ओडिशा में किसानों को सूखे की मार से बचाने की तैयारीओडिशा में सूखे से जूझती खेती को लेकर सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. राज्य ने खेती को पहले से सूखा-रोधी बनाने की दिशा में गुरुवार को ओडिशा कृषि सूखा शमन कार्यक्रम (Odisha Agriculture Drought Mitigation Programme- OADMP) की शुरुआत की गई, जिसे कृषि नीति में एक अहम मोड़ माना जा रहा है. यह कार्यक्रम राष्ट्रीय सूखा शमन परियोजना (NDMP) के तहत लागू किया गया है, जिसके लिए 141.50 करोड़ रुपये की राशि तय की गई है. इस कार्यक्रम का उद्येश्य बार-बार होने वाले नुकसान की भरपाई करने के बजाय खेती की बुनियाद मजबूत करना है, जिससे सूखे का असर अपने आप कम होगा.
कृषि ओडिशा 2026 के उद्घाटन सत्र में इस योजना को औपचारिक रूप से लॉन्च किया गया. कृषि और किसान सशक्तिकरण विभाग और आपदा प्रबंधन से जुड़ी एजेंसियों के बीच समझौते हुए, जिसमें कहा गया कि यह सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से चलने वाला दीर्घकालिक कार्यक्रम होगा. इसमें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की कृषि अनुसंधान संस्थाओं को जोड़ा गया है, ताकि फैसले फील्ड डेटा और शोध के आधार पर लिए जा सकें.
OADMP बाकी योजनाओं से काफी है, क्योंकि इसका काम करने का तरीका यूनिक है. जैसा कि अब तक सूखे से निपटने के लिए अलग-अलग योजनाओं के जरिए बिखरे हुए उपाय किए जाते थे, लेकिन इस कार्यक्रम में पूरे गांव या गांवों के समूह को एक यूनिट मानकर हस्तक्षेप किए जाएंगे. इसमें पानी, मिट्टी और फसल प्रबंधन को एक साथ जोड़ने की रणनीति अपनाई गई है, जिससे एक क्षेत्र में किया गया सुधार दूसरे क्षेत्र को भी मजबूती दे सके.
पहले चरण में इस योजना को ओडिशा के तीन सबसे ज्यादा सूखा प्रभावित ब्लॉकों में लागू किया जा रहा है. नुआपड़ा के कोमना, नबरंगपुर के कोसागुमुडा और मयूरभंज के ररुआन इस प्रयोग के केंद्र होंगे. इन इलाकों में करीब 24 हजार किसान परिवार सीधे तौर पर योजना से जुड़ेंगे. सरकार को उम्मीद है कि राज्य और केंद्र की मौजूदा योजनाओं के साथ तालमेल के जरिए इसका असर और बड़े इलाके तक पहुंचेगा.
योजना के तहत सूखा सहन करने वाली बीज किस्मों को बढ़ावा दिया जाएगा और गांव स्तर पर जल संचयन और रिचार्ज सिस्टम विकसित किए जाएंगे. इसका मकसद यह है कि कम बारिश की स्थिति में भी फसल पूरी तरह बर्बाद न हो और खेती की निरंतरता बनी रहे.
इसके साथ ही स्व सहायता समूहों और किसान उत्पादक संगठनों को आधुनिक मशीनरी और बाजार से जोड़ने की कोशिश होगी, ताकि किसानों की आमदनी सिर्फ मौसम पर निर्भर न रहे. पूरे कार्यक्रम की निगरानी के लिए डिजिटल डैशबोर्ड तैयार किया जाएगा, जिसमें मिट्टी की नमी से लेकर किसानों की आय तक के आंकड़े दर्ज होंगे. इससे पारदर्शिता बनी रहेगी और जरूरत पड़ने पर रणनीति में तुरंत बदलाव संभव होगा.
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