सरकार ने 2023-24 और 2024-25 के लिए करीब 491.38 लाख रुपये का प्रावधान किया है. वहीं 2025-26 में कई जिलों में पान की खेती बढ़ाने के लिए किसानों और FPC को मदद दी जा रही है.
इन प्रयासों का असर अब बाजार में दिखाई देने लगा है. पहले वाराणसी और गया जैसे बाजारों में मगही पान का भाव 120 से 140 रुपये प्रति ढोली (200 पत्ते) मिलता था. अब यही कीमत बढ़कर 280 से 300 रुपये प्रति ढोली तक पहुंच गई है.
हालांकि बाजार भाव कई कारकों पर निर्भर करते हैं, लेकिन किसानों का कहना है कि GI पहचान, सामूहिक ब्रांडिंग और बेहतर मार्केटिंग से उन्हें लाभ मिलने लगा है.
मगही पान की कहानी बताती है कि सिर्फ GI टैग मिलना ही काफी नहीं होता, बल्कि किसानों की जागरुकता, संगठन और मार्केटिंग भी जरूरी होती है. आज GI रजिस्ट्रेशन, किसान उत्पादक कंपनी (FPC) और सरकारी सहयोग की मदद से मगही पान उत्पादक किसान अपनी पहचान मजबूत कर रहे हैं और बेहतर दाम पाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.
कुल मिलाकर, मगही पान अब सिर्फ एक पारंपरिक फसल नहीं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने और स्थानीय उत्पाद को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का सफल उदाहरण बनता जा रहा है.