चीनी की कीमतों में तेज वृद्धि पर ISMA ने बयान जारी किया हैइंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (ISMA) ने कहा है कि देश में चीनी की उपलब्धता पर्याप्त है और बाजार में किसी प्रकार की कमी नहीं है. एसोसिएशन का अनुमान है कि अगले सात दिनों के भीतर चीनी की कीमतों में गिरावट शुरू हो जाएगी और मौजूदा बाजार चिंता कम होगी. ISMA के अध्यक्ष नीरज शिरगांवकर ने कहा कि चीनी की कीमतों में हालिया वृद्धि के लिए इथेनॉल प्रोग्राम को जिम्मेदार ठहराना गलत है. उन्होंने कहा कि देश में चीनी का स्टॉक आरामदायक स्तर पर है और सप्लाई को लेकर कोई संकट नहीं है.
उन्होंने बताया कि चीनी की कीमतों में करीब 16 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इसका कारण उत्पादन में बड़ी कमी नहीं है. कीमतों पर असर डालने वाले प्रमुख कारकों में मौसम की वजह से गन्ने की पैदावार में कमी, महाराष्ट्र में अधिक क्रशिंग रेट और उत्तर प्रदेश में गन्ने की किस्मों से जुड़ी चुनौतियां शामिल हैं.
ISMA के मुताबिक, त्योहारी सीजन की शुरुआत के साथ मांग बढ़ी है. इसके अलावा ब्राजील से वैश्विक आपूर्ति में सख्ती का भी असर बाजार पर पड़ा है. हालांकि कीमतों में तेजी का सबसे बड़ा कारण सट्टेबाजी और जमाखोरी रहा है.
शिरगांवकर ने कहा कि कई थोक खरीदारों ने बड़े पैमाने पर स्टॉक जमा करना शुरू कर दिया, जिससे बाजार में उपलब्ध चीनी की मात्रा अस्थायी रूप से कम दिखाई देने लगी और कृत्रिम कमी जैसी स्थिति बन गई.
ISMA ने भरोसा जताया कि बाजार में सप्लाई सामान्य होने और भावनात्मक दबाव कम होने के साथ कीमतों में नरमी आएगी. एसोसिएशन ने यह भी कहा कि अगले चीनी सीजन की शुरुआत में देश के पास करीब 35 लाख टन का शुरुआती चीनी स्टॉक उपलब्ध रहेगा, जो घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है.
नीरज शिरगांवकर ने कहा, "...2025-26 के लिए, कुल चीनी उत्पादन लगभग 279 लाख टन होने का अनुमान है, और क्लोजिंग स्टॉक लगभग 35 लाख टन रहने की उम्मीद है. यह सामान्य घरेलू मांग के मुकाबले एक अच्छा बफर है, भले ही हम उस चीनी को भी ध्यान में रखें जिसे इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. वहीं, रिटेल कीमतें जुलाई में लगभग 48 रुपये प्रति किलो से बढ़कर इस महीने लगभग 55-56 रुपये प्रति किलो हो गई हैं. यानी करीब 16% की बढ़ोतरी. यह बढ़ोतरी असल में चीनी की कमी की वजह से नहीं हुई है. यह कई वजहों के एक साथ मिलने का नतीजा है, न कि किसी एक कारण का."
उन्होंने आगे कहा, इस सीजन में घरेलू उत्पादन शुरुआती अनुमानों से कम रहा और इसे संशोधित करके लगभग 309 लाख टन कर दिया गया. इसकी मुख्य वजहें मौसम का असर, गन्ने की कम पैदावार और कम रिकवरी थीं. इसमें महाराष्ट्र में ज्यादा क्रश रेट और उत्तर प्रदेश में रेड रॉट (गन्ने की बीमारी) से जुड़ी किस्मों की समस्याएं भी शामिल थीं. हर साल की तरह त्योहारों के सीजन में भी खरीदारी बढ़ी है. ग्लोबल स्तर पर, ब्राजील में चीनी का उत्पादन कम होने के अनुमान से सप्लाई कम हुई है और इंटरनेशनल कीमतें जून में लगभग 474 डॉलर प्रति टन से बढ़कर अगस्त में लगभग 552 डॉलर प्रति टन हो गई हैं.
नीरज शिरगांवकर ने कहा, "...लेकिन सबसे बड़ी वजह सट्टेबाजी (speculative behavior) रही है. ऐसा पिछले कुछ हफ्तों से हो रहा है, और इसकी वजह से कुछ बड़े खरीदार, जो आम तौर पर जरूरत के समय ही खरीदारी करते थे, अब स्टॉक जमा करने लगे हैं. डेढ़-दो महीने पहले से ही स्टॉक जमा करने के इस व्यवहार ने चीनी को बाजार से हटाकर गोदामों में रोक दिया है, जिससे सप्लाई की बनावटी कमी पैदा हो गई है, जिसका असल उपलब्धता से कोई लेना-देना नहीं है..."
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