महाराष्ट्र, ओडिशा, मेघालय और पुडुचेरी के किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी है. आपको बता दें कि इन राज्यों के किसान सिर्फ 1 रुपये में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में नामांकन कराकर अपनी फसलों की सुरक्षा कर सकते हैं. सभी किसान भाई-बहन 31 जुलाई 2024 तक अपनी खरीफ फसलों का बीमा करा सकते हैं. सरकार ने फसल बीमा के लिए 31 जुलाई तक की राशि बढ़ा दी है. आइए जानते हैं क्या है पूरी खबर.
भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है. यहां आज भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा खेती पर निर्भर है. लेकिन किसानों को फसल तैयार करने में काफी अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है. किसानों को इसी अनिश्चितता से बचाने के लिए सरकार ने फसल बीमा योजना शुरू की है. सबसे अच्छी बात यह है कि इस बीमा योजना में किसानों को कुल प्रीमियम का सिर्फ दो फीसदी ही देना होता है. इसमें सरकार प्रीमियम का 98.5 फीसदी तक का भुगतान करती है. इस साल प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू की गई है.
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केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने इस साल खरीफ फसल के लिए बीमा योजना शुरू कर दी है. हाल ही में कृषि मंत्रालय की ओर से बताया गया है कि फसल बीमा सप्ताह (1-7 जुलाई 2024) शुरू हो गया है. इसमें किसान भाई-बहनों से अनुरोध किया गया है कि वे PMFBY से जुड़कर अपनी आय सुरक्षित करें. इस योजना से जुड़ने से किसानों की फसलों को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा मिलती है.
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इस योजना के तहत फसलों को सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि, तूफान, भूस्खलन, चक्रवात, जलभराव, बिजली गिरने से आग लगने और बीमारियों जैसे अन्य अपरिहार्य जोखिमों के कारण होने वाले नुकसान की स्थिति में सुरक्षा प्रदान की जाती है. लेकिन यह सुरक्षा तभी दी जाती है जब किसी किसान ने अपनी फसल का बीमा कराया हो और ऊपर बताए गए कारणों से फसल नष्ट हो जाती है, तो उसे बीमा कंपनी से मुआवजा मिलेगा.
इस योजना के तहत फसल बीमा लेने वाले किसानों को सभी खरीफ फसलों के लिए केवल 2% और सभी रबी फसलों के लिए 1.5% का एक समान प्रीमियम देना होगा. वार्षिक वाणिज्यिक और बागवानी फसलों के मामले में, प्रीमियम केवल 5% होगा. बाकी का प्रीमियम का भुगतान सरकार द्वारा किया जाता है. इस योजना में सरकारी सब्सिडी की कोई ऊपरी सीमा नहीं है. भले ही बाकी प्रीमियम 90% हो, लेकिन इसे सरकार द्वारा वहन किया जाता है. ऐसे में महाराष्ट्र, ओडिशा, मेघालय और पुडुचेरी के किसानों की बात करें तो इन राज्यों के किसान मात्र 1 रुपये में बीमा करवा सकते हैं.
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