अल नीनो होगा और मजबूत, भारत में बढ़ सकती है गर्मीदुनिया भर में बढ़ते वैश्विक तापमान के बीच अब भारत के लिए एक और बड़ी जलवायु चुनौती सामने आ सकती है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने अनुमान जताया है कि आने वाले महीनों में 'अल नीनो' और मजबूत हो सकता है. इसके चलते नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के दौरान भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में मौसम के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल सकता है.
WMO की ग्लोबल सीजनल क्लाइमेट अपडेट रिपोर्ट के अनुसार, प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान लगातार बढ़ रहा है. नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के दौरान नीनो 3.4 इंडेक्स सामान्य औसत से करीब 3.8 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच सकता है. कई जलवायु मॉडल यह संकेत दे रहे हैं कि अल नीनो दिसंबर के आसपास अपने चरम पर पहुंच सकता है.
रिपोर्ट में भारतीय उपमहाद्वीप को उन क्षेत्रों में शामिल किया गया है जहां अगले कुछ महीनों के दौरान सामान्य से अधिक तापमान रहने की संभावना है. इसका असर सर्दियों के मौसम पर पड़ सकता है. यदि तापमान सामान्य से ज्यादा रहता है तो रबी फसलों की वृद्धि, मिट्टी की नमी और सिंचाई की जरूरतों पर असर पड़ सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि तापमान बढ़ने से गेहूं, सरसों, चना और अन्य रबी फसलों के बढ़वार में बदलाव आ सकता है. हालांकि रिपोर्ट में भारत के किसी विशेष राज्य या क्षेत्र के लिए अलग से तापमान का अनुमान नहीं दिया गया है.
सर्दियों में यदि तापमान अधिक रहता है तो किसानों को फसल प्रबंधन में अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ सकती है. मिट्टी में नमी तेजी से कम हो सकती है और सिंचाई की जरूरत बढ़ सकती है. कृषि विशेषज्ञों का सुझाव है कि किसान समय-समय पर मौसम विभाग की सलाह पर नजर रखें और उसी के अनुसार खेती संबंधी निर्णय लें.
विशेष रूप से उत्तर भारत के गेहूं उत्पादक क्षेत्रों और मध्य भारत के दलहन और तिलहन उत्पादक इलाकों में मौसम की स्थिति पर लगातार निगरानी जरूरी होगी.
WMO ने अल नीनो के मजबूत होने का संकेत तो दिया है, लेकिन भारत में नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच बारिश कैसी रहेगी, इस बारे में कोई स्पष्ट राष्ट्रीय पूर्वानुमान नहीं दिया गया है. रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि देश में बारिश सामान्य से कम होगी, सामान्य रहेगी या अधिक होगी.
आमतौर पर अल नीनो का संबंध भारत में मॉनसून की कमजोरी से जोड़ा जाता है, लेकिन हर बार इसका असर एक जैसा नहीं होता. मौसम और समुद्री परिस्थितियों के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों पर प्रभाव अलग-अलग हो सकता है. इसलिए केवल अल नीनो को देखकर सूखे या बारिश की कमी की भविष्यवाणी करना सही नहीं माना जा सकता.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जुलाई से सितंबर 2026 के दौरान मजबूत रहा पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) आने वाले महीनों में कमजोर होकर सामान्य स्थिति की ओर लौट सकता है. प्रशांत महासागर और हिंद महासागर दोनों में होने वाले तापमान बदलाव मिलकर क्षेत्रीय मौसम को प्रभावित करेंगे. यही वजह है कि विशेषज्ञ लगातार मौसम की निगरानी को जरूरी बता रहे हैं.
यदि सर्दियों में तापमान सामान्य से अधिक रहता है तो कई इलाकों में कूलिंग की जरूरत बढ़ सकती है. इससे बिजली की मांग में भी इजाफा हो सकता है. वहीं जलाशयों के प्रबंधन, सिंचाई योजनाओं और पेयजल उपलब्धता को लेकर भी अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ सकती है.
सरकारों और स्थानीय प्रशासन को फसल उत्पादन, जल संसाधनों और संवेदनशील आबादी पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को ध्यान में रखते हुए तैयारी करनी होगी.
WMO ने साफ किया है कि उसकी रिपोर्ट केवल वैश्विक स्तर का संकेत देती है. किसी देश या राज्य के लिए आधिकारिक मौसम पूर्वानुमान संबंधित राष्ट्रीय एजेंसियां ही जारी करती हैं. भारत में मौसम और जलवायु संबंधी आधिकारिक जानकारी का मुख्य स्रोत भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) है.
ऐसे में अल नीनो की बदलती स्थिति का भारत के विभिन्न राज्यों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसे समझने के लिए IMD के आगामी पूर्वानुमान और सलाह बेहद महत्वपूर्ण होंगे.
फिलहाल WMO का यह अनुमान संकेत देता है कि भारत को आने वाले महीनों में सामान्य से अधिक तापमान का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि वास्तविक प्रभाव स्थानीय मौसम परिस्थितियों, बारिश के पैटर्न और क्षेत्रीय जलवायु बदलावों पर निर्भर करेगा. इसलिए किसानों, नीति निर्माताओं और आम लोगों के लिए मौसम संबंधी ताजा अपडेट पर नजर बनाए रखना जरूरी होगा.
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